एक ख़त का इंतज़ार

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-डाक विभाग का सप्ताह आरम्भ
-यादों सिलवटों में सजी है ख़तों की दुनिया

भारतीय डाक विभाग ने डाक सप्ताह आरम्भ किया है। डाकखाने या फिर डाक विभाग का नाम आते ही सबसे पहले अगर किसी की इमेज हमारे सामने आती है तो वो चिट्ठियों या ख़तों की इमेज..!

बीते दिनों के सबसे प्यारे दस्तावेज़ होते हैं ख़त!

रिल्लिके, काफ्का, इमरोज़ और नेहरु के ख़तों को आज तक पढ़ा जाता है।  ख़त लिखे जाना जितना सुकून देता है, उसको पढ़ना उतना ही मीठा एहसास देता है। माना के अब ज़रुरत नहीं, पर लिखे जाने चाहिए। अब भी ख़त कि जो मज़ा लिफ़ाफे को टटोल के मज़मून भांपने में है, वो फ़ोन पर आये मैसेज में कहाँ!

बरसों बरस बीत गए हैं घर की चौखट पर डाकिया आकर नहीं रूका, न ही उसकी साइकिल की घंटी ही कहीं आस-पड़ोस में सुनाई देती है। क्या आप भूल गए हैं वो एक कागज़ का टुकड़ा? वक्त और जगहों की हदों को पार करता हुआ वो ख़त, जिसमें किसी का फ़िक्र भरा उलाहना होता, तो किसी की दुनियादारी से भरी नसीहत, कभी प्रियतम का बेचैन हाल-ए-दिल तो कभी दोस्त या भाई की ज़िद्द या कभी किसी रिश्तेदार का स्नेह, कभी किसी की प्यार भरी शिकायत, तो कभी बच्चों की झिझकती हुई फ़रमाईश।

कितना कुछ समेटे रहता था वो छोटा सा कागज़। पहले क्या लिखें, यही तय करने में कई पन्ने बर्बाद हो जाते थे – प्रिय, प्रिया या प्रियतमा या फिर प्यारे, पूज्य, पूजनीय या आदरणीय?

ख़त लिखे भी जाते थे और पढ़े भी जाते थे। कभी ग़ुस्से में इनकी चिन्दियाँ करके हवा में उछाला भी जाता था, तो कभी प्यार से चूमकर सहेजा भी जाता था। कुछ अपने साथ इत्र की खुशबू लाते थे, तो कुछ लिखने वाले की महक को अपने अंदर समेटे हुए पहुँचते थे। जैसा कि शायर अख़्तर शीरानी ने कहा है –

मिट चले मेरी उम्मीदों की तरह हर्फ़ मगर
आज तक तेरे ख़तों से तेरी ख़ुशबू न गयी।

उन दिनों ख़त के आने का मतलब होता था घर की रोज़ की घिसी-पिटी दिनचर्या से हटकर कुछ अलग तरह की हलचल वाला माहौल। जैसे पानी से भरा एक बादल आकर बरस कर चला जाए।

ख़त में अच्छी ख़बर आने का मतलब, गर्मी से तपती हुई ज़मीन पर ठन्डे पानी की रिमझिम फुहार, और बुरी ख़बर का आना जैसे हड्डियों को कंपाने वाली ठण्ड में तेज़ बर्फ़ीली हवा और बारिश के साथ ओलों का गिरना। लेकिन इंतज़ार फिर भी रहता था – चाहे अच्छी ख़बर की उम्मीद हो या बुरी ख़बर की धुकधुकी।

ख़त मिलने के बाद कुछ दिन तक उसे तकिये के नीचे रख कर बार-बार पढ़ा जाता था और फिर उसे वहीं आले में या अलमारी की दराज़ में रख दिया जाता था। लेकिन कुछ ख़त होते थे, जिन्हें ऊंचा रूतबा हासिल होता था और उन्हें सम्भाल कर रखने की भी ख़ास जगह होती थी।

