डिबरी, गंगा, समंदर और उसका गोपी चन्दर

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दादी को गुजरे ज़माना हो गया है। हप्पू और डिबरी भी अब सयानी हो गई है। दोनों बेटियाँ अपने अपने क्षेत्र की माहिर हो गई हैं। जब दिमाग़ में अतीत की आँधी चलती है तो बच्चों की बचकानी लेकिन मासूम हरकतों की यादों से होठों पर मुस्कान और आँखों में नमी आ ही जाती है।

डिबरी के पापा नवीन अपनी बेटियों के बचपन की बातों में खो गए थे। डिबरी जो एकदम निडर और शैतान बेटी थी अब वो इतनी बड़ी हो गई है कि उसे घर आने से पहले जाने का दिन तय रहता है। वहीं उसकी बड़ी बहन हप्पू भी बड़े महानगर की निवासी हो चुकी है। उसको तो घर की याद मास छह मास में आती है।

यही सब बातों को याद करते करते नवीन अपने उस पुराने कमरे में गया जहां उसकी दादी के सामान थे। उसमें तांबे के सिक्के, पुराने ज़माने पन डिब्बा….और एक शीशी जिसमें लगे टिन के ढक्कन को छेदकर उसमें सूती कपड़ा लगा था जो जलकर बत्ती हो गया था। उसमें से मिट्टी के तेल की महक आ रही थी। उस शीशी का अस्तित्व बदलकर डिबरी बना दिया गया था।

डिबरी (लैंप का देसी रूप) को देखकर नवीन को अपनी दूसरी बेटी का जन्म याद आ गया। नवीन के यहां रोज शाम को सूरज के डूबने के बाद संझ-बाती की जाती थी। संझबाती के वक्त दादी या उसके पापा आले/ताखे में रखी डिबरी में तेल में डूबी बत्ती जला दिया करते थे।

यही गोधूली वेला का समय हुआ होगा। घर में संझबाती के लिए डिबरी जलाई जा रही थी। तभी घर में हप्पू की छोटी बहन के आगमन की सूचना मिलती है। एकदम नरम सूती धोती में लिपटी, उस कपास के फ़ाहे सी गुड़िया का माथा चूमते हुए उसकी दादी ने कह दिया , “इस रोशनी के टुकड़े को तो… डिबरी कहूँगी मैं, हाँ!” बड़े प्यार से बड़ा किया था उन्होंने डिबरी को। लेकिन कुछ वक़्त पहले वो भी उसे छोड़कर चली गयी थीं। तब से जब जब डिबरी को दादी याद आती थी, तब तब गंगा भी याद आती थी। क्योंकि उसकी दादी का अंतिम संस्कार गंगा के किनारे ही हुआ था। तबसे उसके मन में ये बात जम सी गयी कि दादी गंगा के पास हैं। वहाँ एक न एक दिन उसे वापस जरूर मिल जाएंगी।

….और इधर आजकल उसे दादी और गंगा की बेहद याद आ रही थी। उसको लगता था कि दादी उसे हर जगह देख रही हैं।

सपनों में बहुत ताक़त होती है। ख़ास तौर से अगर वो किसी बच्चे की आँखों में झिलमिला रहे हों। और अगर वो आँखे हमारी नन्हीं सी डिबरी की हों, फिर तो उन सपनों को सच होने से कोई रोक ही नहीं सकता। जैसे जब वो अपनी भूरी आँखें गोल-गोल करके  कहती है, “क्यों हप्पू दीदी, दादी ने वो जलपरी वाली कहानी सुनाई थी न हमको? अब देखना… रामनगर का राजकुमार आएगा और गंगा उस पार रेत में रहने वाले राक्षस को बड़ूम बड़ूम से मार देगा और वो ढिमला जाएगा, हाँ!” डिबरी जब ये बात बताती तो हप्पू खुशी से उछलने लगती।

फ़िर वाकई आने वाले दिनों में उस कस्बे में एक-आध रेतीली आंधियां आ ही जातीं और सुदूर बनारस की वो सामान्य-सी घटना डिबरी के लिए बेहद ख़ास हो जाती।

