तू खुद अमिट निशानी थी – महारानी अमरत्व दिवस

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दुनियाभर के महान लोगों के इतिहास में केवल दो ऐसे व्यक्तित्व हैं जिन्होंने अपने जीवन को नहीं बल्कि मौत को डिज़ाइन किया। वो दो नाम हैं मणिकर्णिका राव (महारानी लक्ष्मीबाई) और दूसरा सरदार भगत सिंह संधू। इनदोनों ने अपनी 23 साल के जीवनकाल में जो किया वो तो शायद कोई याद नहीं करता लेकिन इनकी मौत को हर कोई याद करता है।
केवल 23 साल की उम्र होती क्या है…? आज की बात करें तो 23 साल का लड़का आज या तो कॅरियर के लिए व्याकुल रहता है या ईश्क की तलाश में तमाम सोशल साइट्स पर अपने स्टेटस अपडेट करता है। अगर 23 साल की लड़की हो तो, उसमें भी दो कंडीशन है, अगर वो लड़की गांव की है तो उसकी शादी की तैयारी फाइनल स्टेज में पहुंचती है और शहर की लड़की हुई तो वो कॅरियर के लिए देश विदेश के बेहतरीन कॉलेज में जाने की आकांक्षा रखती है। यही हाल उस जमाने (सन 1857 और 1931) में भी था। लोग या तो अंग्रेजों की मार सहते थे या विदेश में बैरिस्टर की डिग्री लेते थे।
युवा तो छोड़िये किसी भी इंसान के मुंह से उस जमाने में ये नहीं निकला कि ये भारत मेरी भूमि है मैं इसे किसी को नहीं दूंगा/दूंगी। ये आवाज काशी में जन्मीं मनु यानी मणिकर्णिका यानी महारानी लक्ष्मीबाई के मुंह से निकली कि मैं अपनी झांसी अंग्रेजों को कभी नहीं सौंपूंगी। ……….और यही हुआ। महारानी ने अपने जीवन को नहीं बनाया बल्कि मौत की चिता खुद सजाई। उन्होंने डलहौजी और वॉकर को बुरी तहह से परास्त किया। इसके बाद ह्यूरोज ने उन्हें घेरकर तब मारा जब रानी निहत्थी हो गईं थीं।
रानी को पीछे से कटार से पहला वार लगा। ये वार उनके सिर की बाईं ओर लगा था। इससे उनकी बाईं आंखें बाहर आ गई थीं। इसपर भी रानी ने हार न मानी। मरना तो है क्यों न अपने हिसाब से मौत को निमंत्रित किया जाय। कुछ ऐसी ही रानी की सोच रही होगी। रानी ने उस अंग्रेज के हाथों कटार छीनकर उसको परलोक की यात्रा करा दी। फिर जब रानी ने देखा कि अब चारों ओर से घिर गई हैं तो उन्होंने अपनी चिता खुद सजाई। और सौंप दिया खुद अग्नि के हवाले।
इसी प्रकार सरदार भगत सिंह संधू का जीवन भी है। जिन लोगों को सरदार भगत सिंह संधू एक मार्क्सवादी या नास्तिक या पता नहीं क्या क्या नजर आते हैं उन्हें भगत सिंह से बात करनी चाहिए। ये लोग असल में कभी मरते नहीं हैं। अमर होते हैं। हम जब भी किसी मुसीबत में होते हैं तो इन्हें बुलाकर इनसे उन समस्याओं का हल जाना जा सकता है। भगत सिंह, जो कुल 23 साल पांच महीने और 26 दिन का सिख गबरू जवान था, उस नौजवान के लिए राजगुरु ने अपने एक पत्र में लिखा है कि भगत सिंह को लड़कियों से बचाते बचाते मेरी कमर टेढ़ी हो गई है। उस समय भगत और राजगुरु लाहौर के कॉलेज में पढ़ते थे।
असल में बात भगत सिंह की हो या महारानी लक्ष्मीबाई की। दोनों ही 23 साल की उम्र में अमर हुए। इनके लिए कोई भी कयास लगाकर उसे उनकी जिन्दगी का फिक्स हिस्सा नहीं माना जा सकता। इन लोगों के लिए ऐसा कभी नहीं कहा जा सकता कि ये लोग ऐसे थे या वैसे थे, ये किये थे, या वो किये थे। इनके लिए सिर्फ एक परसेप्शन गढ़ा जा सकता है वे लोग ऐसे भी रहे होंगे, ऐसा किये होंगे। क्योंकि इन्होंने वो किया जो बीते हजारों वर्षों में न तो किसी ने किया था और आने वाले दिनों में सोचना भी बेकार है। इतना वर्सटाइल पर्सनॉलिटी का अध्ययन इतने संकोच के साथ नहीं होना चाहिए था। जिस भगत सिंह को एक दस्तावेजी किताब पढ़कर उन्हें नास्तिक बताया जाता है उन भगत सिंह के पास चार वस्तुएं हमेशा होती थीं। ये सामान थे उनके ऊपर शर्ट की जेब में सरदार करतार सिंह सरापा की फोटो, स्वामी विवेकानंद की जीवनी, श्रीमदभगवतगीता और एक अपडेटेड डिक्शनरी। जिस प्रकार महारानी लक्ष्मीबाई की मौत हुई उसी तरह इस नौजवान ने भी मौत को गले लगाया। सरदार भगत सिंह को लगभग 11 घंटे पहले फांसी दी गई।
इसकी खबर भी स्थानीय लोगों को लग गई। लोग जमा होने लगे। अंग्रेज अधिकारी ने पीछे की दीवार तोड़कर भगत सिंह की लाश को टुकड़ों में कटवाता है। लगभग उनके 13 या 14 टुकडे़ किये जाते हैं। इसके बाद फिरोजपुर हाईवे के सतलज नदी पुल के बैराज संख्या 12 और 13 के बीच से उनके टुकड़ों को फेंक दिया जाता है। गांव वालों को कुछ टुकड़े मिलते हैं, कुछ बह जाते हैं। किसी तरह अवशेषों की अंतिम क्रिया होती है।
कहने का आशय यह है कि महारानी लक्ष्मीबाई और सरदार भगत सिंह, दो ऐसे नाम हें जिन्होंने अपनी मौत को ऐसे डिजाइन किया कि उनकी जब भी चर्चा होगी तो आंखें अपने पानी के रास्ते उन्हें नमन करेंगी ही।
हमारी शिक्षा व्यवस्था में जिस प्रकार पोरबंदर में जन्म लेने वाले महात्मा की जीवनी कक्षा 1 से पढ़ाई जाने लगती है उसी प्रकार इन दोनों विभूतियों की जीवनी क्यों नहीं रटवाई जाती। देश में कितने प्रतिशत लोगों को अमर भगत सिंह का पूरा नाम पता होगा। कितने लोगों को यह मालूम होगा कि उनका पूरा नाम सरदार भगत सिंह संधू था। इसी प्रकार उनके पिता, माता, जन्मभूमि शायद ही किसी को पता हो। कारण इसका यह है कि ये लोग अपनी शानदार मौत को खुद डिजाइन किये और बाकी ने अपनी जिन्दगी बनाई।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।

तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

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