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इंसानियत के कथाकार मुंशी प्रेमचंद

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प्रेमचंद जयंती पर विशेष

(जन्म: 31 जुलाई 1880 – अवसान: 08 अक्टूबर 1936)

इक्कीसवीं सदी का दूसरा दशक बीत रहा है। इंसान से लेकर मशीनें तक चाँद, मंगल पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा चुके हैं। सेकेंड में भूगोल बदलने की ताकत जमा की जा चुकी है। इनसब के बावजूद जब भी संवेदनाओं, संस्कारों और नैतिकता की सीख लेनी होती है तो आज भी मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ सहारा देती हैं।
बच्चों को न्याय सीखाने के लिए पंच परमेश्वर की ही शरण लेनी पड़ती है। संवेदनाओं के स्पंदन के लिए मंत्र पढ़ना पड़ता है। श्रम शीलता के लिए पिसनहरिया और सोज़ ए वतन में देशभक्ति का अद्भुत राग सामने दिखाई देता है।

आज के प्रेक्टिकल समय में एक सवाल जरूर क्लिक करता है कि आखिर प्रेमचंद को क्यों पढ़ें?

समय जितना मॉडर्न होता जा रहा है, प्रेमचंद की उतनी ही रेलेवेंसी बढ़ती जा रही है। उनकी प्रासंगिकता पर उठने वाला यह सवाल प्रेमचंद के रहते और उनके गुजर जाने के बाद हमेशा ही अलग कारणों की शक्ल लिए उठता रहा है। कुल मिलाकर यह समझ में आता है कि प्रेमचंद कहानियों के तुलसीदास हैं जिनकी रचनाओं में जीवन से जुड़े हर सवाल का जवाब है। जिस तरह तुलसी की रामचरितमानस हर परेशान व्यक्ति या प्रश्न का जवाब देती है, उसकी राम शलाका हर शंकाओं का निवारण करती है उसी प्रकार प्रेमचंद की कहानियाँ जीवन के अनसुलझे सवालों की गाँठें खोलकर रख देती हैं। पढ़ने वाला भूल जाता है कि उसकी जिंदगी कितनी झंझावात से घिरी हुई है। उसे तो होरी, गोबर, धनिया की ही परेशानी और संकट उसके संकट से बड़ी दिखाई देने लगती है। प्रेमचंद की कहानियों में एक जादुई दर्पण है। जिसमें पाठक खुद को देखता है।

जाकी रही भावना जैसी : गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं न! जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।। उसी प्रकार जिसने भी जिस मनोदशा या मनोवृत्ति से प्रेमचंद को पढ़ा उसे वैसे ही प्रेमचंद दिखाई दिए। किसी किसान प्रेमी ने पढ़ा तो उसने प्रेमचंद को कृषि प्रेमी साहित्यकार, कहानीकार बताया। किसी ब्राह्मण प्रेमी ने उन्हें पढ़ा तो उसके लिए प्रेमचंद ब्राह्मण द्रोही दिखे।
देशभक्ति की हाइपोथीसिस से उनकी सोज़ ए वतन किसी ने पढ़ी तो वो सात कहानियों की पतली सी किताब का एक एक हर्फ़ यानी शब्द देशभक्ति की महागाथा को बयाँ करता है।
प्रेमचंद की कलम असल में सर्वमुखी चली है। उन्होंने किसी क्षेत्र को छोड़ा नहीं।
प्रेमचंद तो खुद को मजदूर ही कहते थे। उन्होंने अपनी एक कहानी में कहा है कि “मैं मजदूर हूँ। जिस दिन मैं कुछ न लिखूँ मुझे रोटी खाने का हक़ नहीं है।”

मुंशी प्रेमचंद साहित्य के अकेले ऐसे नक्षत्र हैं जिन्होंने कहानी या उपन्यास विधा को तिलिस्म से बाहर निकाला। उसमें स्पंदन भरा। उसमें पाठक के लिए जिम्मेदारी दी। वंचितों की रूदाली और पूँजीवाद तथा साम्राज्यवाद के खूनी अट्टहास को नँगा किया।

प्रेमचंद ने खुद की सच्ची समीक्षा करने का सबको अवसर दिया है। उनकी रचनाएँ सबको काम पर लगाये रखती हैं। कुछ समीक्षक उनको एकांगी बताते हैं तो कुछ विराट सोच के प्रहरी। अब निर्मल वर्मा को ही ले लीजिये। उन्होंने तो प्रेमचंद पर भारतीय उपन्यास न लिखने का आरोप लगाया और यह भी कहा कि उनमें जीवन अधूरा है। उनमें विषाद ही विषाद है!