“देखा न पापा?”  कहते हुए वो खुले आँगन में जोर-जोर से दौड़ती, तो पापा उसे खींचकर अंदर लाते हुए जल्दी-जल्दी घर के दरवाज़े भेड़ने लगते। वो सीकड़ खींचकर खिड़की के नीचे लगाती और उस पर चढ़कर पुकारती, “देख कितना मजा आ रहा है हप्पू दीदी… राक्षस हू हू करके भाग रहा है!” लेकिन हप्पू घबराकर कोने में दुबक जाती। डिबरी अपनी छोटी-छोटी चोटियाँ घुमाते हुए शीशे की मटकी (एक्वेरियम) में घूमती मछली के पास आकर गाती – “हरा समंदर गोपीचन्दर… बोल मेरी मछली, कितना पानी?”

नाचते हुए उसके नन्हे हाथ ज़मीन पर जाते, फिर कमर तक, फिर सर के ऊपर चले जाते और अपनी दीवार से सट कर वो सुनहरी मछली, जिसका नाम ही डिबरी ने गोपीचन्दर रख दिया था, उसे टुकुर-टुकुर ताकती रहती।

कभी-कभी डिबरी सोचती कैसा लगता होगा इत्ता सारा पानी? कहाँ होता होगा ये हरा समंदर, जो अक्सर पापा की और कभी कभी दादी की हर कहानी में ज़रूर-से चला आता था? उसके नन्हे-से दिमाग़ में ये बातें घूमा करतीं। वो कांच के बर्तन से गाल सटाकर पूछती, “क्यों गोपीचन्दर? क्या तुम्हारे पापा भी समंदर में रहते हैं और तुम्हारी भी दादी आसमान में तारा बनकर हमेशा देखती हैं क्या?” उस वक्त उसकी आँखें बुझ जातीं, होंठ लटक जाते। उसकी मायूसी देखकर दूर बैठे पापा भी उदास हो जाते लेकिन तभी वो मछली जल्दी-जल्दी अपना मुँह चलाती और हप्पू डिबरी से लिपटकर गुदगुदी करने लगती।

डिबरी फ़िक़्क से हँस पड़ती और पापा मुस्कुराते हुए फ़िर किसी किताब में डूब जाते। वैसे उन्होंने ही उसका नाम रजनी चुना था लेकिन वो नाम उसी पल डिबरी में बदल गया, जब उसकी दादी ने उसे गोदी में उठाया था।

रात गहराने लगी थी लेकिन डिबरी की नन्हीं आँखें अभी भी सोच में डूबी हुई थीं। आँगन में बिछी खटिया पर लेटे हुए मच्छरदानी के छोटे-छोटे छेदों से आसमान को ताकते हुए वो अपना सिर कभी एक ओर घुमाती तो कभी दूसरी तरफ़। तारे कभी बायीं तरफ़ दौड़ लगाते तो कभी दांयी तरफ़। जल्द ही वो इस खेल से ऊब गयी। उसे फिर से दादी याद आने लगी। उनके गुलगुले-से पेट में घुसकर लेटने में कैसा मजा आता था! और उनकी वो कहानियाँ रातों से लम्बी हुआ करती थीं।

उसने खटिया में बिछी कथरी में खुंसी-हुई मच्छरदानी ढीली की और गर्दन बाहर निकालकर धीरे-से पुकारा – “हप्पू दीदी… ओ हप्पू दीदी!“
बगल की खटिया में लेटी हप्पू उसे देखती और खिस्स से हँस देती। डिबरी ने उंगली ऊपर उठाते हुए कहा – “तुझे क्या लगता है, दीदी… दादी भी तारा बन गयी होंगी क्या?”

