किताबों से कहीं आगे हैं भगत सिंह

IMG-20210629-WA0000

  • भगत सिंह को जानने के लिए सरकारी लायब्रेरी से बाहर जाना होगा
  • सुपर हीरो को समझने वाली समीक्षक आंखों को खोलना जरूरी

इक्कीसवीं सदी का इक्कीसवां साल अपनी आधी उम्र पूरी कर चुका है। इस साल के आने साथ ही देश के सुपर हीरो शहीद भगत सिंह की शहादत का शताब्दी दशक भी शुरू हो गया। देश के शहीदों की एक सबसे बड़ी खासियत यह है कि उन्होंने न तो खुद शहादत का वारिस किसी को बनाया और ना ही उनके नाम से किसी को पेंशन या शहीद परिवार का लाभ लेने दिया। इसके अलावा देश के क्रांतिकारियों विशेषकर भगत सिंह को सत्ता ने अपनी आंखों से लोगों को दिखाया। विश्वविद्यालयों की लाइब्रेरियों में सत्ता के संरक्षण में प्रकाशित किताबें रखवाई गईं। उनमें उनके हिसाब से लिखे नरेटिव लिखे गए। उन नरेटिव्स को पढ़कर लोग भगत सिंह के आचार्य बन गए।

ये बात ध्यान देने की है कि सत्ता या सरकार हमेशा उस तरह के साहित्य समाज का निर्माण करना चाहती है जिसमें उनके फॉलोवशिप बढ़े। भगत सिंह के रहने तक भारत की आज़ादी देश के कोने कोने में लड़ी जा रही थी। आज़ादी की लड़ाई विकेन्द्रीकृत थी। इसका कोई नेता या ठेकेदार नहीं था। भगत सिंह के जाते ही आज़ादी की लड़ाई को कॉपीराइट करा लिया गया। सिर्फ एक इंसान और एक दल के इर्द गिर्द दासी बनकर रह गई भारत की आज़ादी। भगत सिंह के बाद आज़ादी की लड़ाई में उन सब का योगदान निष्क्रिय कर दिया गया। आज़ादी के बाद सत्ता ने सिर्फ ये हथकंडा अपनाया कि किस प्रकार भगत सिंह और उनके समय के लोगों को अतिवादी, उग्रवादी बताए जाने की कोशिश की गई। 1969 में देश की शिक्षा वामपंथी हाथों में गयी। ये वामपंथी भगतसिंह को अपना बताते हुए उन्हें मार्क्सवादी कहते हैं। और.. उन्होंने ही भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद इत्यादि को उग्रवादी बताया गया।
चुँकि भगत सिंह सबसे प्रभावी व्यक्तित्व थे। इसीलिए उनके साथ सबसे अधिक लिटरेरी एक्सपेरिमेंट किये गए।

कभी उनके कुछ पत्रों के सिर्फ सन्दर्भ लेकर उन्हें नास्तिक बताया गया, तो कभी सत्ता का विरोधी बताया गया। कभी भगत सिंह को पिस्तौल लिए एक अतिवादी बताया गया तो कभी अंग्रेज़ी हैट लगाए इधर से उधर जाने वाला युवा बताया गया। कभी बम फेंकने वाला, तो कभी सांडर्स को मारने वाला बताया गया।

जबकि भगत सिंह किसी साहित्य में बंधने वाला नाम नहीं है। उनको अनेक भाषाओं में, अनेक संस्कृतियों में तलाशना होगा। सतही बातों को बताकर असली भगत सिंह से कभी मिलवाया ही नहीं गया।

अगर भगत सिंह असेम्बली में बम न फेंकते तो अगले छह माह में अपनी पीएचडी पूरी कर लेते। और उनकी पीएचडी अर्थशास्त्र में हो रही थी। वो अगर सिर्फ पढ़ने का रास्ता अपनाते तो अंबेडकर से बड़े अर्थशास्त्री होते।

भगत सिंह ने जीवन में सिर्फ एक गोली चलाई थी। वो गोली सांडर्स के ऊपर चली थी। उसके बाद उन्होंने इसका अफसोस भी जताया था। उन्होंने एक पत्र में लिखा था कि किसी को मारने से आज़ादी मिलने से रही। इसीलिए अब लोगों को जगाने के लिए धमाका करना होगा। इसीलिए उन्होंने असेम्बली में सिर्फ ज़ोर का धमाका वाला बम फेंका जिसमें कोई हताहत नहीं हुआ। वो खुद को गिरफ्तार करवाते हैं और जीवन के अंतिम दिनों में श्रीमद्भगवद्गीता की सम्पूर्ण व्याख्या जिसे बाल गंगाधर तिलक ने लिखा था, गीता रहस्य; को पढ़ रहे थे। जिसके दो श्लोक शेष रह गए थे।

