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ज़रा याद उन्हें भी कर लें….. चौरी चौरा के सौ बरस

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-स्व0 रामधारी मिश्र का ऐतिहासिक बगीचा जहाँ खींचा गया था आज़ादी का ख़ाका

आज हमारे देश के इतिहास में एक और अध्याय की शताब्दी होने जा रही है। देखने में यह एक दिन घटना थी। बहुत छोटी घटना थी। बहुत छोटे जगह की घटना थी। लेकिन उस घटना ने देश के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक इतिहास को नया आयाम दिया। यह घटना थी चौरी चौरा की।

घटना का इतिहास हममें से कोई भी इंटरनेट की दुनिया में घूमकर पढ़ सकता है। लेकिन, इस घटना में मेरे लिए एक रोमांचक और गर्व की अनुभूति करने का सानिध्य प्राप्त है। हमारी टीम की वरिष्ठ लेखिका, टीम मैनेजर रंजना से कौन अपरिचित होगा। हर कोई उनको जानता ही होगा। लेकिन उनके बारे में एक ऐसी बात हम सबको पता होनी चाहिए जिससे कि हम सब उनकी उपस्थिति और सानिध्य से गौरव की अनुभूति प्राप्त कर सकें।

रंजना के पूर्वज यानी उनके प्रपितामह यानी परबाबा श्री रामधारी मिश्र का चौरी चौरा काण्ड में अनुपमेय योगदान है। ये वो परिवार जिसने आजादी का सौदा नहीं किया। ये वो लोग हैं जिन्होंने स्वतंत्रता सेनानी का सर्टिफिकेट ले लेकर सरकारी नौकरी के पीछे नहीं भागे। या, देश की आजादी में दिए योगदान के बदले न तो ज़मीन पर कब्जा किया। न तो संस्थाओं को जबरी का हथियाया। हर पीढ़ी अपने दम पर पढ़ी जमीन से अन्न उगाया, परिवार का भी पेट भरा और समाज का भी।

असल में रंजना के परदादा श्री रामधारी मिश्र ने चौरी चौरा काण्ड में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

सन 1922 में हाटा बाजार, तहसील मुख्यालय था और गोरखपुर – कसया पक्के मार्ग पर स्थित था। चौरी चौरा थाने से हाटा, सड़क मार्ग की दूरी वाया गौरी बाज़ार, 28 किलोमीटर है। देहाती मार्ग से यह दूरी 18 किलोमीटर के लगभग होगी। हाटा सब डिवीजन का गठन, देवरिया से अलग कर 1905 में किया गया था। दोनों के सब डिवीज़नल मजिस्ट्रेट देवरिया में ही निवास करते थे। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान अधिकारियों की कमी हो जाने के कारण कसया और देवरिया सब डिवीजन को अस्थायी रूप से एक कर प्रशासन चलाया जा रहा था। हाटा का प्रशासन भी उन्हीं के अंतर्गत था। श्री रामधारी मिश्र का लगभग पाँच बीघे का बगीचा था। यह पाँच बीघे का स्थान हाटा को मुंडेरा बाजार, डुमरी खुर्द, पिपरहिया, बाले और चौरा से कनेक्ट करता था। 22 जनवरी 1922 को सरकारी दलालों ने हाटा बाज़ार में असयोग आंदोलन में सहभागिता न करने के समर्थन की सभा की। इससे रामधारी मिश्र, द्वारकानाथ द्विवेदी, शिकारी खान, बिंदेश्वरी सैंथवार, जंगी अहीर इत्यादि लोगों ने असहयोग आंदोलन को सफल बनाने की योजना बनाई। इसके लिए 01 फरवरी 1922 को एक आम सभा का अयोजन हुआ।

यह सभास्थल कहीं और नहीं बल्कि रामधारी मिश्र जी का वो पांच बीघे का बगीचा था।

यहाँ किसानों की सभा हुई। कोई स्टार नेता नहीं था उस सभा में। सबने अपने अपने अनुसार अपनी भावनाओं को व्यक्त किया। फिर 4 फरवरी 1922, शनिवार को सुबह डुमरी खुर्द में सभा हुई। इसमें पुलिस ने गोलियाँ चलाईं। इसमें अनेक निहत्थे किसानों की जानें गयीं। इसके बाद के आक्रोश की प्रतिक्रिया सबको पता है।

आज हमारी प्रदेश सरकार की पहल पर जन जन तक चौरी चौरा की यशोगाथा पहुँच रही है। इसी चौरी चौरा ने अपने स्वर्णिम पड़ाव और हीरक पड़ाव को भी स्पर्श किया होगा। लेकिन किसी को भी इस ऐतिहासिक भूमि और घटना की सुधि नहीं जागी। वो शायद इसलिए भी हो सकता है कि ये स्थान राजधानी से काफ़ी दूर रहा। और दूसरा कारण यह है कि यह वारदात शुद्ध रूप से किसानों पर किसानों द्वारा की गई थी। ख़ैर, कुछ भी हो वर्तमान शासन इस पहल के लिए प्रशंसा का अधिकारी है।

मेरे कहने का सिर्फ इतना आशय है कि इतिहास सिर्फ़ दिल्ली, लखनऊ या बड़े शहरों में नहीं है। देश का हर कस्बा, बाजार, गाँव, घर, परिवार और व्यक्ति ने देश को बनाया है। वो सब इस देश के स्वर्णिम इतिहास के हिस्से होने चाहिए थे। ऐसे अनेक रामधारी मिश्र रहे होंगे जिन्होंने हर सम्भव कदम उठाए देश आजाद कराने में। हाँ, इतना ज़रूर है कि आज उनके वंशज जबरदस्ती का कोट के ऊपर जनेऊ पहनकर नहीं दिखाते। स्वंत्रता सेनानी परिजन की पेंशन नहीं खाते। वो अपने पूर्वज की भाँति मेहनत करना जानते हैं। पूर्वजों पर गर्व करना जानते हैं।

आज चौरी चौरा के सौ बरस होने पर सबको ढेर सारी बधाई। स्व0 रामधारी मिश्र जी को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि। उनकी यशस्वी प्रपौत्री रंजना का हार्दिक अभिनंदन।

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