हप्पू ने उठकर ऊपर आसमान की ओर देखा, फिर डिबरी की ओर, फिर कुछ “ओफ्फोह” के अंदाज़ में वापस मुँह घुमा लिया। फिर वो हप्पू के पास जाकर उसके बगल में लेट जाती है। उसके सर पर हाथ फेरते हुए डिबरी बोली “पता है दीदी, मुझे लगता है यहां से जाकर दादी तारा नहीं जलपरी बन गयी होंगी। उन्हें गंगा और समंदर, सागर  कित्ता अच्छा लगता था न! लेकिन वो गयी ही क्यों?”

उसके गाल पर आँसू की एक बूंद ढुलक आयी तो हप्पू बैठ गई और डिबरी को गले लगा लिया। उसको हप्पू ने माथे और पीठ पर थपकी दी और लेटा दिया। डिबरी ने करवट लेकर कोने में रखे बर्तन में तैरते गोपीचन्दर की तरफ़ देखा। चाँदनी में उसका सुनहरापन उभर आया था। डिबरी ने पूछा “तुम्हारा घर भी तो समन्दर में है ना! बताओ, क्या दादी वहाँ पर होंगी?” लेकिन उसने भी कोई ख़ास तवज्जो नहीं दी। बस दाने चुभलाते हुए तैरती रही।
डिबरी ने दोबारा आसमान पर नज़रें टिका दीं।
कुछ देर बाद डिबरी उतरी, और पापा की खटिया की मच्छरदानी उठाके उनके बग़ल में लेट गयी। पापा ने नींद में ही उसको थपकते हुए पूछा, “उम्म… नींद नहीं आ रही क्या बिटिया?”
डिबरी ने सिर ना में हिला दिया। पापा कुछ लोरी जैसी बुदबुदाने लगे। डिबरी ने उनका हाथ हिलाया, “पापा पापा… समन्दर में बहुत पानी होता है क्या?”
“हम्म” पापा बुदबुदाये।

“लोटे से ज्यादा? बाल्टी से भी ज्यादा?” डिबरी ने पूछा, तो उनींदे पापा  बोले, “हाँ हाँ… स्कूल के पास वाले पोखर से भी ज्यादा!  बहुत ज्यादा, अब सो जा!”

डिबरी ने जितना हो सकता था उतनी दूर अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाए। इतना पानी, मतलब कितना पानी? पोखर में तो भैंस भी डूब जाती है, उससे भी ज्यादा पानी? मतलब, स्कूल भी अंदर चला जाये, उतना सारा पानी? इस सोच पर उसे हँसी आ गयी। अब तो पक्का था दादी भी वहीं कहीं होंगी और ख़ूब मजे कर रही होंगी। एक बार फिर उसने पापा को हिलाया “हम समन्दर देखने चलेंगे क्या? पापा… पापा… चलेंगे न!”

“हूं बेटा… चले चलेंगे” नींद में पापा ने कह तो दिया, पर वो ये नहीं जानते थे कि डिबरी उनकी इस हाँ को भूलने वाली थी नहीं।

अगली सुबह पापा ने जल्दी-जल्दी डिबरी को तैयार किया, उसे और हप्पू को नाश्ता दिया। ख़ास डिबिया से निकालकर गोपीचन्दर को उसके खाने की छोटी-छोटी गोलियां डालीं, फिर रोज की तरह डिबरी को बगल वाली काकी के यहाँ छोड़कर अपने स्कूल चले गये, जहां वो काम करते थे।

इधर पूरे दिन डिबरी के पेट मे गुदगुदी होती रही कि कब पापा स्कूल से लौटेंगे और कब वो दोनों समंदर के लिए निकलेंगे। उसने अपनी किताबें- कॉपियां निकालीं लेकिन आज उसे कोई पहाड़ा, कोई स्पेलिंग न सूझ रही थी। पैरों में जैसे स्प्रिंग लग गये थे, जो उसे चैन से बैठने नहीं दे रहे थे। कई बार वो काकी को भी बता चुकी थी कि “पापा मुझे समन्दर दिखाने ले जाने वाले हैं, हाँ!”

पर ऊंचा सुनते हुए काकी पूछ लेतीं  “हैं, बंदर दिखाने? निरे तो भरे पड़े हैं बंदर यहाँ–वहाँ। इसमें कौन–सी खास बात है?”

