फालोइंग फीवर में जल रही रचनाधर्मिता

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-इंस्टा व्यूवरशिप के चक्कर में मौलिकता के बजाय वीडियो पर ध्यान
-तुलसीदास अगर वीडियो बनाकर मानस लिखते तो क्या होता

एक सवाल बहुत दिन से परेशान किये जा रहा है। वो ये है कि अगर तुलसीदास, सूरदास, कबीरदास, रामधारी सिंह दिनकर इत्यादि के समय में फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम होता तो क्या वो अपनी रचनाओं के रूप में इतिहास रच पाते? अगर अमृता शेरगिल और फ्रिडा काहलो इंस्टा के लिए ट्रायपॉड पर कैमरा रखकर अपनी करुणा का चित्र बनातीं तो क्या वो चित्रों के रूप में मानवता की सच्चाई समाज को दिखा पातीं?

शायद नहीं…!

गोस्वामी तुलसीदास अगर रामचरितमानस का लेखन लाइव वीडियो के साथ करते तो सोलह सोलह मात्राओं की चौपाईयों का सोलह शृंगार, ग्यारह, तेरह और तेरह ग्यारह मात्राओं से दोहा और सोरठा का आंगन शायद न भर पाता। क्योंकि उनलोगों का ध्यान तो खुद की बन रही वीडियो पर होता..! काम तो दिखाने के लिए किया जाता। केवल स्वकेंद्रित होता। समाज तो उनसे दूर हो जाता।

कोई भी रचना तभी कालजयी होती है जब उसे समाज अपना बनाता है। समाज उसी रचना को अपनाता जिसमें वो खुद को शामिल पाता है। रामचरितमानस की पंक्तियां हों या गालिब के शेर, या फिर लियोनार्दो दा विंची की पेंटिंग्स, सभी रचनाओं को समाज ने अपने कलेजे से लगाया है। कारण कि ये रचनाएं फॉलोवरशिप बढ़ाने के लिए नहीं बल्कि समाज में जागरण के लिए रची गईं थीं। जो आज भी प्रासंगिक हैं।

रचना करने का जिम्मा सिर्फ और सिर्फ ललित कला यानी फाइन आर्टिस्ट का है। ध्यान रहे कि यहां फाइन आर्ट का मतलब सिर्फ विषय नहीं बल्कि फिलासफी का एक अंग है। इसी फाइन आर्ट से साइंस भी निकला है और संगीत भी। और आज तो पत्रकार भी एक फाइन आर्टिस्ट है। फाइन आर्ट एक विराट और व्यापक फलक है। रचनाएं वही मार्मिक होती हैं जिसमें संवेदनाएं समाहित हों। जहां इमोशन नहीं होगा वो क्रिएशन नहीं बल्कि एक चलताउ आर्ट होगी।

आजकल एक रोग निकल पड़ा है। लोग स्टडी टेबल पर कविता, कहानी या किताब लिखने भी बैठते हैं तो अपने बगल में एक ट्रायपॉड लगाते हैं और अपने लिखने का वीडियो बनाते हैं। एक जने से पूछने पर वो बताते हैं कि लिखते हुए वीडियो के इंस्टा पोस्ट पर व्यूवरशिप खूब मिलती है। कमेंट्स भी शानदार मिलते हैं। और लाइक्स की तो बात न पूछो। हम सोचने लगे कि ये महाशय क्या लिखते होंगे। इनका ध्यान लिखने से अधिक तो कैमरे पर रहता होगा..!

आजकल सस्ती लोकप्रियता में इतिहास लिखे जा रहे हैं रचे नहीं जा रहे। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लाइक्स, फॉलोवर्स और व्यूवरशिप की अंधी दौड़ प्रतिभाएं गलत राह पकड़ रही हैं। यह हाल केवल नौजवानों का ही नहीं बल्कि पुरनिये लोगों का भी है। लोग दुकानों से अच्छी पेन, कॉपी, ब्रश, कलर, म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट्स खरीदने से अधिक वीडियो बनाने के एसेसरीज खरीद रहे हैं।

पियानो बजाते वीडियो बनाना और उसके बैकग्राउण्ड म्यूजिक को एप्लीकेशन के सहयोग से मोडिफाई करते हुए उसे पोस्ट करना, फिर उसके बाद झूठी वाह वाही लूटना, आखिर इन सबका परिणाम क्या मिलता है, शून्य।

