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*जो बाग़ी न हो वो ईश्क़ नहीं*

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वेलेंटाइन स्पेशल
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प्यार के साथ विद्रोह ऐसे ही जुड़ा है जैसे दिन के साथ उजाला, रात के साथ अंधेरा। जो बाग़ी न हो वो ईश्क नहीं है। जो दुनिया से डर जाए वो ईश्क नहीं है। जो जंजीरों में बंध जाए वो ईश्क नहीं है।

जावेद अख्तर कहते हैं कि

अब अगर आओ तो जाने के लिए मत आना,
सिर्फ एहसान जताने के लिए मत आना।।
ईश्क की आँच में ज़ंजीरें पिघल सकती हैं,
चाहने वालों की तकदीरें बदल सकती हैं,
तुम हो बेबस, ये बताने के लिए मत आना।
अब अगर आओ तो जाने के लिए मत आना।।

यही विद्रोही तेवर, यही Rebal Attitude ही ईश्क है। यही ईश्क की मुकम्मल मंज़िल है।

याद कीजिये, मुग़ल ए आज़म का वो मंज़र जहां अनारकली के दिल से सलीम की मोहब्बत को निकालने के लिए, उसकी हिम्मत तोड़ने के लिए; उसे भूखा प्यासा कैद खाने में फेंक दिया जाता है। …..और फिर….

एक दिन बादशाह अकबर के सामने कनीज़ को पेश किया जाता है।

वो अनारकली जो ख्वाबों से ज़्यादा खूबसूरत थी, अब उसका चेहरा ज़र पड़ चुका है। जिसके पैरों को चूमकर ज़मीन भी झंकार उठती थी, अब उन्हीं पैरों में बेड़ियाँ बज रही हैं।

बादशाह जंजीरों में जकड़ी हुई, हारी हुई निढाल अनारकली को देखकर कहते हैं; हमें यकीन है, क़ैदख़ाने के खौफ़नाक अंधेरों ने तेरी आरजुओं में वो चमक अब बाकी न रखी होगी, जो थी।

अनारकली भूख और प्यास से टूट चुकी है, लेकिन उसका ईश्क सलामत है। वो बादशाह को जवाब देती है, बादशाह सलामत..! क़ैदख़ाने के अंधेरे कनीज़ की आरज़ुओं से कम थे।

अकबर कहते हैं, अंधेरे और बढ़ा दिए जाएँ।

अनारकली कहती है, आरज़ूएँ और बढ़ जाएंगी।

ये हिम्मत देख रहे हैं आप?

मुतुल हुक्म बादशाह अकबर, जिनके कदमों में हिंदुस्तान के अनेक तख्त ओ ताज पड़े रहते थे। जिनसे ज़िन्दगी और मौत दोनों पनाह मानती थी। उनसे बेख़ौफ़ आँखें मिलाकर ये जवाब कौन दे रहा है?

एक कनीज़?

नहीं!

बल्कि, उस कनीज़ के सीने में धड़कता हुआ ईश्क, जिसे बादशाहों का तो छोड़िए, उन्हें खुदाओं का भी ख़ौफ़ नहीं।

और अनारकली के दिल में ऐसे ही बगावत थोड़े न थी! उसकी बग़ावत सलीम की मोहब्बत में तपकर निखरी थी। तपकर सोना हुई थी। ईश्क के भँवर में फँसकर अपनी कश्ती फेंकने से पहले उसने अपने दिल का डर सलीम से ज़ाहिर किया था।

कहाँ सलीम का रूतबा, कहाँ अनारकली,
ये ऐसी शाख ए तमन्ना जो कभी न फली।
हुज़ूर, एक न एक दिन ये बात आएगी कि
तख्त ओ ताज़ भले या कनीज़ अनारकली।।

और सलीम ने अनारकली की आँख में झाँककर वादा किया था कि

न बुझ सकेगी बुझाने से ऐ अहल ए दुनिया की वो शम्मा जो तेरी आँखों में मेरे दिल में जली,
मैं तख्त ओ ताज़ को ठुकराकर तुझको पा लूँगा, कि तख्त ओ ताज़ से तेरी गलियों की ख़ाक भली।।

ईश्क का यही बाग़ी तेवर जो रोमियो की नसों में दौड़ा। तो वो जान हथेली पर लेकर उस बग़ीचे में जा पहुंचा जहाँ जूलियट क़ैद थी।

वो जानता था कि इस बग़ीचे से जिंदा लौटना ही मुश्किल है। पर जो जान की परवाह करे वो ईश्क नहीं ईश्क का धोखा है।

जूलियट पूछती है रोमियो से कि
फसीने (दीवारें) इतनी ऊँची और पहरा इतना संगीन है,
जियाले रोमियो तू किस तरह पहुँचा बग़ीचे में?

