ख्वाबों की सीरत और उसकी सूरतगरी

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  • नकारात्मक दौर में न छोड़ो सपनों का साथ
  • ख़्वाब ही ज़िन्दगी की नाज़ुकी से मिलवाते हैं

ख्वाब उम्मीद का ही दूसरा नाम है। अगर आपके पास उम्मीद है तो ही आप ख्वाब देख सकते हैं। इसीलिए जागते में अगर उम्मीद है तो सोते में वही उम्मीद ख्वाब बन जाती है। और आज यही तो हो रहा है। इंसान जिस खालीपन से गुजर रहा है कि उसकी उम्मीद टूट चुकी है और ख्वाब सो चले हैं।

जब सब कुछ मौन होने लगता है। फिजा में शांति के बजाय सन्नाटा छाने लगता है तो उस वक्त जरूरत पड़ती हमें शायरी, गीत, राग, अभिनय, चित्रों, नृत्यों, नाट्यों की।

यानी पूरे के पूरे फाइन आर्ट की जरूरत पड़ती है। हम जो ख्वाब गढ़ते रहते हैं अपनी नज़्मों, शायरी या गीतों में; वो कहीं अंतरिक्ष से नहीं आते, उन ख्वाबों में असल में ख्वाहिशें शामिल रहती हैं आरजुएँ शामिल रहती हैं।… और सबसे बड़ी वो तमाम वास्तविकता, रियलिटिज़, जिनमें से वो ख्वाहिशें जन्म लेती हैं।

ये रियलिटीज ही हैं जो हमें एक शब्द देती हैं जो ख्वाहिश को बताता है। वो शब्द है ‘काश!’

काश! ऐसा हो जाए,

काश! ये दिन कट जाएं,

काश! इंसानियत जिन्दा रहे। आदि आदि।

हम जो सोसायटी या समाज को केंद्र में रखकर जो ख्वाहिश करते हैं वही हमें नींद में ख्वाब बनकर हमारे मन को निश्चय में बदलते रहते हैं।
ख्वाहिश करना और उन ख्वाहिशों के आधार पर ख्वाब देखना, वो बड़ी बात नहीं है! ख्वाबों की औकात या उसकी एहमियत तो सिर्फ़ फाइन आर्टिस्ट ही समझता है।

कोई ख्वाब अगर फाइन आर्टिस्ट देखता है तो उसे अपने पेंटिंग, एक्टिंग, सिंगिंग, राइटिंग, डांसिंग में पेश करता है। ख्वाबों को कलात्मक ढंग देकर पेश करने की कला को सूरतगरी कहते हैं। और इसे करने वाले को ख्वाबों का सूरतगर कहते हैं।

वो शेर है न!

इक आग गम-ए-तन्हाई की जो सारे बदन में फैल गई,
जब जिस्म ही सारा जलता हो फिर दामन-ए-दिल को बचाएँ क्या।।
हम नग्मा-सरा कुछ गजलों की हम सूरत-गर कुछ ख्वाबों के,
बे-जज्बा-ए-शौक सुनाएँ क्या कोई ख्वाब न हो तो बताएँ क्या।।

अब इन बातों को देखा जाए तो हमारे पास तो पिछले हजारों साल से हजारों सूरतगर हुए हैं। उनकी विरासत ही इतनी बड़ी है कि हमें आंसू नहीं आने चाहिए? क्यों? लेकिन ऐसा नहीं है?

ख्वाब आने बंद नहीं होते। हम अपनी जिंदगी में ख्वाबों को जमा करते चलते हैं। कुछ ख्वाब पूरे भी होते हैं। कुछ ख्वाबों पर गलत निज़ामों का कब्जा हो जाता है, उस कब्जे का नाम है, गवर्नेंस। अक्सर सरकार या हुकूमत की बातें हमारे ख्वाबों से टकरा जाती हैं, फिर वो ख्वाब छनककर टूटते हैं। ऐसे में वो ललित कलाओं के रास्ते व्यक्त होते हैं। वो फैज की शायरी में व्यक्त होते हैं, वो दुष्यंत की गजलों में व्यक्त होते हैं, वो रोमियो की करुण आवाज बनते हैं, वो आदम और हौवा बनते हैं, अपने पिघलने की प्रक्रिया को पूरा करते हैं। समाज से अभिभूत होकर समाज के लिए आंसू की स्याही बनाकर समाज को ही नज़ीर करने का काम तो सिर्फ ख्वाबों के सूरतगर करते हैं।

वो कहते हैं न!