आज के तथाकथित रचनाकार बड़ा बनने के चक्कर में चौंधिया गए हैं। लोग उस मछली की तरह हो गए हैं जो अब पानी की गहराई में नहीं जाना चाहती। वो सतह पर आकर लोगों को अपनी खूबसूरती दिखाना चाहती हैं। उन मछलियों को ये शायद अब ज्ञान नहीं है कि बाहर जाल और काँटा लिये जालिम मछुआरे खड़े इंतजार कर रहे हैं। अगर उनसे बच गए तो गिद्ध नहीं छोड़ेंगे। लेकिन इनसब से बेखबर मन में महान बनने की झूठी आशा लिये लोग फैन फॉलोविंग बढ़ाने में मशगूल हैं। लोग रचना करने के बजाय खुदनुमाई करने में जुटे हुए हैं। तो ऐसे में महंगाई और अन्य जरूरी मुद्दों की बात भी आम इंसान से दूर इंस्टा और ट्विटर पर ही हो रही है। ऐसे लोग करते हैं जिन्हें कोई मतलब ही नहीं। जब तक मुद्दों की संवेदनाएं सामान्य जन तक नहीं पहुंचेंगी तो सरकार को क्या पड़ी है कि वो समस्याओं को संज्ञान में लें।

फ्रिडा काहलो ने आजीवन कष्ट सहा था। उन्होंने कष्ट के साथ इतिहास रचा। उन्होंने शायद अपने रहते हुए ये ध्यान नहीं दिया होगा कि उनकी रचनाओं को कौन देख रहा है, कितना देख रहा या कैसे देख रहा है। उन्होंने बस अपनी पीड़ा को अपनी साधना के साथ व्यक्त किया।

फेसबुक, ट्विटर, इंस्टा इत्यादि के प्लेटफॉर्म कनेक्टीविटी बढ़ाने में सहयोगी सिद्ध होते हैं इसमें कोई दो राय नहीं है। सूचनाओं का तेजी से प्रसार करने में क्रांतिकारी है। इसका प्रयोग खबरों के लिए हो तो अधिक प्रभावी है लेकिन तथ्यात्मक हो तो ये जीवनदायक प्लेटफॉर्म है।

खुदनुमाई करने का जुनून इंसान की रचनाधर्मिता को खत्म करता जा रहा है। जो रचनाएं डायवर्सिटी को जन्म देती थीं लेकिन अब इंस्टा व्यूवरशिप का बुखार डायवर्सिटी यानी विविधता को खत्म करके एक होमोजिनियस सोसायटी बना रहा हैं।

ध्यान देने की बात है कि हम सोशल प्लेटफार्म पर खुदनुमाई करने को दोषपूर्ण मान रहे हैं न कि समाज की अन्य गतिविधियों का अपडेट। आप कहीं जाएं वहां के मंजर को खूबसूरत शब्दों के कैप्शन के साथ अपडेट करें। आपके साथ आपसे जुड़े लोग भी उस स्थान का आनंद लेंगे। लेकिन खुद की नुमाइश इंसान की संवेदनाओं को समाप्त करके एक व्यापारी को जन्म देते हैं।
ऐसा व्यापारी जो हर कदम पर सोचेगा कि इस काम से मेरी कितनी फॉलोविंग मिलेगी..? ये घातक है। ऐसी सोच पिछले एक साल में सबसे अधिक नौनिहालों की हुई है।

मेरी बेटी है। उसकी क्लास पिछले एक साल से मोबाइल पर ही चल रही है। इसीलिए स्वाभाविक है कि उसका अधितर समय मोबाइल पर ही बीत रहा है। ऐसे में वो ड्रॉइंग भी बनाती है तो ट्राईपॉड पर बाकायदा मोबाइल रखकर उसका वीडियो बनाती है। उसके बाद उसे इंस्टा पर डालती है। ये रवैया उसकी रचनाधर्मिता को डायवर्ट कर रहा है। ऐसा ही हाल आज कमोबेश हर एक का हो गया है। आत्ममुग्धता कभी कालजयी नहीं बना सकती। स्थिति विकट से सोचना चाहिए।

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