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आर्थिक तबाही के बारूद पर भारत

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दुनिया के बाज़ार का मूड बहुत खराब है। आंकड़ों की बाज़ीगरी से अब अर्थव्यवस्था ऊपर आ चुकी है।

वास्तविकता के धरातल पर दुनिया की बड़ी बड़ी अर्थव्यवस्था रसातल में जाने को बेताब है। आर्थिक मामलों के जानकार इसके कई मायने निकाल रहे हैं। इन सब में सबसे बड़ा कारण उत्पाद और सेवा के सेक्टर का ध्वस्तीकरण है।

बात पहले भारत की। 31 अगस्त 2020 को GDP यानी सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़े सामने आए। ये आंकड़े वित्तीय वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही मतलब अप्रैल, मई और जून तीन महीनों के हैं।

आंकड़ों को देखकर डर और चिंता हुई। यह डर देश के उत्पाद और सेवा के सेक्टर के विकास को ऋणात्मक दिखाए जाने को लेकर है। वैश्विक ग्राफ में भारत की विकास दर -23.90 फीसदी नीचे चली गई है। यह खबर सामने आते ही आर्थिक जगत में तहलका मच गया है। यह आंकड़ा देश की आर्थिक तबाही को बयाँ कर रहा है।

इन आंकड़ों के साथ हमें यह भी देखना होगा कि क्या दुनिया में सिर्फ भारत की अर्थव्यवस्था का खस्ता हाल है या इसके साथ अन्य देश भी सफर कर रहे हैं।

अब सवाल ये उठता है कि क्या ऐसा भारत के साथ ही हुआ है? बाकी देशों का क्या हाल है। और इस ऐतिहासिक गिरावट की वजह क्या है? इन बातों पर विमर्श करने से पहले उसी संस्था द्वारा जारी किए गए वैश्विक जीडीपी विकास दरों के ग्राफ पर एक नज़र डाल लेते हैं।

इस ग्राफ में एक बात पर ध्यान दिया? सभी बड़े विकसित देशों की अर्थव्यवस्था ऋणात्मक है। सभी G7 देशों की विकास दर शून्य से कहीं नीचे है। अमेरिका तो नंबरों में भारत से भी निचले पायदान पर नज़र आ रहा है। 

लेकिन एक बात गौरतलब है। एकमात्र चीन की जीडीपी विकास दर धनात्मक है। 3.2 प्रतिशत। जून महीने से ही चीन के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भी तेजी दिखने लगी थी। उसका आयात-निर्यात भी बढ़ा है। ऐसा क्यों है कि जब बड़ी से बड़ी अर्थव्यवस्थाएं सफोकेट कर रही हैं तो चीन, जहां से कोरोना फैलना शुरू हुआ था, वो सकारात्मक बढ़त दर कैसे हासिल कर रहा है?

दुनिया के अखबारों और इंटरनेट न्यूज़ के अवलोकन से यह पता चलता है कि चीन में लॉकडाउन राष्ट्रीय स्तर पर नहीं किया गया। वहां पहले दिन से ही हॉटस्पॉट्स को लॉकडाउन करने की रणनीति अपनाई। वहीं भारत ने दुनिया का सबसे बड़ा लॉकडाउन कर एक रिकार्ड बनाने की होड़ में लग गया।

चीन में वो सेक्टर बंद थे, वो एरिया बंद थे, जहां उत्पादन होते हैं। अब ज़रा सोचिए कि इस तरह टुकड़ों में लॉकडाउन करके भी चीन की ग्रोथ रेट करीब 6 फीसदी से गिरकर 3 फीसदी पर आ गई।

भारत की गिरावट तो सबसे बुरी

चीन की विकास दर इसलिए ऋणात्मक नहीं हुआ, क्योंकि उसने लॉकडाउन पर अलग नीति अपनाई। वहीं भारत की विकास दर अमेरिका और यूरोप की नकल करने के चक्कर में यूरोपीय देशों से भी ख़राब रही।

भारत को अर्थशास्त्रियों का समूह लगातार इस बारे में सचेत करता रहा है। लगातार 16 तिमाही से देश जीडीपी दर घटती जा रही थी।

सिंहावलोकन करें तो 2016 में हम 8.5 से 9.5 फीसदी की गति से विकास कर रहे थे। कहां अब गिरते-गिरते धरती के नीचे समा गए।

48 महीनों तक हमारे देश ने अपनी विकास दर को सिर्फ गिरते देखा और उस पर कोई ख़ास कदम नहीं उठाए गए।
हालात यह हो गए हैं कि हमारे देश की शीर्षस्थ कम्पनियों को अब 2-3 साल से पहले अपनी विकास दर वापस पाने की उम्मीद में ही नही दिख रही हैं। फिर उसके बाद भी जो भारत हमारे सामने होगा, वो वैसा नहीं होगा, जैसा फरवरी-मार्च 2020 तक था। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरू में शाम को लोग बड़ी-बड़ी मार्केट में टहलते, खर्च करते दिखते थे. बड़े-बड़े रेस्टोरेंट, शॉप्स, लोगों की बेतहाशा ऑनलाइन शॉपिंग.. ये सब नजारे शायद ही अब दिखें। लोगों में पैसे खर्च करने की ताकत खत्म हो गई है। खरीदारी हमारा मिडिल क्लास करता है। और इस दुर्गति में मिडिल क्लास की ही कमर टूट गयी है। बस अच्छी नीति नियत और विश्वास का आस है कि शायद अर्थव्यवस्था के अच्छे दिन आएंगे।

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