तो कभी कहतीं “मन्दर जाएगी क्या? मेरी भी हाजिरी लगा आना…”

ऊब कर डिबरी ने सोच लिया वो ये वाली बात किसी और को नहीं बताएगी। अपनी नीली छींट वाली फ्रॉक का घेरा उठाकर वो गोल-गोल घूमने लगी, इतनी तेज़ कि उसकी चोटी में बंधा रिबन नीचे सरक आया। डिबरी की हँसी उस शाम ऐसी छिटकी कि काकी के बगीचे में ढेरों नीले-बैंगनी फूल खिल आये थे।
शाम को पापा साइकिल के हैंडिल पर समोसे की थैली लटकाये लौटे और हैरान रह गए, जब बजाय समोसे पर टूट पड़ने के डिबरी पूछने लगी, “अब समन्दर देखने चलें?”

पापा की समझ न आया कि क्या कहें। नींद में किया वादा वो तो भूल चुके थे। उधर उनका हक्का-बक्का चेहरा देखकर डिबरी का मुंह लटक गया। हप्पू ने अपना आधा खाया समोसा छोड़ दिया, गोपीचन्दर ने भी मुँह दूसरी तरफ फेर लिया। डिबरी की सीप जैसी आँखों से मोती बस टपकने को ही था कि पापा ने झट उसे गोदी में उठा लिया और उसके गाल पर प्यार करते हुए बोले “चलो, कल ही स्कूल में छुट्टी के लिए अप्लाई कर देता हूँ। फिर चलते हैं समंदर देखने!”

फिर तो डिबरी की खिलखिलाहट से उनका छोटा-सा घर गूँज गया। फ़टाफ़ट वो एक बैग में अपनी फ्रॉकें, सैंडल, कंघी, रिबन और अपनी गुड़िया वगैरह इकट्ठा करने लगी। फिर एक शाम गोपीचन्दर को काकी के यहाँ छोड़कर उन्हें प्यार से “बाय, जल्दी आऊँगी, अच्छा!” कहकर हप्पू और डिबरी पापा के साथ चल दिए।

ये समन्दर तो दोस्त था। उसके साथ कबड्डी खेल रहा था। खिसकती हुई रेत उसके तलुओं में गुदगुदी करती, तो वो तालियाँ बजाते हुए कूदने लगती। डिबरी की छोटी-सी दुनिया अचरज से भरती चली गयी, “पापा… ये देखो सीपियाँ… और यहां वाली रेत तो कितनी शैतान है न, बार–बार मुट्ठी से फिसल जाती है। और पापा… कित्ती–सारी छोटी–छोटी मछलियाँ भी हैं… और न…”

तभी उसकी अगली बात ने पापा को चौंका दिया। वो मासूमियत से कह रही थी , “हम समन्दर को अपने साथ लेकर घर चलेंगे। ठीक है पापा?”

रास्ता लंबा था। सफ़र में पूरा दिन गुज़र गया। बस यूपी, एमपी, राजस्थान पार करते हुए  गुजरात मे दाख़िल हुई और फिर समुद्री तट की तरफ चल दी। चमकती आँखों से डिबरी खिड़की के बाहर देख रही थी। अब हवा में एक नम-सी ख़ुशबू आने लगी थी कुछ-कुछ वैसी ही, जैसी दादी के पास से आया करती थी। डिबरी की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। कैसा होगा समंदर? क्या दादी होंगी वहाँ?

अगले दिन का सूरज मानो आसमान में नहीं बल्कि डिबरी की आँखों के सुनहरे बादलों के बीच उगा। पूरे रास्ते उसकी कल्पनाओं ने उसे जगाए रखा था। कितने बित्ते का होगा दादी का समंदर, जहां से राजकुमार रेत के राक्षस को मारने जाता है। जहां चाँदनी रात में जलपरी बाजा बजाती है। जो अच्छे बच्चों से दोस्ती कर लेता है, उनसे बातें भी करता है। ढेरों बातें उसके दिमाग़ में एक तरफ से आतीं और दूसरी तरफ से निकालती जातीं। क्या उसमें कागज़ की नाव तैरा पाएंगे? क्या छप-छप कर पाएंगे?  गोपीचन्दर जैसे और भी फ्रेंड्स वहाँ रहते होंगे क्या? जब वो ख़ुद को रोक नहीं पाती तो  “पापा… पापा” करके एकाध सवाल ज़ोर से पूछ ही डालती लेकिन पापा उनींदी आवाज़ में कह देते “बस पहुंचने ही वाले हैं बिटिया… तू  ख़ुद-ही  देख लेना।”

