कश्मीर के बहार का इंतज़ार – मिलिए कश्मीर से

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-किस्सों में बीत जाते थे हाड़ कँपाऊ चालीस दिन
-बहार के मौसम में चिनार के पत्तों की खनक करती है हलचल

आजकल फिर कश्मीर में सियासी हलचल बढ़ गई है। एक दो दिन में प्रधानमंत्री ने सर्वदलीय बैठक बुलाई है। सुनने में आ रहा है कि कश्मीर को फिर से पूर्ण राज्य का अधिकार मिलने वाला है। कई कयास लगाए जा रहे हैं। इन्हीं कयासों के बीच मन के बहुत दूर एक कोने में बैठा कश्मीरी दिल अपने वादियों की खूबियां बताने को बेताब होने लगा। वहाँ की सियासी हलचल कुछ भी परिणाम सुनाए लेकिन कश्मीर और कश्मीरी का अंदाज़ निराला ही होता है।

मेरी लगभग दस पुश्त पहले के पूर्वज कश्मीरी ही थे। एशिया का स्पेन कहा जाने वाले पम्पोर में हमारा खानदानी घर हुआ करता था। मेरे व्यक्तिगत के लिए कश्मीर और हमारा खानदान भारत की सभ्यता और संस्कृति में अद्भुत और उल्लेखनीय स्थान रखते हैं।

आज हम जिस देवनागरी लिपि को लिखते हैं वो भले ही कश्मीर से थोड़ा दूर उसकी सहेली तोरा बोरा की पहाड़ियों में महर्षि पाणिनी ने महेश्वर सूत्र की रचना की, लेकिन उसे आम चलन में देवनागरी के रूप में फैलाने वाले हमारे पूर्वज राजा जय भट्ट थे। हालांकि राजा जय भट्ट कालांतर में अपनी राजधानी कश्मीर के पहलगाम से भावनगर, गुजरात बना ली थी।  आज जो हम शास्त्रीय संगीत को सुनते या सीखते हैं उसका ककहरा मेरे ही नामराशि हमारे पूर्वज अभिनव भट्ट ने रचा था।

खैर हमें अपने पुरखों की न तो शान गढ़ना है और न खुदनुमाई करनी है। हमें तो आप सभी को कश्मीर से मिलवाना है। कश्मीर के पम्पोर, पहलगाम, सोपोर इत्यादि जिले जहाँ आज गोलियों की गूँज सुनाई देती है, वहाँ प्रकृति भारत माँ के शीश का श्रृंगार करती है। जाड़ा खतम होने के बाद वहाँ बहार का मौसम आता है। अकेले पहलगाम में पंद्रह लाख फूलों की प्रजातियां खिलती हैं। वहीं पम्पोर में केसर की सुगंध, खुबानी के खट्टे मीठे फल, बादाम, काजू आदि पेड़ों पर लद जाते हैं। बहार के मौसम में हर कोई ईश्क़ में डूब जाता है। बहारों के मौसम के लिए कहा जाता है कि जब कश्मीर में बहार आती है तो मुर्दे भी आशिकी करने लगते हैं।

कश्मीर की परंपरा के मुताबिक सुहावने मौसम के स्वागत के लिए हर कश्मीरी उसका दिल से स्वागत करता है। इसके लिए पहलगाम का बादामवारी बाग को लोगों के लिए खाेल दिया जाता है। इस बाग में लगे पेड़ों के फूलों से बहार आने का पता चलता हैं और इसी समय से इस बाग को खोला जाता है।

बहार के मौसम में कश्मीर में कई सारी फ़सलें तैयार होती हैं, जिनमें सेब, बादाम, केसर आदि प्रमुख हैं।

इसी मौसम में कश्मीर में चिनार के पत्ते सूखकर जब ज़मीन पर गिरते हैं तो पूरा मंज़र ही बदल जाता है।

लोग अक्सर घरों से निकलकर इस ख़ूबसूरत बहार का आनंद लेते हैं। चिनार के पत्तों पर चलना एक अलग अहसास देता है।

हालांकि यहां के हर मौसम की अपनी ख़ासियत है, लेकिन बहार में इन चिनारों की बात ही कुछ और होती है। ऐसे लगता है जैसा चारों ओर सोना बिखर गया हो।

जब ये पत्ते ज़मीन पर गिरते हैं तो इनका अंदाज़ ही निराला होता है और पैर के नीचे इनके टूटने की आवाज़ दिल को छू जाती है।

इसी बहार के मौसम में पम्पोर की झील किनारे एक बुजुर्ग युगल गंगा और सागर की प्रेम कहानी मुकम्मल हुई थी। यह किंवदंतियाँ आज भी लोगों को सुनाई जाती हैं। इस कहानी में कश्मीर के बहार के मौसम में एक पूनम के रात की कहानी है।

मौसम आगे बढ़ता है। बहार ख़त्म होती है। फिर ठिठुरन शुरू हो जाती है। ऐसे में बच्चों को किस्से सुनाने का दौर चलता है। पम्पोर में किस्से बाज़ गाँव गाँव में जाकर अलाव के साथ तरह तरह की कहानियां सुनाकर लोगों का मनोरंजन करते हैं।

