नाज़ है दोस्ती अपनी पर

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फ्रेंडशिप डे स्पेशल

इंसान के जन्म लेने के साथ ही बहुत से रिश्तों का भी जन्म हो जाता है। ज़िंदगी के नब्बे या यूं कहें 99 प्रतिशत रिश्ते हमारे ऊपर थोपे जाते हैं। यहाँ कि पड़ोसी का भी रिश्ता ज़बरदस्ती का होता है। बाकी तो रिश्तेदारों की फौज लगी हुई रहती है।

इन रिश्तों की बाढ़ में एक रिश्ता ऐसा होता जिसे हम खुद बनाते हैं। कोई हम पर थोपता नहीं है। वो रिश्ता है दोस्त का, दोस्त की दोस्ती का। दोस्ती एक ऐसा एब्सट्रेक्ट नाउन है जो ज़िन्दगी भर महसूस होती है। और दोस्त वो प्रॉपर नाउन है जो बिना एक दूसरे की टांग खींचे रिश्ता पूरा नहीं किया जा सकता।
फ्रेंडली फाइट का मज़ा ही अलग है। बचपन में दोस्त की टिफिन खाना। उसकी कॉपी चुराना। कभी कभी मार पीट भी कर लेना। लेकिन इन सबके बाद भी साथ रहना। ये जज़्बा सिर्फ दोस्ती ही जगाती है।

ईश्क की बस्ती में नग़मा निगारी कर महबूब की ज़ुल्फ़ों, नयनों, हुस्न के तराने तो खूब गाये जाते हैं। ईश्क की बस्ती असल में महबूब के गोश्त की दुकान बन जाती हैं। वहीं दोस्ती के लिए वैसे तो बहुत कम लिखा गया लेकिन जो लिखा गया वो बहुत देर और दूर तक साथ देने वाली अमर पंक्तियाँ हुईं।

अगर अनुपात लगाया जाए तो ईश्क और दोस्ती में सौ:एक (100:1) का अनुपात होगा। यानी सौ शेर या गाने ईश्क के लिए हुए तो एक शेर या गाना दोस्ती के लिए गाया गया। लेकिन जो गाना दोस्ती के लिए आया वो कालजयी बना। जैसे:- तेरे जैसा यार कहाँ, ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे इत्यादि।

आज मतलबी और मज़हबी कारखानों में ईश्क मिलना आसान है लेकिन दोस्त और दोस्ती मिलना लगभग नामुमकिन। अगर किसी ने ज़िन्दगी में एक दोस्त कमाया तो आपने ख़ुदा का दीदार कर लिया। आपका दिल शीशे की तरह साफ हो जाता है। दोस्त एक एहसास है, दोस्त एक विश्वास है। दोस्त के लिए इतना विश्वास होता है कि जो बात पापा से, मम्मी से या सबसे अज़ीज़ भाई से, दिल की धड़कन बने महबूब से नहीं कही जाती, वो बात सुनने वाला दोस्त होता है। ऐसे अनेक राज़ का राज़दार हमारा दोस्त होता है। ईश्क में दीवाने अपने महबूब को खून से ख़त तक लिखते हैं, वहीं दोस्ती दोस्त से खून का रिश्ता बना लेता है।

दोस्ती में नाराज़गी होने पर दोस्त को सॉरी कार्ड या उसको भारी भारी अल्फाजों की ज़रूरत नहीं होती। उसके साथ बैठकर बस कैंटीन की एक चाय काफ़ी होती है। एक शब्द “अबे” और “यार” सिर्फ और सिर्फ़ दोस्त के लिए रिजर्व कॉपी राइट होता है। इन दो शब्दों से बरसों की खाई और दूरियां एक सेकेंड में मिटती देखी गई हैं।

हिंदी या उर्दू डिक्शनरी में दोस्ती या दोस्त से छोटा और इससे बड़ा शब्द कोई और नहीं है। ये शब्द कितना छोटा है ये तो तुरंत पता चल जाता है। लेकिन ये कितना बड़ा है, इसका पता तब पता चलता है, जब दोस्ती ईश्क की बस्ती से आगे बढ़ जाती है, महबूब और दोस्त के बीच जब दो राह नज़र आती है तो दिलोदिमाग दोस्ती की ओर झुकता है, असल में वही दोस्ती परवरदिगार तक पहुँचाती है। ईश्क आंखों के ख्वाब उड़ाता और दोस्ती निगाहों में ख्वाबों के नग़में सजाती है। जब ईश्क में हार सामने दिखती है तो एकमात्र पीठपर हाथ रखकर दमदारी से ये कहने वाली आवाज़ साथ देती है कि “अबे छोड़ तोरे लायक नाहीं रहल!”