चलो अपने चमन की बात करें!
चलो अपने वतन की बात करें।।
निकल तो आए हैं अपने घुटनों से,
अब क्या बताएं किस चमन की बात करें।

जब हम जैसी दुनिया या जैसा महबूब चाहते हैं अगर वैसा नहीं मिलता या कुछ बदला हुआ संसार नजर आता है तो हमारे ख्वाब रोते हैं। वो आंसू अगर रंगों के माध्यम से व्यक्त हों तो चित्रों में मायूसी को बताएंगे और शब्दों में व्यक्त हों तो नज़्मों में व्यक्त होंगे।

कलाकार या साहित्यकार या यूं कहें कि ख्वाबों के कुछ सूरतगरों में ऐसे नाम हैं जिन्होंने अपनी छाप किसी व्यक्ति विशेष या कुछ दिनों पर नहीं बल्कि सदियों और युगों पर छोड़ी है। ऐसे ही एक सूरतगरों में शूमार हैं सूर, कबीर, तुलसी, जायसी, मीर, गालिब आदि आदि। अब कबीर को ही लें। समाज को लेकर उनमें जो ख्वाहिशें जन्मीं और उन्होंने जो ख्वाब देखे, वो जब असलियत से एकदम अलग हुए तो रो पड़ते हैं। रोते रोते कहते हैंः-

हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या?
रहें आजाद या जग में, हमन दुनिया से यारी क्या?
जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते,
हमारा यार है हम में, हमन को इंतजारी क्या?
खलक सब नाम अपने को, बहुत कर सिर पटकती है,
हमन हरिनाम रांचा है, हमन दुनिया से यारी क्या?
न पल बिछुड़े पिया हमसे, न हम बिछड़े पियारे से,
उन्हीं से नेह लागा है, हमन को बेकरारी क्या?
कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से,
जो चलना राह नाजुक है, हमन सर बोझ भारी क्या?

अब उसी तरह तुलसीदास को जब अपने महबूब राम से ईश्क करने में अस्सी के पंडितों द्वारा परेशान किया जाता है। उनकी ख्वाहिशें तोड़ी जाती हैं, उनके ख्वाब यानी रामचरित मानस को बार बार नष्ट किया जाता है तो वो नाराज होकर कवितावली में कहते हैंः-

धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ।
काहू की बेटी सों बेटा न ब्याहब, काहू की जाति बिगार न सोऊ।।
तुलसी सरनाम गुलामु है राम को, जाको रुचै सो कहै कछु ओऊ।
माँगि कै खैबो, मसीत को सोइबो, लैबोको एकु न दैबको दोऊ।।

ऐसे ही मीर तकी मीर को जब दिल्ली से लखनऊ आकर रहना पड़ा था तो उनकी जिस प्रकार से ख्वाहिशें बिखरी थीं उसको उन्होंने कुछ यूं बयां कियाः-

क्या बूद-ओ-बाश पूछो हो पूरब के साकिनो
हमको गरीब जान के हंस हंस पुकार के
दिल्ली जो एक शहर था आलम में इंतिखाब
रहते थे मुंतखब ही जहां रोजगार के
उसको फलक ने लूट के वीरान कर दिया
हम रहने वाले हैं उसी उजड़े दयार के

अब ऐसे ही एक बार मीर से एक हैदराबाद के बहुत मशहूर पेंटर मौलाना मकसूद साहब ने कहा कि मैं आपके शेर पर पेंटिंग करुंगा। तो मीर ने शेर दिया।

हस्ती अपनी हबाब की सी है
ये नुमाइश सराब की सी है
नाजुकी उस के लब की क्या कहिए
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है

अब इसकी आखिरी दो लाइनों पर मौलाना ने बहुत खूबसूरत पेंटिंग बनाई। उसमें गुलाब भी था, लब भी थे, होठों की नाजुकी भी थी। मीर ने कहा कि सबकुछ तो है लेकिन इसमें ‘सी’कहां हैं?

बस ख्वाबों की सुरतग़री तो उसी ‘सी’ को तलाशने में व्यस्त हो जाती है। बस…. ऐसी ही होती है ख्वाबों की सूरतगरी!!

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