कर्नाटक कांग्रेस में बढ़ा सियासी घमासान: शिवकुमार समर्थक विधायकों की बगावत, दिल्ली में उठा CM बदलने का मुद्दा

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कर्नाटक की सियासत एक बार फिर उबाल पर है। कांग्रेस सरकार बनने के करीब डेढ़ साल बाद भी मुख्यमंत्री पद को लेकर खींचतान थमने का नाम नहीं ले रही। सत्ता के दो शीर्ष नेताओं—मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डिप्टी सीएम डी.के. शिवकुमार—के बीच लंबे समय से चल रही तकरार अब खुलकर सामने आने लगी है। इस बार विवाद उस स्तर तक बढ़ चुका है कि कई शिवकुमार समर्थक विधायक दिल्ली पहुंच गए हैं और पार्टी हाईकमान से मुखर होकर मांग कर रहे हैं कि कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन किया जाए।

कांग्रेस हाईकमान पिछले कई महीनों से इस तनाव को कम करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन हालात अब इतने बिगड़ते दिख रहे हैं कि विधायकों का प्रत्यक्ष रूप से दिल्ली पहुंचना एक बड़ा राजनीतिक संकेत माना जा रहा है। कर्नाटक में यह अस्थिरता ऐसे समय में बढ़ी है जब कांग्रेस 2026 के लोकसभा चुनावों और आगामी राज्य स्तरीय राजनीतिक समीकरणों को लेकर रणनीति बना रही है।


शुरुआत कैसे हुई तनाव की?

मई 2023 में कर्नाटक विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को अप्रत्याशित रूप से बड़ी जीत मिली थी। सरकार बनाते समय पार्टी ने दो सबसे बड़े चेहरों—सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार—के बीच सत्ता संतुलन बनाए रखने के लिए एक अनौपचारिक पावर-शेयरिंग फॉर्मूला तैयार किया था। यह तय हुआ बताया गया था कि सिद्धारमैया शुरुआती ढाई साल मुख्यमंत्री रहेंगे और उसके बाद पद शिवकुमार को सौंप दिया जाएगा।

लेकिन बीते महीनों में परिस्थितियाँ बदलती नजर आईं। राज्य में सिद्धारमैया की पकड़ और प्रशासनिक नियंत्रण लगातार मजबूत होता गया, जबकि शिवकुमार का धड़ा अपने आप को उपेक्षित महसूस करने लगा। यही असंतोष धीरे-धीरे बढ़कर अब बगावती रूप में सामने आ रहा है।


दिल्ली पहुंचे शिवकुमार समर्थक विधायक

कर्नाटक से जिन्होंने दिल्ली का रुख किया है, उनमें कई वरिष्ठ विधायक शामिल हैं। ये सभी विधायक सीधे तौर पर शिवकुमार के प्रभाव वाले क्षेत्रों से आते हैं और खुलकर यह दावा कर रहे हैं कि उनकी अनदेखी की जा रही है। उनका आरोप है कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया अपने करीबी नेताओं और अधिकारियों को बढ़ावा दे रहे हैं, जबकि शिवकुमार खेमे के विधायकों और नेताओं को किनारे लगाया जा रहा है।

विधायकों का यह भी कहना है कि कर्नाटक कैबिनेट में भी सत्ता का संतुलन बिगड़ चुका है। कई महत्वपूर्ण विभाग उन लोगों को दिए गए हैं जो सिद्धारमैया से निकटता रखते हैं। यही वजह है कि संतुष्टि का स्तर लगातार गिरता जा रहा है।


क्या सच में चल रहा है CM बदलने का दबाव?

दिल्ली पहुंचे ये विधायक इस बार सिर्फ नाराज़गी जताने नहीं, बल्कि स्पष्ट मांग लेकर आए हैं —
“मुख्यमंत्री बदला जाए और पावर-शेयरिंग के वादे को पूरा किया जाए।”

कांग्रेस आलाकमान फिलहाल इस मांग पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दे रहा है, लेकिन पार्टी सूत्रों के अनुसार हाईकमान इस स्थिति को गंभीरता से ले रहा है। यह भी बताया जा रहा है कि शिवकुमार ने स्वयं भी इस मुद्दे पर केंद्रीय नेतृत्व से मुलाकात की है।