लेकिन…भगत सिंह, वीर सावरकर, चंद्रशेखर आजाद या विदेशों में मेत्जिनी इत्यादि लोगों ने अपने हिसाब से दुनिया को देखा और हर किसी को बताया कि उन्हें देखने के लिए अलग अलग आंखें चाहिए। उन्हें देखने समझने के लिए सरकारी संरक्षण से दूर निकलकर दुनिया में उनके अवशेषों को तलाशना होगा। जो लोग भगत सिंह को आज अपना आदर्श मानते हैं वो वीर सावरकर पर कुछ सही राय नहीं रख पाते। इसका स्पष्ट कारण यह है कि सत्ता ने सेलेक्टिव एप्रोच के साथ क्रांतिकारियों का संकलन किया कराया। जबकि हकीकत यह है कि भगत सिंह को देश के लिए सबकुछ कर गुजरने की प्रेरणा वीर सावरकर से ही प्राप्त हुई थी। वो सावरकर को अपना आदर्श मानते थे। वहीं सावरकर के राजनीतिक आदर्श थे मेत्जिनी। तो हम आज विश्वविद्यालयों की लाइब्रेरी से थोड़ा बाहर आकर आजाद हवाओं से भगत सिंह को जानने समझने की कोशिश करते हैं। क्योंकि भले हम सेलेक्टिव हो जाएं, दोहरी मानसिकता के साथ उन्हें देखें लेकिन ये आजाद हवाएं अपनी आजादी के लिए इन लोगों की कर्जदार हैं। इसीलिए ये कभी झूठ नहीं बोलेंगी।
भारत के सबसे प्रेरणास्पद क्रांतिकारियों में अग्रणी भगत सिंह और स्वातंत्रय वीर के नाम से विख्यात विनायक दामोदर सावरकर के बीच एक ऐसा ‘भावनात्मक संबंध’ था जिसके बारे में ज्यादा चर्चा नहीं हुई है. भगत सिंह, सावरकर को बतौर क्रांतिकारी एक ‘आदर्श’ के रूप में देखते थे। इसका एक प्रमाण कलकत्ता से निकलने वाले साप्ताहिक ‘मतवाला ’ के 15 और 22 नवंबर 1924 के अंक में में देखा जा सकता है। जिसे इसकी तस्दीक करनी हो वो कलकत्ता के राष्ट्रीय ग्रंथागार यानी नेशनल लाइब्रेरी के आर्काइव सेक्शन में जाकर देख सकता है। मतवाला के इस अंक में भगत सिंह का एक लेख ‘विश्व प्रेम ‘ के नाम से प्रकाशित हुआ था।  इसमें वह कहते हैं, ‘विश्व प्रेमी वह वीर है जिसे भीषण विप्लववादी, कट्टर अराजकतावादी कहने में हम लोग तनिक भी लज्जा नही समझते- वही वीर सावरकर. विश्व प्रेम की तरंग में आकर घास पर चलते-चलते रुक जाते कि कोमल घास पैरों तले मसली जायेगी।’ यह लेख बलवंत सिंह के छद्म नाम से लिखा गया था।
भगत सिंह ने यह लेख तब लिखा था जब सावरकर रत्नागिरी में नजरबंद थे। उन पर राजनीतिक गतिविधयों में भाग लेने को लेकर प्रतिबंध लगा हुआ था। उस समय भगत सिंह बलवन्त सिंह के छद्म नाम से अपने लेख लिखा करते थे।
शहीद भगत सिंह ने ‘किरती ’ नामक प्रकाशन में मार्च 1928 से लेकर अक्टूबर 1928 तक ‘आजादी की भेंट शहादतें ’ नाम से लेख शृंखला लिखी। अगस्त 1928 के अंक में इस शृंखला का उद्देश्य इस रूप में बताया गया है, ‘हमारा इरादा है कि उन जीवनियों को उसी तरह छापते हुए भी उनके आंदोलनों का क्रमशः हाल लिखें ताकि हमारे पाठक यह समझ सकें कि पंजाब में जागृति कैसे पैदा हुई और फिर काम कैसे होता रहा और किन कामों के लिए, किन विचारों के लिए उन शहीदों ने अपने प्राण तक अर्पित कर दिए।’
इन्हीं लेखों में कर्जन वायली को मौत के घाट उतारने वाले क्रांतिकारी मदनलाल ढींगरा और सावरकर के बारे में लिखते हुए भगत सिंह कहते हैंः
‘‘स्वदेशी आंदोलन का असर इंग्लैंड तक भी पहुंचा और जाते ही श्री सावरकर ने ‘इंडिया हाउस’ नामक सभा खोल दी। मदनलाल भी उसके सदस्य बने! एक दिन रात को श्री सावरकर और मदनलाल ढींगरा बहुत देर तक मशवरा करते रहे। अपनी जान तक दे देने की हिम्मत दिखाने की परीक्षा में मदनलाल को जमीन पर हाथ रखने के लिए कहकर सावरकर ने हाथ पर सुआ गाड़ दिया, लेकिन पंजाबी वीर ने आह तक नहीं भरी। सुआ निकाल लिया गया। दोनों की आंखों में आंसू भर आये। दोनों एक-दूसरे के गले लग गए। आहा, वह समय कैसा सुंदर था। वह अश्रु कितने अमूल्य और अलभ्य थे! वह मिलाप कितना सुंदर कितना महिमामय था! हम दुनियादार क्या जानें, मौत के विचार तक से डरनेवाले हम कायर लोग क्या जानें की देश की खातिर कौम के लिए प्राण दे देने वाले वे लोग कितने उंचे, कितने पवित्र और कितने पूजनीय होते है!’’