लेकिन तब तक उसके मन में घुमड़ते सवाल कहाँ बंधने वाले थे? डिबरी पापा की गोद मे रखे बैग से टटोलकर बिस्किट का पैकेट निकाला और कुटुर-कुटुर खाने लगी। फिर पानी की बोतल निकाली तो एक बार फिर ख़्याल आ गया कि दूध तो सफेद होता है और शर्बत लाल। लेकिन फिर “बोल मेरी मछली” वाली कविता में समन्दर हरा कैसे होता है, जबकि गिलास के पानी का तो कोई रंग ही नहीं होता। तो फिर क्या उसके ऊपर घास का मैदान होता है? क्या उस पर खेल भी सकते हैं?

आख़िरकार उनकी मंज़िल आ गयी। स्टैंड पर बस के रुकते ही लोग धीरे-धीरे नीचे उतरने लगे। ज़्यादातर लोग किसी न किसी काम से यहाँ आये थे। उनमें से किसी के होठों से मुस्कुराहट ऐसे नहीं फूटी पड़ रही थी जैसी कि डिबरी की। किसी की आवाज़ इतनी मीठी नहीं थी जितनी कि “जल्दी चलो न पापा। कहीं समन्दर कहीं और चला गया होगा तो?” पुकारती डिबरी की थी। फिर जैसे उसकी साँस ही अटक गई। उसके सामने अब बड़ा-सा आसमान की तरह आलीशान समंदर था।

हे भगवान, इत्ता सारा पानी! स्कूल से घर तक फ़ैल जाए इतना नहीं बल्कि दस, बीस, पचास, सौ स्कूल से घर तक डूब जायें! इससे भी ज्यादा पानी। और इतनी तेज़ आवाज़! एक बार डिबरी ने एक सर्कस में हाथी देखा था। जैसे वो चिंघाड़ता था, उससे भी तेज आवाज़ थी इस समन्दर की। डर के वो पीछे हट गयी। पापा ने मज़बूती से उसका हाथ पकड़े रखा।
कुछ पलों बाद हिम्मत करके उसने लहरों को छुआ फिर थोड़ा आगे बढ़कर उसमें पाँव डाल दिये। इस बार उसकी मुस्कुराहट एक से दूसरे कान तक फैल गयी। ये समन्दर तो दोस्त था। उसके साथ कबड्डी खेल रहा था। खिसकती हुई रेत उसके तलुओं में गुदगुदी करती तो वो तालियाँ बजाते हुए कूदने लगती। पापा हौले-से मुस्कुराते हुए शून्य में कहीं निहारते रहे। और डिबरी की छोटी-सी दुनिया अचरज से भरती चली गयी “पापा… ये देखो सीपियाँ… और यहां वाली रेत तो कितनी शैतान है न, बार-बार मुट्ठी से फिसल जाती है। और पापा… कित्ती-सारी छोटी-छोटी मछलियाँ भी हैं… और न…”

तभी उसकी अगली बात ने पापा को चौंका दिया। वो मासूमियत से कह रही थी “हम समन्दर को अपने साथ लेकर घर चलेंगे। ठीक है पापा?”