इन सबके बावजूद प्रेमचंद के जन्म के 140 साल बीत जाने पर भी जो सबसे अधिक पढ़े जाने वाले हैं, जो सबसे अधिक बाँचे जाने वाले हैं, वो नाम कोई और नहीं बल्कि मुंशी प्रेमचंद का है।

शायद ही किसी लेखक को यह सौभाग्य प्राप्त हुआ होगा कि उसकी रचनाएँ डूब कर पढ़ी जाती हों। प्रेमचंद की कहानियां और उपन्यास खुद में न जाने कितने ही आंखों के आंसुओं को समेटकर सुखाई होंगी।

एक साक्षर से लेकर के बड़के पीएचडी तक, कहानी की दुनिया में घूमकर फिर लौटते हैं तो केवल प्रेमचंद की ओर। स्कूली कक्षाओं में निरपेक्ष भाव से साल दर साल अगर किसी एक लेखक को पढ़ने वालों की संख्या सबसे अधिक होती है तो वह केवल और केवल प्रेमचंद हैं!

यह बात बिल्कुल सही है कि बचपन से ही स्कूल की लगभग हर कक्षा में उनका कुछ न कुछ पढ़ते हुए बड़े होने वाले विद्यार्थी का प्रेमचंद से अपरिचित होना नामुमकिन है। हर साल युवाओं को आत्मीयता के साथ प्रेमचंद के बारे में बातें करते अवश्य सुनाई दे जाते हैं।

ऐसा शायद बहुत कम होता है कि लेखक के पास ख़ुद को पाठक की नज़र में साबित करने की मजबूरी हो। कुछ विलक्षण लेखक ऐसे होते हैं जो समाज को चुनौती देते रहते हैं कि वह उनकी बनाई कसौटी पर पाठक ख़ुद को साबित करें।

अगर आज का समय देखा जाए तो प्रेमचंद की ईदगाह में अमीना ज़रूर अपने इकलौते पोते हामिद को अकेले ईदगाह न जाने देती! यह कहानी एक अजीब तरीके से आज की व्यवस्था पर एक दुख भरी टिप्पणी में तब्दील हो जाती है। उसी तरह पंच परमेश्वर आज की लालफीताशाही पर लानत लगाने में पीछे नहीं हटती दिखती।

पंच परमेश्वर का एक वाक्य लगातार गूंजता रहता है। सभी दिमागियों के लिए, ‘बिगाड़ के डर से क्या ईमान की बात न करोगे?’

आज समाज के हर तबके के पास अपना लेखक है। अपना साहित्यकार है। जिनके पास नहीं है वो प्रेमचंद को अपना बनाने लग जाते हैं। जैसे कम्युनिस्ट भगत सिंह को अपना बताते नहीं चूकते। क्योंकि उनके पास अपना ऐसा कोई चेहरा नहीं है जो देश के लिए कुर्बान हो जाये। ख़ैर, प्रेमचंद की भी वही हालत है।

लेखकों का सबसे बड़ा झुण्ड, प्रगतिशील लेखक संघ, जिसकी स्थापना 1936 में हुई। इसके अधिवेशन की अध्यक्षता प्रेमचंद ने की थी। लखनऊ के रिफाये आम क्लब के मैदान में आयोजित इस अधिवेशन के अध्यक्षीय भाषण में प्रेमचंद ने जमकर लेखकों के गुटबाज़ी की क्लास लगाई थी। लगभग सवा घण्टे के भाषण में उन्होंने जो कहा वो आज के साहित्य की नींव है।