प्रसिद्ध मराठी इतिहासकार वाई.डी. फड़के के अनुसार, भगत सिंह ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के विषय में सावरकर की किताब ‘1857- इंडिपेंडेंस समर ‘ का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया था और क्रांतिकारियों में इसका प्रचार किया था। (संदर्भ- शोध सावरकरांचा, वाई.डी. फडके, श्रीविद्या प्रकाशन, पुणे)
सावरकर की एक और पुस्तक ‘हिंदूपदपादशाही’ से भी भगत सिंह ने प्रेरणा ली थी। अपनी जेल डायरी में उन्होंने इस पुस्तक से उद्धरण लिए हैं जो इस प्रकार हैं-
उस बलिदान की सराहना केवल तभी की जाती है जब बलिदान वास्तविक हो या सफलता के लिए अनिवार्य रूप से अनिवार्य हो। लेकिन जो बलिदान अंततः सफलता की ओर नहीं ले जाता है, वह आत्मघाती है और इसलिए मराठा युद्धनीति में उसका कोई स्थान नहीं था। (हिंदूपदपादशाही, पृष्ठ 257)
इन मराठों से लड़ते हुए हवा से लड़ रहे हैं, पानी पर पानी खींच रहे हैं। (हिंदूपदशाही, पृष्ठ 258)
वीरता के कार्य किए बिना, वीरता का प्रदर्शन किए बिना, साहस के साथ इतिहास बनाये बिना इतिहास लिखना हमारे वक्त का एक बुरा सपना है। वीरता को वास्तविकता बनाने का अवसर न मिलना हमारे लिए अफसोस की बात है। (हिंदूपदपादशाही, पृष्ठ 265-266)
राजनीतिक दासता को कभी भी आसानी से उखाड़ फेंका जा सकता है। लेकिन सांस्कृतिक वर्चस्व के बंधनों को तोड़ना मुश्किल है। (हिंदूपदपादशाही, पृष्ठ 272-273)
हे स्वतंत्रता, जिसकी मुस्कान हम कभी नहीं छोड़ते, जाओ उन आक्रामक, मूर्खों को बताओ ‘आपके मंदिर में एक युग से अधिक बहनेवाला रक्त प्रवाह हमारे लिए मीठा है जंजीरों में जकड़ी नींद से ज्यादा’, थॉमस मूर की पंक्तियां सावरकर द्वारा उद्धत। (हिंदूपदपादशाही, पृष्ठ 219)
‘धर्मांतरित होने के बजाय मार डाले जाओ’ उस समय हिंदुओं के बीच यही पुकार प्रचलित थी। लेकिन रामदास ने खड़े होकर कहा, ‘नहीं, यह सही नहीं है’। धर्मांतरित होने के बजाय मार डाले जाओ- यह काफी अच्छा है लेकिन उससे भी बेहतर है ‘न मारे जायें और न ही धर्मांतरण किया जाए।’ (हिंदूपदपादशाही पृष्ठ 181-182)
23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई। उस समय सावरकर ने निम्नलिखित कविता की रचना कीः-
हा, भगत सिंह, हाय हा!
चढ गया फांसी पर तू वीर हमारे लिये हाय हा!
राजगुरु तू, हाय हा!
वीर कुमार, राष्ट्रसमर में हुआ शहीद
हाय हा! जय जय हा !
रत्नागिरि में सावरकर के घर पर हमेशा भगवा झंडा फहराया जाता था। लेकिन भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव के बलिदान के अगले दिन उनके घर पर काला झंडा लहरा रहा था। भगत सिंह के साथियों जैसे भगवतीचरण वोरा आदि ने भी भगत सिंह व अन्य क्रांतिकारियों पर सावरकर और उनके साहित्य के प्रभाव में विस्तार से लिखा है जो राहुल फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित ‘भगत सिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज’ में उपलब्ध है।

Share on facebook
Facebook
Share on whatsapp
WhatsApp
Share on google
Google+
Share on twitter
Twitter
Share on linkedin
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *