नग़मों से गुलज़ार शब्दों का गुलशन

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बर्थ डे स्पेशल (गुलज़ार)

-राखी से अलग होने के बाद लिखे गीत को आरडी बर्मन ने किया था कम्पोज़
-बंदिनी से शुरू हुआ था फिल्मी गीतकार का करियर

आपने किसी एंटीक आइटम की पैकिंग देखी है? जिस पैकेट में एंटीक पैक होता है, उसे अक्सर कुछ एयरबैग या उसके जैसी दूसरी नाजुक चीजों से भर दिया जाता है। इस तरह विलक्षण वस्तु को सुरक्षित रखने की कोशिश की जाती है।

पर जब एक शायर का नाजुक मन सुरक्षित रखने की बात हो तो मामला कहीं ज्यादा ‘हैंडल विद केयर’ वाला हो जाता है। बात कर रहा हूं आज जीवन के 88वें बरस में प्रवेश कर रहे, रेशम से भी रेशमी शायरी बुनने वाले, गुलज़ार साहब के मन की। आखिर ऐसा कौन सा सुकोमल पदार्थ उनके चारों ओर के वातावरण में मौजूद रहा है?

जिनके नग़मों में अल्फ़ाज़ के बजाय अहसास इतनी नज़ाकत के साथ सिमट जाता हो कि जैसे रात चॉंदनी में छिपी उजले आफताब की किरणें। जिसने ज़िंदगी के हर लम्हे को अपनी कायनात में सितारे सा पिरो लिया हो ताकि जब उसका ज़िक्र आए तो वो नज़्म बनकर उतर आए। जिसका बचपन मिट्टी की सौंधी ख़ुशबू से लबरेज हो और दिमाग़ के कोने में अपनी ख़ासी जगह घेरे बैठा हो। बचपन ने जब-जब मन के दायरों से बाहर झाँका तब-तब गीत, नज़्म, ग़ज़ल पन्नों पर उतर आयी। कितनी क़ाबिल-ए- तारीफ़ है इस शख़्स की समंदर सी गहरायी, जहाँ तमाम मोती यूँ ही गोता लगाते ही मिल जाते हैं।

किसी ने ठीक ही कहा है कि एक जनम का ज्ञान इंसान के लिए पूरा नहीं पड़ता। कई जनमों की कोशिशों और मेहनत के बाद कोई नायाब फ़नकार पैदा होता है। आत्मा जब पिछला हिसाब लेकर आती है तो इंसान ख़ुद ब ख़ुद निखरता चला जाता है। जो भीतर से बाहर तक सिर्फ गुलज़ार ही रहता है। वो केवल और केवल गुलज़ार हैं।

दीना, पाकिस्तान में सरदार माखन सिंह और सुजान कौर के घर जन्म लिया। लेखक बनने से पहले रंगों के साथ गाड़ियों पर अठखेलियाँ खेलीं। पिताजी ने नाम दिया संपूरन सिंह कालरा।

जिसके नाम में ही उस परम तत्व की छाया झलकती हो, वो सिर्फ़ रंगों से खेलने वाला फ़नकार कैसे रह सकता था। उसने कला के जिस आयाम को हाथ लगाया वही खिल उठा, वही गुलज़ार हुआ, लिखा तो बहुत लिखा, आज तक कलम चल रही है। अन्दाज़ वही और फ़िलासफ़ी कुछ नयापन लिए। मन के हर भाव को शायरी की रंगत में ढाल लेने में माहिर गुलज़ार ने पचास वर्षों से हिंदी, उर्दू सभी मजलिसों में अपना परचम लहराया है। प्रेम में सदैव रचे- बसे गुलज़ार आज भी उम्र के इस पड़ाव में वही तिलस्म पैदा कर सकते हैं जैसा उन्होंने बंदिनी के उस गीत में किया- ‘ मोरा गोरा रंग लइले, मोहे श्याम रंग दइदे…..।

इन्होने नब्बे के दशक में फ़िल्मे बनायीं तो सभी मन को छूने वाली कला फ़िल्में- मेरे अपने, परिचय, कोशिश – कोशिश में मूक – बधिर दम्पति के जीवन की चुनौतियों को इतनी सहजता से ढाल दिया कि दर्शक ख़ुद मूक बने ठगे से रह गए।कमलेश्वर साहब का उपन्यास ‘काली आँधी’ पर आधारित इनकी फ़िल्म आँधी बहुत पसंद की गयी। अगली फ़िल्म बाबू शरदचन्द्र के उपन्यास ‘पंडित मोशाय’ पर ख़ुशबू नाम से बनायी।इसके बाद बहुचर्चित फ़िल्म मौसम आयी जिसे बहुत से फिल्मफेअर अवार्ड्स से नवाज़ा गया। इजाज़त फिल्म इनकी काव्यात्मक भावनाओं का फिल्मी रूपान्तरण मानी गई। 1982 में अंगूर बनाने के बाद गुलज़ार साब ने टेलिविज़न सीरियल मिर्ज़ा ग़ालिब 1988 में डायरेक्शन दिया। जो कई बरसों तक दूरदर्शन पर चला।

गुलज़ार साहब की काव्य यात्रा उर्दू, पंजाबी और हिंदी में परवान चढ़ी। हिंदी भी ऐसी जो सहज, सुगम और बोलचाल की भाषा खड़ी बोली, ब्रज, हरियाणवी और मारवाड़ी का पुट लिए थी। इनकी कविताएँ ‘चाँद पुखराज का’, ‘रात पश्मीने की’ और ‘पंद्रह पाँच पचहत्तर’ नामक संकलन में उपलब्ध हैं। इनकी कहानियाँ ‘रावी-पार’ और ‘धुआँ’ नामक पुस्तकों में संकलित हैं। इनकी उपन्यास ‘दो लोग’ विभाजन की त्रासदी की ज़िंदा तस्वीर खड़ी करती है।

Eternally romantic गुलज़ार ने रोमान्स दर्शाने के लिए कभी चॉंद का अकेलापन, दर्द का दरिया, रेशमी डोरी या कभी चाँदनी रात का बिम्ब, प्रतीकों द्वारा सहज ही पिरो दिया। ये सिर्फ़ फ़िल्मी गीतकार ही नहीं, हिन्दी फ़िल्मी पटकथा लेखक और संवादकार भी हैं।

पड़ोसी देश के साथ शांति कायम करने के लिए ‘अमन की आशा’ नामक अभियान चला, उसमें कथ्यपरक (थिमैटिक) गीत ‘नज़र में रहते हो’ गुलज़ार साहब ने ही लिखा, जिसे शंकर महादेवन और राहत फ़तह अली खान ने स्वर दिया।गुलज़ार साहब ने ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह साहब के दो एल्बम ‘मरासिम’ और ‘कोई बात चले’ के लिए ग़ज़लें लिखीं।

गुलज़ार साहब की कविता यात्रा इतनी सहज है कि ज़िन्दगी के हर पहलू के लिए इनके पास शब्दों का खजाना है। इनकी रचनाओं में सूफ़ी रूहानियत बेमिसाल है।

गुलज़ार साहेब कहते हैं कि हर इंसान पहला रोमान्स सिर्फ़ अपने-आप से करता है।

हरेक के अंदर एक बच्चा हमेशा ज़िंदा रहता है जिसे रहना भी चाहिए।

ज़िंदगी का हर पल अपने आप में एक कविता है जिसे समझने के लिए संजीदा दिमाग़ और समझाने वाली भाषा का ज्ञान होना चाहिए।

मुसीबतें खुदा की नियामते हैं उन्हें स्वीकार कर चलने से ज़िंदगी बहुत ऊँचाइयों तक ले जा सकती है। बहुत कुछ खोकर ही कुछ हासिल हो पाता है।’

पुरानी लकीरों को बहुत देर तलक पीटते रहने से दायरा छोटा रह जाता है। दायरों से बाहर निकलने में ही भलाई है।

रूमानी रोमान्स और रुहानी रोमान्स में फ़र्क़ समझना ज़रूरी है। इश्क़ वो ख़ुशबू है जो फैलती है दोनों के लिए, जिसमें यार भी वही है और आशिक़ भी वही।

हरेक की ज़िंदगी में एक मुक़ाम आता है जिसे हाथ से नहीं जाने देना चाहिए। शायद उसे कामयाबी का पहला क़दम कहते हैं।

सफलता हासिल करने के लिए दिल में आग धधकनी ज़रूरी है, चाहे वो ख़ुद का जुनून हो या बाहर से मिली हालातों की लगायी।

सबके साथ दोस्ती निभाने का हुनर सीखना चाहिए। अपने अंदर एक ऐसी आँख जगाओ जो दोस्त की ख़ूबियों को समझने और कमियों को नज़रान्दाज करने में माहिर हो सके।

अंत में खुदा ही सबसे बड़ा यार है उसे समझने के लिए अपने आस-पास के लोगों की भिन्न परिस्थितियों में प्रतिक्रियाओं को समझने की निहायत ज़रूरत है।

बर्दाश्त करो, जैसे भी हालात हों बर्दाश्त करो। अगर ज़िंदा हो तो वही बहुत है ज़िंदगी नेक नीयत वाले इंसान के कदमों में लोटती है।कोई ताक़त उसे आगे बढ़ने से रोक नहीं सकती।

अपनी जड़ों को मत भूलो पर तुम्हें सिर्फ़ फूल नहीं बनना, उसकी महक बन कर कायनात में फैलना है बंधना नहीं है।

रोमान्स ही है जो प्रेम, इश्क़, लव की परिभाषा समझाता है, बाक़ी सब शब्द हैं कोरे शब्द।

सरल और सफल इंसान ख़ुद की नुमाइश नहीं करते, जग उनकी ख़ूबियाँ एक स्वर से ज़ाहिर करता हैं।

गुलज़ार साहब ने अपनी ज़िंदगी के रंज को भी शब्दों के साथ पिघलाकर प्रस्तुत किया है। उन्होंने छंद मुक्त एक गीत लिखा। जो इस प्रकार है। ये गीत राखी से अलग होने के बाद उन्होंने लिखा। इसे लिखने के बाद वे इसपर ट्यून बनवाने राहुल देव बर्मन के पास गए। आरडी बर्मन ने गीत पढ़ा तो उनकी भी आँखें रुक न सकीं।
इसके बावजूद भी इस गीत पर ट्यून बनाना आसान नहीं था। क्योंकि न तो इस गीत में मीटर थे और न ही राइम। आरडी बर्मन इस गीत को लेकर आशा भोसले के पास गए। उन्होंने कहा कि आप बस गाइये हम खुद ट्यून बजाते हैं।

ये गीत सिंगल टेक में कम्पोज़ हुआ था। गीत गाने वाली आशा भोसले, गीत को संगीत देने वाले आरडी बर्मन और गुलज़ार साहब गाना पूरा होने के बाद घण्टों तक रोते रहे। ये है वो गीत।

मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है
सावन के कुछ भीगे-भीगे दिन रखे हैं
और मेरे इक खत में लिपटी राख पड़ी है
वो राख बुझा दो, मेरा वो सामान लौटा दो
मेरा कुछ सामान…

पतझड़ में कुछ पत्तों के, गिरने की आहट
कानों में इक बार पहन के लौटाई थी
पतझड़ की वो शाख अभी तक कांप रही है
वो शाख गिरा दो, मेरा वो सामान लौटा दो

इक अकेली छतरी में जब आधे-आधे भीग रहे थे
आधे सूखे, आधे गीले, सुखा तो मैं ले आयी थी
गीला मन शायद बिस्तर के पास पड़ा हो
वो भिजवा दो, मेरा वो सामान लौटा दो

एक सौ सोलह चांद की रातें, एक तुम्हारे कांधे का तिल
गीली मेंहदी की खुशबू, झुठमूठ के शिकवे कुछ
झूठमूठ के वादे भी सब याद करा दूँ
सब भिजवा दो, मेरा वो सामान लौटा दो

एक इजाज़त दे दो बस, जब इसको दफ़नाऊँगी
मैं भी वहीं सो जाऊंगी, मैं भी वहीं सो जाऊंगी

फ़िल्म : इजाज़त (1987)
संगीत : आर.डी.बर्मन
गीत : गुलज़ार
गायिका : आशा भोंसले

तो आपको हम उस गीत के साथ छोड़े जा रहे हैं। आप गीत सुनें और आप भी गुलज़ार साहब के कलम की दुनिया में कुछ देर घूम आइए।

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