हो सकता है कि आसमान के शामियाने को बाँधा जा सके, हवाओं को लम्बी-सी बांसुरी में कैद किया जा सके, चाँद पर चरखा कातती दादी से बात-चीत हो जाये या फिर ग्रह-नक्षत्रों से किसी रोज़ फुटबॉल खेली जाये। लेकिन ये नहीं हो सकता, कि एक बच्चे की मासूम ख़्वाहिश ठुकराई जा सके।

अब डिबरी ने भी पापा के सामने एक भोली-सी इच्छा जाहिर कर दी थी। अब बेचारे पापा के सामने “अच्छा बिटिया” कहने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। फिर भी वो पूरी कोशिश में थे कि डिबरी के दिमाग़ से वो समंदर को घर ले जाने वाली बात निकल जाए। उन्होंने डिबरी को हवा में घूमने वाली लाल-हरे पतंगी कागज़ की चकरी दिलाई, गुलाबी और लज़ीज़ बुढ़िया के बाल यानि कैंडी फ़्लॉस दिलवाये, बाइस्कोप में खेला भी दिखवाया।
डिबरी की ज़िंदगी का ये सबसे यादगार दिन था।  पूरा दिन वो खेलती रही। दोपहर को एक चट्टान पर बैठकर वो गौर से सामने देखती रही। कितनी मज़े की बात थी कि हरा-नीला समंदर आसमान पर चढ़ गया था या फिर आसमान ही नीचे उतर आया था। या फिर दोनों ही छुपन-छुपाई खेलते हुए दादी के आँचल के पीछे छुप गये थे। ऐसे ही रंग की धोती तो पहनती थीं न दादी। शाम होते-होते उनकी याद एक बार फिर डिबरी को रुआँसी करने लगी। तभी लाल-लाल सूरज लुढ़कते-पुढ़कते आया और झम्म से पानी मे कूद गया। हैरानी से उसका मुँह खुला-का-खुला रह गया। वो ख़ुद नीचे गिरते-गिरते बची। पापा ने जल्दी से उसे पकड़ लिया, लेकिन तब तक वो दूर पानी की सतह से ऊपर कुछ पल को उभरे पँखों को देख चुकी थी।
“पापा… पापा… वो जलपरी है न?” पापा कुछ डॉल्फिन के बारे में समझाने को हुए फिर रुक गए। बोले “हाँ बिटिया!“

“ह्म्म्म..” डिबरी खिलखिला उठी, “दादी समन्दर की मछलियों की रानी बन गयी है न?”  पापा कुछ पल रुके, फिर बोले, “हाँ बिटिया”

डिबरी कूद कर उनकी गोद मे बैठ गयी, “मैंने समन्दर को समझा दिया है कि वो अच्छे बच्चे की तरह रहे। किसी को परेशान न करे। हम समन्दर को अपने साथ ले चलेंगे न?”

पापा ने लाचारी से इधर-उधर देखा फिर कंधे उचकाकर कहा, “हाँ बिटिया।”

जब उनकी बस वहाँ से रवाना हुई तब तक सब ठीक हो गया था। पापा और डिबरी एक दूसरे की ओर मुस्कुरा रहे थे। केवल वो दोनों ही जानते थे कि बस की छत पर चुपचाप बैठा समन्दर उनके साथ जा रहा था। मारे ख़ुशी के डिबरी की कसमसाहट थम नहीं रही थी। सुबह अचानक बाहर पानी गिरने लगा। हैरान लोग खिड़कियाँ बन्द करते कहने लगे कि – “ओहो… ये बारिश कैसे होने लगी?”

लेकिन डिबरी खिड़की से लटक कर ऊपर की तरफ देख रही थी। भीगते हुए मुस्कुरा रही थी। उसे पता था कि बस के जोर से हिलने की वजह से समन्दर  छलक आया था। बूंदों को अपनी छोटी-सी अँजुरी में भरकर खेलते हुए वो सोचती जा रही थी कि घर में गोपीचन्दर को समन्दर का आना कैसा लगेगा?
अगली दोपहर बस उनके कस्बे पहुँची। डिबरी को बड़ा मजा आया कि समन्दर ने इतनी होशियारी से ख़ुद को छिपाया हुआ था कि बस की छत पर समान उतारने चढ़े लोगों को वो दिखा ही नहीं। फ़िर ठुमकती हुई वो पापा की उंगली पकड़े घर की ओर बढ़ती जाती। जब उसे लगता कि समंदर कहीं पीछे तो नहीं रह गया तो ठिठक कर फुसफुसाती, “अरे पापा… धीरे चलो न। उसे हमारे घर का रास्ता थोड़े ही पता है। कहीं खो गया तो?”

