‘ऐ दिले नादां…  आरज़ू क्या है… जुस्तजू क्या है’

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लता जी का आज जन्मदिन

जानते हैं मेरी आरज़ू क्या है? मेरी आरज़ू है कि मैं अपनी सबसे पसंदीदा गायिका, मेरी क्या पूरे हिंदुस्तान की पसंदीदा, लता मंगेशकर जी के बारे में सब कुछ जान लूँ। जैसे ये बात मैंने जाना कि ये गाना- ‘ऐ दिले नादां’ उनके अपने गाए दर्द भरे गीतों में  उनका सबसे पसंदीदा नग़मा है। हमें तो उनके हज़ारों गाने पसंद हैं लेकिन उनकी पसंद क्या है?

और भी कितना कुछ है जो हम लता जी के बारे में नहीं जानते, मगर जानना चाहते हैं। लेकिन वो तो आसमान हैं, उन तक पहुंचना, हमारे लिए कहाँ संभव है? लेकिन हर मुश्किल का हल होता है- तो मैंने भी एक सीढ़ी खोज ली, जो हमें लता जी तक लेकर जाएगी। वो सीढ़ी है एक किताब! किताब का नाम है ‘लता सुर-गाथा’ और इसको लिखा है यतीन्द्र मिश्र ने!

सच कहूँ तो ये किताब एक एनसायकलोपीडिया है जिसका हर पन्ना हमें लता जी के क़रीब लिए जाता है। किताब का सारा संवाद छः वर्षों में लेखक की लता जी से समय समय पर हुई बातचीत पर आधारित है। सुर-गाथा, लता मंगेशकर के, संगीत में आकंठ डूबे वजूद को रेखांकित करने का एक विनम्र प्रयास है। मुझे तो ये किताब खज़ाना लगती है।

इस किताब के पहले भाग में, जो भूमिका के ठीक बाद आता है उसमें लता जी की सांगीतिक यात्रा पर विचार है। इस हिस्से का नाम है- आज फिर जीने की तमन्ना है। इसमें कितनी बातें है जो हौले हौले एक कली की पंखुड़ियों की तरह खुलती चली जाती हैं। जैसे लता जी ने जो पहला राग सीखा वो पूरिया धनश्री था। तब वो सिर्फ़ छः साल की थीं। लेखक लिखते हैं कि एक दुर्लभ या कम प्रचलित राग से शुरू हुई ये दीक्षा, आगे जाकर इतनी असरकारी, इतनी अद्भुत और इतनी स्वरमयी हो जाएगी इसकी तो शायद उनके गुरु और पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर को भी सुध नहीं रही होगी।

इस हिस्से में लेखक ने क्रमवार लता जी की पूरी यात्रा समेट के रख दी है। किन मंझे हुए संगीतकारों के साथ उन्होंने काम किया, गीत किसने लिखे, साज़िंदे कौन रहे से लेकर कई बेहद ख़ूबसूरत और लोकप्रिय गीतों के बनने के सफ़र की दास्तान भी इस किताब ने समेट रखी है। जैसे पंडित रविशंकर के रचे अनुराधा फ़िल्म के गीत। कैसे सितार से झंकृत होते गीत हैं और लता जी भी बोलीं कि मुझे लगता है पंडित जी ने इस फ़िल्म के हर गाने को सितार पर बनाया होगा…  याद होगा न वो गीत –

‘जाने कैसे सपनों में खो गई अँखियाँ, मैं तो हूँ जागी मेरी सो गई अँखियाँ…

लता जी के बहाने से इस किताब में संगीत की ऐसी ऐसी बारीकियाँ हैं कि आप मंत्रमुग्ध होकर पढ़ते चले जाएंगे। हिन्दी फ़िल्म संगीत का शास्त्रीय संगीत से दोस्ताने का ज़िक्र है, लता जी की गायकी की फिरत, हरकत, लोच लयकारी, तानों की बातें हैं। लेखक ने जानेमाने संगीतज्ञ, फिल्मकार, क्रिटिक, गीत संगीत की खासी समझ रखने वाले श्रोताओं को कोट किया… इस किताब के बाबत उन्होंने लता जी और अपने अलावा न जाने कितने गुनीजनों की बात पाठकों तक पहुंचाई है।

किताब के तीसरे हिस्से में लेखक की लता जी से बातचीत है। ढेरों प्रश्न और उनके बेबाक से जवाब! किसी को जानने के लिए इससे बेहतर तरीका और क्या होगा। किताब में लता जी के प्रतिनिधि गीत भी हैं, और उनको मिले सम्मान भी…

किताब ज़रा मोटी ज़रूर है लेकिन लिखी ऐसी गई है कि कोई भी पन्ना खोलें और पढ़ डालें। जैसे आते जाते, टेबल पर रखी शक्कर की फ़क्की लगाई और चल दिए मुंह मीठा करके।  यतींद्र मिश्र की इस किताब को 64वें नेशनल अवॉर्ड में बेस्ट बुक ऑन सिनेमा के लिए पुरस्कृत किया गया।

मैं तो लेखक के साथ वाणी प्रकाशन का भी मुरीद हूँ जिन्होंने इतना बढ़िया कंटेन्ट आम लोगों को उपलब्ध कराया है। मेरी बड़ी दिल से सिफ़ारिश है बल्कि गुज़ारिश समझिए कि इस किताब को लता सुर-गाथा को ज़रूर पढ़ें जिसको लिखा है जाने माने कवि, संपादक, संगीत सिनेमा अध्येता यतीन्द्र मिश्र ने। संगीत और लता जी से प्रेम है तब भी पढ़िए और… और क्या? कोई है ऐसा जिसे संगीत से और लता जी से प्रेम न हो?

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