उनके भाषण का कथन बहुत एहमियत रखता है,

“‘प्रगतिशील लेखक संघ’, यह नाम ही मेरे विचार से गलत है। साहित्यकार या कलाकार स्वभावतः प्रगतिशील होता है। अगर यह उसका स्वभाव न होता, तो शायद वह साहित्यकार ही न होता। उसे अपने अन्दर भी एक कमी महसूस होती है और बाहर भी। इसी कमी को पूरा करने के लिए उसकी आत्मा बेचैन रहती है। अपनी कल्पना में वह व्यक्ति और समाज को सुख और स्वच्छंदता की जिस अवस्था में देखना चाहता है, वह उसे दिखाई नहीं देती। इसलिए, वर्तमान मानसिक और सामाजिक अवस्थाओं से उसका दिल कुढ़ता रहता है। वह इन अप्रिय अवस्थाओं का अन्त कर देना चाहता है, जिससे दुनिया जीने और मरने के लिए इससे अधिक अच्छा स्थान हो जाय। यही वेदना और यही भाव उसके हृदय और मस्तिष्क को सक्रिय बनाए रखता है। उसका दर्द से भरा हृदय इसे सहन नहीं कर सकता कि एक समुदाय क्यों सामाजिक नियमों और रूढि़यों के बन्धन में पडकर कष्ट भोगता रहे। क्यों बेचैनी के साथ अनुभव करता है, उतनी ही उसकी रचना में जोर और सचाई पैदा होती है। अपनी अनुभूतियों को वह जिस क्रमानुपात में व्यक्त करता है, वही उसकी कला-कुशलता का रहस्य है। पर शायद विशेषता पर जोर देने की जरूरत इसलिए पड़ी कि प्रगति या उन्नति से प्रत्येक लेखक या ग्रंथकार एक ही अर्थ नहीं ग्रहण करता। जिन अवस्थाओं को एक समुदाय उन्नति समझता है, दूसरा समुदाय असंदिग्ध अवनति मान सकता है, इसलिए  साहित्यकार अपनी कला को किसी उद्देश्य के अधीन नहीं करना चाहता। उसके विचारों में कला मनोभावों के व्यक्तिकरण का नाम है, चाहे उन भावों से व्यक्ति या समाज पर कैसा ही असर क्यों न पड़े।………
……हम साहित्यकारों में कर्मशक्ति का अभाव है। यह एक कड़वी सचाई है; पर हम उसकी ओर से आंखें नहीं बन्द कर सकते। अभी तक हमने साहित्य का जो आदर्श अपने सामने रखा था, उसके लिए कर्म की आवश्यकता न थी। कर्माभाव ही उसका गुण था; क्योंकि अक्सर कर्म अपने साथ पक्षपात और संकीर्णता को भी लाता है। अगर कोई आदमी धार्मिक हो कर अपनी धार्मिकता पर गर्व करे, तो इससे कहीं अच्छा है कि वह धार्मिक न हो कर ‘खाओ-पियो मौज करो’ का कायल हो। ऐसा स्वच्छंदाचारी तो ईश्वर की दया का अधिकारी हो भी सकता है; पर धार्मिकता का अभिमान रखने वाले के लिए सम्भावना नहीं।

जो हो, जब तक साहित्य का काम केवल मन-बहलाव का सामान जुटाना, केवल लोरियां गा-गाकर सुलाना, केवल आंसू बहा कर जी हलका करना था, तब तक इसके लिए कर्म की आवश्यकता न थी। वह एक दीवाना था, जिसका गम दूसरे खाते थे, मगर हम साहित्य को केवल मनोरंजन और विलासिता की वस्तु नहीं समझते। हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सचाइयों का प्रकाश हो- जो हममें गति और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं; क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।”

प्रेमचंद के साहित्य को पढ़कर महसूस होता है कि अपने घेरे से निकलना ही सबसे बड़ी चुनौती है। दूसरों से शंकाग्रस्त होकर नहीं, बल्कि उत्सुक होकर मिलने की उत्कंठा होनी चाहिए।
सामने वाले के दुखों का अतिक्रमण करने की क्षमता ही इंसान को इंसानियत सिखाती है। प्रेमचंद के साहित्य में इसी इंसानियत का भरोसा सोलह आना है।

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