रोमियो कहता है,
ये मेरी जूलियट के शोख़ चेहरे की शुमाएँ (किरणें) हैं,
कि आधी रात को सूरज निकल आया हो दरीचे में।।

जूलियट को डर है कि रोमियो जान से जाएगा। वो फिर कहती है,
मेरा कोई अज़ीज़ इस जाँ तुझे कोई पा ले तो फिर क्या हो?
(मेरे घर वालों ने तुझे यहां देख लिया तो सोच फिर क्या होगा?)

ये सब बातें वो क्यों सोचे जिसे तेरी तमन्ना हो।।

ऐसा नहीं कि ये विद्रोह सिर्फ नए जमाने के ईश्क होता है। उर्वशी और पुरुरवा का किस्सा किससे छुपा है?

उर्वशी इंद्र के दरबार में सबसे सुन्दर अफसरा है। और पुरुरवा, सामान्य पुरुष!

ये बात जुदा है कि पुरुरवा चन्द्रवंशी राजा था। प्रतापी था। लेकिन एक मनुष्य का इंद्र की अफसरा से क्या मेल?

लेकिन प्यार न तब छोटा बड़ा देखता था और न आज।

इंद्र के दरबार में उर्वशी पर अभियोग लगाया जाता है कि उसने सुर की मर्यादा तोड़ी है। आरोप कुछ यूँ पढ़ा जाता है,

हे उर्वशी! तू अम्बर की लालपरी वो धरती की धूल,
तू तारों की अमर संगिनी वो पतझड़ का फूल।।
वो संसारी रंगरूप भरे
तू कवि कल्पना से भी परे,
वहां माया की अनबुझी प्यास
यहाँ देवदूत हैं तेरे दास।
तेरे अंग अंग में है तेज़ भरा,
वो मानव तू स्वर्ग अफसरा।।
पल भर तू सारी गरिमा सारा गौरव भूल गयी,
त्यागकर अपनी मर्यादा उसकी बाहों में झूल गयी?

उर्वशी को ये बड़े बड़े शब्द समझ में नहीं आये। मान, मर्यादा, गरिमा, देवदूत, स्वर्ग, धरती, क्या है ये सब?

उसे तो प्यार हुआ था और प्यार की कहानी बस इतनी सी थी कि—

नैनों में उसके नयन छोड़ आई,
न पूछो कि ये कहाँ मन छोड़ आई।।

एक अनजानी सी लहर उठती है नदिया के निर्मल तीरे से,
मैं चली तो ये न जान सकी कि कोई साथ हो लिया धीरे से।।

जब जोग लगा मुझे जन्मों का संजोग प्रीत का तब जाना,
तन नाच रहा था युग युग से मन का नाच तो अब जाना।।

यदि फेर के आँखें चल देती मुझपर ये रंग कहाँ चढ़ता,
जो चाहें पूछें देवराज प्रश्नों से प्यार नहीं डरता।।

प्यार की ताकत से ही उर्वशी ने ब्रह्मा जी तक को भी कठघरे में खड़ा कर दिया था। इस कहानी को कौन नहीं जानता?

ये सब कहानियाँ आज प्रेरणा बननी चाहिए हर प्यार करने वालों के लिए। ये कहानियाँ तन्हाई की रहनुमाई कर सकती है। अपनी ज़िन्दगी महफ़िल में बदल जाएगी।

अब, अकेले में आँसू निकलने से पहले इन कहानियों के मर्म को सौ बार समझना और जानना पड़ेगा।

मेरी बातें तुमको सहारा देने आएंगी,
चाहोगी तो तुमको मीत बनाने आएंगी।।

गम को भी मन मीत बनाओ,
दर्द मिले तो गीत बनाओ।।

कुछ भी हो, ईश्क़ ज़िंदा रहना चाहिए..!

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