दोस्त ये भी कहता है कि “अबे बोल तो ओके उठा लिहल जाए।” मतलब जो काम ईश्क की तख़लीक़ नहीं कर सकती वो दोस्ती का साज़ कर देती है। नदियों के किनारे नापकर फ़िज़ाओं में आवारा घूमकर एक अंधेरे बन्द कमरे से अनंत उजालों में वापसी कराने वाला कोई और नहीं बल्कि एक दोस्त होता है।

नाकाम होकर जब मोबाइल स्क्रीन पर किसी की मुस्कुराती हुई फोटो देखकर बेतहाशा चूमते हुए फूट फूट कर जो रोता है, वही तो है ईश्क में खोया दीवाना होता है। और, उस मोबाइल से परेशान करने वाली उस तस्वीर को डिलीट करके नई राह, नया एसाइनमेंट देने का दम देने वाला सिर्फ और सिर्फ दोस्त होता है।

शायरियों की दुनिया में देखा जाए तो महबूब की बेवफ़ाई का कलंक भी दोस्ती और दोस्त अपने सिर लेने को तैयार दीखता है।

जैसे :- दिल अभी पूरी तरह टूटा नहीं, दोस्तों की मेहरबानी चाहिए (अब्दुल हमीद अदम); अब ये देखिए, दुश्मनों से प्यार होता जाएगा, दोस्तों को आज़माते जाइए (ख़ुमार बाराबंकवी) आदि आदि।

दोस्ती और दोस्त उस ख़ुदग़र्ज़ से ख़ुदग़र्ज़ इंसान को; जिसने पूरी ज़िंदगी ‘मैं’ से आगे कुछ सोचा ही नहीं वो एक ‘तू’ पर आकर इस कदर मजबूर हो जाता है कि जैसे समंदर की कोख से निकले सुनामी के आगे एक टूटी हुई कश्ती का मुसाफ़िर बना देती है।

दोस्त आबाद करता है या बर्बाद, कैद करता है या आज़ाद; इन सवालों का जवाब वो न दे सके जिन्होंने पहाड़ों का सीना चीर कर मंज़िल तय कर दीं। या कच्चे घड़े पर कश्मीर की रावी, झेलम या चिनाब का दरिया पार करने निकल पड़ते हैं। इतना दमदार होता है दोस्त। जब पहाड़ नदियाँ और कायनात कुछ नहीं, तो मेरी हैसियत क्या है, दोस्ती के सामने?

लेकिन इतना इत्मीनान से कह सकते हैं कि दोस्ती एक मुबारक अवसर है। दोस्ती इंसान को एहसासमन्द बना देता है। दोस्ती मन को मकबूल कर देती है। दोस्ती ही असल में मोहब्बत को मुकम्मल बना देती है।

बेवफ़ाई या धोखे की आँख से देखें तो दोस्ती वो ज़हर है जिसे पीने वाला वली हो जाता है,
वो धोखा है जिसे खाने वाला अगर ज़िंदा रह गया तो उसे सायनाइट या बन्दूक, पिस्तौल की गोलियों से भी नहीं मर सकता।

दोस्ती शर्तों की बंदिश नहीं बल्कि अनजान गलतियों का वो गुच्छा है जिसकी हर हाल में तरफदारी दोस्त करता है। वसीम बरेलवी साहब कहते हैं, न!
शर्तें लगाई जाती नहीं दोस्ती के साथ,
कीजे मुझे क़ुबूल मेरी हर कमी के साथ।।
और देखिए दोस्ती के तराने,
वो कोई दोस्त था अच्छे दिनों का,
जो पिछली रात से याद आ रहा है।। (नासिर काज़मी)
दोस्ती आम है लेकिन ऐ दोस्त,
दोस्त मिलता है बड़ी मुश्किल से।।
(हफ़ीज़ होशियारपुरी)

अब जिगर साहब को ही देख लें,

आ कि तुझ बिन इस तरह ऐ दोस्त घबराता हूँ मैं,
जैसे हर शय में किसी शय की कमी पाता हूँ मैं।।
(जिगर मुरादाबादी)

मेरी ही कुछ लाइनें हैं,
ज़िंदगी के उदास लम्हों में वो प्यारे दिन याद आते हैं
महबूब तो भूल गए बस पुराने दोस्त याद आते हैं।।

दोस्ती कायरों और बुज़दिलों की पनाह नहीं, शेर दिलों का बंकर है। अगर आप दोस्ती की याद में  टूटे हुए दिल के साथ जी सकते हैं, तो दुनिया की कोई ताकत आपको तोड़ नहीं सकती। दोस्ती का दर्द नसीब वालों को मिलता है। दोस्ती और दोस्त ख़ुदा का रहमती टीला है जिसपर खुशकिस्मत ही आशियाना बना सकते हैं।

तो कहने का मतलब ये है कि भले आज ईश्क़ छूट जाए तो छूटे, लेकिन दोस्त न छूटने पाए। दोस्त पर घमण्ड करें। उसको घमण्ड हो तो अपनी दोस्ती का परिचय याद दिलाएं, लेकिन दोस्त और दोस्ती को ज़िंदाबाद रखें।

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