या तो वो लकड़ी का नक्काशीदार बक्सा, जिसके अंदर लाल, नीले या हरे रंग का शनील का कपड़ा जड़ा होता था और एक छोटा सा ताला भी लगा होता था। जिसकी चाभी को बड़े जतन से छोटे से मंदिर में शालिग्राम जी के बिछे गोटे-किनारी वाले कपड़े के आसन के नीचे छुपा कर रखा जाता था। जिसके पास ऐसा शानदार बक्सा नहीं उसके पास कपड़ों का संदूक या ट्रंक होता था।

सबसे नीचे हल्के सलेटी रंग की धोती की तहों में छुपा कर रखा वो गुलाबी कागज़, जिसे उसके सफ़ेद लिफ़ाफ़े से कभी निकाला ही नहीं गया, कि कहीं उस ख़त का तिलिस्म या जादू बिखर न जाए।

उन पुराने, सहेजे गए ख़तों को पढ़ना ऐसा ही है जैसे किसी ख़ज़ाने में से कोई भूली-बिसरी याद का मोती ढूँढ कर लाना। हर ख़त एक कहानी कहता है और उस कहानी के किरदार ही उस ख़त को लिखते और पढ़ते हैं।

ख़त लिखने का रिवाज़ चाहे अब फ़ोन और ई–मेल ने ख़त्म कर दिया हो, लेकिन आज भी कहीं कोई है जो अपनी प्रेयसी का मजबूरियों की दुहाई देता, तीस साल पुराना ऐसा ख़त पढ़ कर ठंडी सांस भरता है। जिसके शब्द कहीं-कहीं आंसुओं से धुंधला गए हैं। अब चाहे वो आँसूं लिखने वाली के रहे हों या पढ़ने वाले के, कौन जाने?

कुछ ख़त ऐसे भी होते थे जो उम्मीद और इंतज़ार के दिए की लौ को आधी सदी से भी ज़्यादा समय तक रौशन रखते थे, जैसे मेरे ताऊजी के नब्बे साल बूढ़े, झुर्रियों भरे हाथों में थमा हुआ वो ख़त! जो वक्त की मार से पीला पड़ा हुआ वो ख़त, जिसे अपने मोटे फ्रेम वाले चश्मे से पढ़ते हुए वे कहीं खो सी जाते थे। पिछले साल उनके जाने के बाद हमने वो पत्र खोलकर देखा कि किसका था.! असल में वो ख़त देश के प्रथम भारत रत्न डॉक्टर भगवान दास का था/है। डॉक्टर भगवान दास ने मेरे दादाजी (ताऊजी के पिताजी) को लिखा था। वो पत्र अक्सर ताऊजी को बाबा के विराट व्यक्तित्व का एहसास दिलाता था।

एक और ख़त था उसी डिब्बे में। उनके एक मित्र का। जो विभाजन के समय लिखा था। बीस अगस्त उन्नीस सौ सैंतालिस को रावलपिंडी से – “पता चला कि बच्चे ठीकठाक से दिल्ली पहुँच गए हैं। मैं दुकान का सौदा करके आज से तीसरे दिन गाडी में बैठूंगा और चौथे दिन तुम्हें दिल्ली में मिलूंगा।”

ख़त तो मिल गया, लेकिन उसे लिखने वाले का इंतज़ार ताऊजी को आजीवन रहा। “शायद वो बच गए हों, शायद किसी ने उन्हें पनाह दे दी हो, शायद वो मुझे ढूँढ न पाए हों।”

बस! इसी तरह मिलने और बिछड़ने के साक्षी थे ये ख़त। प्यार, मनुहार और अधिकार जताने का ज़रिया बन कर सदियों तक लोगों को इस नाज़ुक ज़ंजीर ने बाँध कर रखा है। लेकिन कितना कुछ हमने खो दिया, जब हमने ख़त लिखना छोड़ दिया। इसीलिए आपसे गुज़ारिश है कि लिखते रहिये कभी-कभी,प्यारे-प्यारे ख़ुशबू से गमकते ख़त! क्योंकि कुछ ख़त इतने ख़ास होते हैं कि सिरहाने की मेज़ पर रखे सुनहरे फ्रेम में तस्वीर की जगह सजाये जाते हैं।

आज भी बैठा हूँ बस एक…..एक ख़त के इंतज़ार में।

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