हालांकि, ऐसी किसी मुलाकात की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन राजनीतिक हलकों में चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं कि शिवकुमार अपने समर्थकों की नाखुशी को हाईकमान के सामने बड़े मुद्दे के रूप में प्रस्तुत कर चुके हैं।


सिद्धारमैया की प्रतिक्रिया

हालाँकि सिद्धारमैया ने इस विवाद पर सार्वजनिक रूप से कुछ भी तीखा बयान नहीं दिया है, लेकिन उनकी टीम के नेता का कहना है कि
“सरकार स्थिर है, और ऐसे छोटे-मोटे मुद्दे समय-समय पर हर पार्टी में उठते रहते हैं।”

थोड़े संतुलित लहजे में उनके करीबी नेता इस बात से भी इनकार करते नजर आए कि कोई पावर-शेयरिंग फॉर्मूला तय किया गया था। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री चुनने का अधिकार पूरी तरह पार्टी हाईकमान का है, और वर्तमान नेतृत्व पूरी तरह ‘फंक्शनल’ और ‘कामकाजी’ है।


कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार पर क्या असर?

ये तनाव कांग्रेस के लिए चिंताजनक हैं, क्योंकि—

  • राज्य सरकार अपनी अवधि के मध्य में है।

  • कई बड़े प्रोजेक्ट और योजनाएँ अभी लागू की जा रही हैं।

  • विपक्ष लगातार कांग्रेस सरकार को अस्थिर दिखाने के लिए इस विवाद का फायदा उठा रहा है।

यदि शिवकुमार का धड़ा खुलकर नाराज़ हो गया, तो विधायकों का बड़े पैमाने पर समर्थन खिसक सकता है। सिद्धारमैया सरकार के लिए यह किसी खतरे से कम नहीं होगा।


विधायकों की प्रमुख शिकायतें

  1. विभागों में असमानता
    उनका आरोप है कि मंत्रालयों का बंटवारा निष्पक्ष नहीं है और शिवकुमार समर्थक नेताओं को तवज्जो नहीं दी गई।

  2. अधिकारियों की पोस्टिंग पर नाराज़गी
    कई जिलों में ऐसे अफसर नियुक्त किए गए हैं जिन पर मुख्यमंत्री के बेहद करीब होने का आरोप है।

  3. योजना बजट आवंटन में पक्षपात
    विकास कार्यों में भी असमानता का आरोप लगाया जा रहा है।

  4. शिवकुमार का अपमान
    उनके समर्थक विधायकों का कहना है कि डिप्टी CM को वह महत्व नहीं मिल रहा जिसका वादा किया गया था।


आगे क्या?

कांग्रेस हाईकमान अगले कुछ दिनों में कर्नाटक के इन असंतुष्ट विधायकों से अलग-अलग और संयुक्त बैठक कर सकता है।
फिलहाल दो संभावनाएँ उभरकर सामने आ रही हैं—

  1. पावर-शेयरिंग का फार्मूला लिखित रूप से तय किया जाए ताकि भविष्य में विवाद न उठे।

  2. कैबिनेट या विभागों में फेरबदल करके शिवकुमार खेमे को संतुष्ट किया जाए।

मुख्यमंत्री पद बदलने की संभावना फिलहाल कम लगती है, लेकिन राजनीतिक समीकरण कब करवट ले लें, यह कहना मुश्किल है।


निष्कर्ष

कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के भीतर उठ रही यह हलचल राज्य की राजनीति को एक बार फिर अस्थिर कर सकती है। अगर हाईकमान समय रहते दोनों खेमों के बीच संतुलन स्थापित नहीं कर पाया, तो यह विवाद आने वाले महीनों में और बड़ा रूप ले सकता है। शिवकुमार समर्थकों का दिल्ली पहुंचना स्पष्ट संकेत है कि अब मामला सिर्फ नाराज़गी तक सीमित नहीं, बल्कि नेतृत्व परिवर्तन की ओर बढ़ता दिख रहा है।

कांग्रेस के लिए यह परीक्षा की घड़ी है—क्या वह अपनी सबसे बड़ी दक्षिण भारतीय सरकार को आंतरिक खींचतान से बचा पाएगी या फिर विवाद और गहरा होगा? आने वाले कुछ दिनों में तस्वीर साफ हो जाएगी।

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