*जो बाग़ी न हो वो ईश्क़ नहीं*

वेलेंटाइन स्पेशल————– प्यार के साथ विद्रोह ऐसे ही जुड़ा है जैसे दिन के साथ उजाला, रात के साथ अंधेरा। जो बाग़ी न हो वो ईश्क नहीं है। जो दुनिया से डर जाए वो ईश्क नहीं है। जो जंजीरों में बंध जाए वो ईश्क नहीं है। जावेद अख्तर कहते हैं कि अब अगर आओ तो जाने […]

वादाशिकन होना ही ईश्क़ का सबब

प्रॉमिस डे पर ईश्क़ की बुनियाद वादों और विश्वास पर बननी शुरू होती है। दुःख यह है कि ईश्क़ की पूर्णता वादाखिलाफी या वादाशिकन होकर ही होती है। वो ईश्क़ ही क्या जिसमें कशिश बाक़ी न रहे। कोई रोता न रहे। मन पुराने दिनों को याद करके रोने लगे कि हमने किसी और की खुशी […]

ज़रा याद उन्हें भी कर लें….. चौरी चौरा के सौ बरस

-स्व0 रामधारी मिश्र का ऐतिहासिक बगीचा जहाँ खींचा गया था आज़ादी का ख़ाका आज हमारे देश के इतिहास में एक और अध्याय की शताब्दी होने जा रही है। देखने में यह एक दिन घटना थी। बहुत छोटी घटना थी। बहुत छोटे जगह की घटना थी। लेकिन उस घटना ने देश के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक […]

भाजपा के बड़प्पन की मजबूरी

बिहार चुनाव : एक विश्लेषण बिहार चुनाव के परिणाम इस बार कई मायनों के साथ बेहद महत्वपूर्ण शक्ल लिए सबके सामने आए हैं। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की जीत में एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रॉक स्टार की तरह देखा जा रहा है तो वहीं दूसरी ओर बिहार में चेहरा बने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार […]

इमरोज़ था हमारे साथ

इमरोज़ था हमारे साथ

आज अमृता आईं। इन्हें देख आश्चर्य और स्नेह के बादल एकसाथ मिले। उनकी बोली के एक एक शब्द पम्पोर की फिजा में खुश्बू घोल रहे थे। वातावरण में कुहासा और कश्मीरी केसर की सुगंध बिखर चुकी थी। कश्मीर की धरती केसरिया चादर हटा रही थी। उस केसर के खेत में खड़ीं अमृता प्रीतम का फिरोज़ी […]

हमारे गर्व का दिन

हमारे गर्व का दिन

आज पूरा देश शिक्षक दिवस मना रहा है। सभी अवगत होंगे कि यह दिन देश के दूसरे राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन टीचर्स डे के रूप में मनाया जाता है। हमारे और सम्पादक के लिए विशेष गौरव का क्षण है। वह ये है कि जिनके नाम से पूरे देश में शिक्षक दिवस मनाया जाता […]

आर्थिक तबाही के बारूद पर भारत

दुनिया के बाज़ार का मूड बहुत खराब है। आंकड़ों की बाज़ीगरी से अब अर्थव्यवस्था ऊपर आ चुकी है। वास्तविकता के धरातल पर दुनिया की बड़ी बड़ी अर्थव्यवस्था रसातल में जाने को बेताब है। आर्थिक मामलों के जानकार इसके कई मायने निकाल रहे हैं। इन सब में सबसे बड़ा कारण उत्पाद और सेवा के सेक्टर का […]

महसूसेगा संकट मोचन का कोना पण्डित जसराज का न होना

बनारस : वो साल ऐतिहासिक था। बनारस के लिए तो विशेष तौर पर। वो साल था 2014। बनारस राजनीतिक ज़मीन पर विश्व से आंखें मिलाने को तैयार हो रहा था। इसके पहले बनारस ने एकेडमिक, खेल और संगीत के स्तर पर दुनिया को अपना मुरीद बना चुका था। शायद वो 20 अप्रैल 2014 की तारीख […]

अगले मोड़ पर आज़ादी

पन्द्रह अगस्त पर आज़ादी का तराना बचपन से सुनते हुए बड़े हुए हैं। पहले तो आजादी का मतलब तो बस मोतीचूर का लड्डू और कागज़ का लहराता तिरंगा था। दशक बीते तो समझ ने भी आज़ादी की परिभाषा बदली। अब आज़ादी के मायने दूसरे थे। हाथ में फर्स्ट क्लास की डिग्री मन में बड़ा काम […]

कीमती आज़ादी की कीमत समझने का साल

हमारी पहचान हमारी योग्यता से नहीं बल्कि हमारे फैसलों से बनती है। योग्यता तो सिर्फ फैसले लेने के काबिल बनाती है। हैरी पाॅटर फिल्म के हिंदी संस्करण की एक सीरीज का यह प्रोफेसर डम्बलडोर का डायलाॅग निश्चित ही सियासत के संदर्भ में जरूर अमल होता है। सियासत में लिया गया हर फैसला बहुत अहम होता […]