पापा तुरन्त कंधे पर लटका बैग ठीक करते हुए अपनी चाल धीमी कर लेते।
घर से कुछ दूर ही उसने आवाज़ लगाई – “ओ गोपीचंदर!”

काकी के घर में घुसते ही गोपीचंदर से कहा कि हँसते “देख…पीछे वाले मोड़ पर…वो समन्दर है न… वो हमारा दोस्त है… समझे? उससे चिढ़ना मत।”

सब लोग घर पहुंचे और समन्दर घर की छत पर पसर गया। फिर कस्बे का मौसम कुछ दिनों के लिए बदल गया। पापा ने स्कूल में कुछ ट्रॉपिकल हवाओं को इसकी वजह बताया। काकी कोई 20-30 साल पहले की घटना बांचने लगीं जब रेगिस्तान में लगातार बारिश हुयी थी। लेकिन डिबरी इसकी असली वजह जानती थी। वही सुन पाती थी लहरों की सुबह-सुबह वाली गुड़-गुड़ की आवाज़ जो छत से आती थी और जो कभी-कभी रात में गड़-गड़ में बदल जाती थी। डिबरी के साथ सभी लोग खुश थे लेकिन जाने क्यों गोपीचन्दर दिनों-दिन सुस्त होता जा रहा था। अब वो धीरे-धीरे तैरता दाने भी कम टूंगता।

एक शाम अपने आँगन में गोल-गोल घूमते हुए, डिबरी अपनी वही पसन्दीदा कविता गा रही थी “हरा समंदर गोपीचन्दर… बोल मेरी मछली कितना पानी”  तभी उसकी निगाह काँच के बर्तन पर पड़ी। गोपीचन्दर बहुत उदास नज़रों से उसे देख रहा था। अचानक डिबरी को वो मछलियाँ याद आ गईं जो उसने समन्दर में देखी थीं। वो ठिठक गयी। समंदर के यहाँ आने पर वो सब कितनी उदास होगीं। और दादी, वो तो वहाँ बिल्कुल अकेली रह गयी होंगी। आजकल तो समंदर की लहरों की आवाज़ भी अब तो चीड़ के पत्तों से टकराती हवा जैसी लगने लगी थी। तो क्या वो भी उदास था?

डिबरी लगातार सोच में डूबी रही। फिर एक रात, वो बांस की सीढ़ी टिकाकर वो छत पर चढ़ गई। चांद की धुंधली रोशनी में चमकती छत देखकर लग रहा था मानो समन्दर सोया हुआ हो।

वो फुसफुसाई “सुनो दोस्त! सुबह की बस से… तुम अपने घर चले जाना। वहाँ गोपीचन्दर के पापा का ध्यान रखना और मेरी दादी का भी। अच्छा?”  फिर अपने आंसुओं को पोंछते हुए वो उतर आई  और पापा की मच्छरदानी में घुसकर सो गई।

बाद में कई दिनों तक कस्बेवाले इस अजीब-सी रात के बारे में बातें करते रहे जब पहले हल्की बारिश हुई और बाद में भयानक धूल भरी आँधी चलने लगी थी। ‘ग्लोबल वार्मिंग’ पापा ने स्कूल में यही बताया था लेकिन  डिबरी जानती थी कि समंदर वापस लौट गया है।

तभी ज़ोर से बदल गरजने की आवाज़ सुनाई देती है। नवीन के हाथ से वो डिबरी छूट जाती है। नवीन एकदम से घबरा जाता है और देखता है कि कहीं कोई नहीं है। वो पिछले कई घण्टों से उस डिबरी को देखकर अपनी बेटी हप्पू और डिबरी को याद कर रहा था। यादों के सफर से बादलों ने उसे बीच रास्ते में ही उतार दिया।

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