अनुशासन के मेटाफर – राजनाथ सिंह

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-आज राजनाथ सिंह का जन्मदिन
-जिला मुख्यालय वाराणसी में किया था 15 दिनों तक बेमियादी अनशन


मोहम्दाबाद के विधायक कृष्णानंद राय की नृशंस हत्या हो गई थी। सूबे में सत्ता से सड़क तक आंदोलन ही आंदोलन, संघर्ष ही संघर्ष हो रहा था। भारतीय जनता पार्टी अभी ताज़ी ताज़ी विपक्ष में आई थी। यूपी को मुलायम सिंह सम्भाल रहे थे। ऐसे में भाजपा अपने विधायक की हत्या को लेकर बहुत संजीदा थी।

उस समय राजनाथ सिंह भाजपा के आखिरी मुख्यमंत्री के तौर पर हटे थे। चंदौली यानी पूर्वांचल जन्मभूमि होने के नाते राजनाथ सिंह ने इस हत्या को राष्ट्रीय आंदोलन बना दिया। उन्होंने 1 या 2 दिसम्बर 2005 से बनारस के जिला मुख्यालय पर बेमियादी अनशन शुरू कर दिया। राजनाथ सिंह जैसे बड़े कद के नेता को देखकर आस पास के जिलों से भी उन्हें समर्थन मिलने लगा।

दिसम्बर की 4 या 5 तारीख थी। हम और ईशान हरिश्चंद्र पीजी कॉलेज गए। ईशान वहाँ पढ़ते थे। हम उनके साथ एक सायं अखबार के लिए खबर बटोरने गए। हमलोग जैसे ही पहुंचते हैं, वहाँ तत्कालीन छात्रसंघ उपाध्यक्ष शैलेन्द्र पांडेय कवि मिले। ईशान से उन्होंने कहा कि चलो जिला मुख्यालय, और हमलोग एक महानगरी बस में बैठ गए। उन दिनों तक ईशान के पास मोटरसाइकिल नहीं आयी थी। इसीलिए हमलोग ऑटो से हरिश्चंद्र कॉलेज पहुँचे थे और वहाँ से जिला मुख्यालय।

बस में हमारी मुलाकात लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष जलज सिंह से हुई। नारेबाजी करते हुए हमलोगों की टोली जिला मुख्यालय पहुँच गयी थी। वहाँ यूपी कॉलेज से सुजीत सिंह टीका, काशी विद्यापीठ से सत्येंद्र सिंह आदि लोग अपने साथ अपार छात्रशक्ति को लेकर पहुंचे।

राजनाथ सिंह युवाओं को सम्बोधित कर रहे थे। धोती कुर्ता के उजले लिबास में वे अपना ओजस्वी भाषण दे रहे थे। उनके भाषण से उत्साहित बलदेव पीजी कॉलेज के लड़कों ने राजनाथ सिंह के समर्थन में नारेबाजी शुरू कर दी। नारेबाजी जबतक दलगत थी तबतक तो सब ठीक था। राजनाथ सिंह बोल रहे थे और सभी का अभिवादन भी स्वीकार कर रहे थे।

इसी बीच उसी महाविद्यालय के छात्रों के एक गुट ने मुलायम सिंह पर व्यक्तिगत हमला करते हुए नारेबाजी शुरू कर दी। नारे में कुछ आपत्तिजनक टिप्पणी भी हुई। वो शोर राजनाथ के कानों में भी पड़ा। राजनाथ सिंह ने वो शब्द सुनते ही अपना भाषण तुरन्त रोक दिए। सबसे उन्होंने कहा कि हम विचारधारा से लड़ने वाले हैं। हम अनुशासन न खुद तोड़ेंगे और न ही बच्चों को तोड़ने देंगे। उन्होंने आगे समझाया कि बच्चों, मैं भी फिजिक्स का प्रोफेसर रहा हूँ, एक अध्यापक के नाते मैं अपशब्द नहीं सहन करूँगा।

आप सभी अगर अभी तुरन्त चुप नहीं हुए तो मैं इसी वक़्त ये अनशन छोड़कर चला जाऊँगा। उनके चेहरे पर अध्यापक वाला रौब साफ झलक रहा था। हम और ईशान आगे की पंक्ति में ही बैठे थे। राजनाथ सिंह के उस आह्वान ने अंततः छात्रों को चुप होने पर मजबूर कर दिया। फिर राजनाथ सिंह लगभग एक घण्टे तक बोले। लेकिन जब उन्होंने अपना भाषण खत्म किया फिर लगभग 10 मिनट तक तालियाँ बजती ही रहीं। ये कोई चुनावी सभा नहीं थी। उन्हें युवाओं का जन समर्थन मिल रहा था। अक्सर लोगों को जब सत्ता या जनसमर्थन मिलने लगता है तो वे सबसे पहले मर्यादा भूलते हैं। राजनाथ सिंह ने मर्यादा का साथ नहीं छोड़ा। साथ ही हम युवाओं को भी कहीं न कहीं मर्यादा और अनुशासन की सीख भी सिखाई। इसके बाद ये अमशन 14 दिसम्बर तक चला। 15 दिसम्बर 2005 को इस अनशन के समर्थन को देखते हुए देश के शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, कल्याण सिंह इत्यादि भी आये थे।

तमाम बड़े नेताओं से स्लिप ऑफ टँग होता रहता है। लेकिन राजनाथ सिंह एक ऐसे नेता हैं जिनसे भाषायी भूल होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता। सार्वजनिक जीवन में उन्होंने एक आदर्श प्रस्तुत किया है।

वो जब राष्ट्रीय अध्यक्ष थे तो चंदौली की किसी सीट से उनके बेटे पंकज सिंह के लिए टिकट की मांग जोरों से चल रही थी। अगर उनको उस समय टिकट मिल जाता तो शायद वो सीट के साथ साथ आस पास की अन्य सीटें भी भाजपा जीत जाती। उन्होंने साफ तौर पर और सार्वजनिक तौर पर कहा कि मैं जब तक अध्यक्ष हूँ तब तक अपनी कलम से अपने बेटे को न तो संगठन में पद दूँगा और न ही टिकट दूँगा। परिणाम चाहे जो हो जाये।

तो..आज की भारतीय राजनीति जब अपने ऊपर से अनुशासन और संस्कार का लिबास उतार रही है ऐसे में राजनाथ सिंह सरीखे नेताओं से सार्वजनिक जीवन का मौलिक धर्म सीखना आवश्यक हो जाता है। राजनाथ सिंह वर्तमान राजनीति में अनुशासन के मेटाफर हैं।

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One Response

  1. Bhot khub ! Jitana hi khubsurat apne sheershak chuna hai, utani hi khubsurat apki lekhani hai !!

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