ये किस्सेबाजों की कहानियां हड्डियों को जमा देने वाली ठंड में घाटी के बच्चों को खासकर यह गर्म रखा करती थी। ये वे कहानियां थीं, जो बच्चों को सुनाई जाती थीं। सर्द रातें जितनी लंबी और स्याह होती जाती थीं, उतनी ही इन कहानियों का रहस्य पैना होता जाता था। लेकिन, अब यह गुजरे जमाने की बात होती जा रही है। हाड़ को कंपा देने वाली ठंड में बड़े-बुजुर्ग, मायें सुनाती थीं बर्फीले आदमी की कहानी, उन चुड़ैलों की कहानियां जो बच्चों को उठा ले जाती हैं, शैतानों से लड़ते राजकुमारों की कहानियां और फिरदौसी की दसवीं सदी के ईरानी पहलवान रुस्तम और उसके बेटे सोहराब की कहानी..अब कश्मीरी इन सभी की कमी महसूस कर रहे हैं।

कश्मीर की परंपरा भी याद आती है जब लद्दाख के पास चिल्ला कलां (21 दिसंबर से शुरू होने वाले सबसे भीषण जाड़ों वाले 40 दिन) में कहानियां सुनाने वाले गांवों में आया करते थे। इन कहानियों को सुनाने वालों का आना अपने आप में एक बड़ी बात हुआ करती थी। आमतौर से गांव का सबसे संपन्न परिवार इनकी मेजबानी करता था। अब तो शायद ही किसी याद भी नहीं होगा कि उस समय रात के खाने के बाद, करीब-करीब पूरा गांव ही किस्सा सुनाने वाले के मेजबान के घर इकट्ठा हो जाता था। सभी लोगों को कहवा पिलाया जाता था। वह पहले एक छोटी कहानी से शुरू करता, कि कैसे एक राजकुमार लकड़ी के घोड़े पर बैठकर दूर राक्षस की गुफा से राजकुमारी को छुड़ाता है। उसके बाद वह फिरदौसी के फारसी में लिखे महाकाव्य शाहनामा से रुस्तम और उसके बेटे सोहराब की दर्द भरी कहानी सुनाता था।

किस्से बाजों के न आने पर घरों में दादी या नानी जब उन चुड़ैलों की कहानी सुनाती थीं, जो जाड़े के मौसम में बच्चों को उठा ले जाती हैं और पहाड़ों की गुफाओं में बंद कर देती हैं, तो फिर शायद ही कोई बच्चा ऐसा होता था जो अंधेरी रात में निकलने की हिम्मत जुटा सके।

उस समय हमारी जिंदगी में सहूलियतें आज के मुकाबले कम थीं, लेकिन सुकून (माफ़ करना, चैन) ज्यादा था। उस वक्त घाटी के किसी गांव में बिजली नहीं थी। मां लकड़ी से चूल्हा जलाती थी और हम उसकी गर्मी में अपनी मां के साथ बैठ जाते थे। कोई दिया, डिबरी या लालटेन ही रोशनी का सहारा हुआ करती थी। अधिकांश घरों में माएं और नानी-दादियां एक से बढ़कर एक किस्से सुनाती थीं कि कैसे राक्षसों से लड़कर किसी राजकुमार ने राजकुमारी को रिझाया था।

आज जो हम कश्मीर की मशहूर डल झील में फ्लोरल बोट या हाउस बोट को देखते हैं उसकी शुरुआत हांजी समुदाय ने की।  ब्रिटिश दौर में उन्होंने अंग्रेज़ और भारतीय पर्यटकों के लिए पानी में तैराने वाली खूबसूरत बोट बनाई क्योंकि उन्हें राज्य में जम़ीन खरीदने की इजाज़त नहीं थी।

कश्मीर पर बहुत कुछ लिखने को जी चाहता है। बस लिखकर शांत हो जाते हैं। कश्मीर ने सबकुछ दिया लेकिन हमने कश्मीर को सिर्फ गोली बंदूक और सियासी हलचल ही दी। बहुत नाइंसाफी की है हमने अपने काश्मीर के साथ। बस इन लाइनों के साथ कश्मीर से माफ़ी मांगने के अलावा और कुछ भी नहीं कर सकते हम।

मेरे लिए कश्मीर हो तुम !

खुबसूरत हो, महबूबखूब हो, सहनशील हो, उदार हो

ईश्क़ की कई किरदार हो, किताबों की दरबार हो, गंगा का प्रवेशद्वार हो, खुद गंगा हो

मगर परेशान हो एक अरसे से

तुम अलग अस्तित्व बनोगी या किसी अलग मुल्क का हिस्सा…

ये ज्ञान नहीं मुझे

मगर हाँ ये दावे के साथ कह सकता हूँ कि जब तक जिस्म में आत्मा है और धड़कनें साथ हैं!

मैं हुर्रियत, अब्दुल्लाओं, महबूबाओं और आतंकवादियों से लड़ता रहूँगा..!

मेरा ईश्क़ हो तुम
मेरा कश्मीर हो तुम

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