बेटी का भाषा ज्ञान डॉटर्स डे स्पेशल

IMG-20210926-WA0005
– बेटी से हुई शब्दों पर जमकर डिबेट
– जयपुर के अनंत सफर के दौरान हुई नींद में बातचीत

जब से मैंने अपने बेटी की उँगली पकड़ी है मैं एक दिन को भी सुस्ता नहीं सका हूँ। नाज़ुक सी मेरी बेटी की उँगली पकड़ के जयपुर से लगातार सफ़र करते रहना ख़ुशी के एहसास में इज़ाफ़ा करता है, लेकिन मेरी थकान का क्या? बेटी मेरी थकान को अच्छी तरह समझती है। मैं उसे देखता हूँ और वो मेरे थके-माँदे बदन को देखती है। देख कर बड़ी चालाकी से मेरी हालत-ए-हाल को दर-गुज़र करके वापस चलने लगती है। मैंने जब बेटी से कहा कि क्या हम एक पल को कहीं सुस्ता सकते हैं? कहने लगी ‘तुम वापस लौट सकते हो, मैं न रुक सकती हूँ न लौट सकती हूँ। मुझे अभी बहुत दूर जाना है।’

मैं एक पल को ख़ामोश रहा। रुक गया। एक वक़्त गुज़रा और मैं दौड़ते हुए बेटी के क़रीब पहुँचा। वो मुझे देख कर मुस्कुराई और उसने मेरी फिर से उँगली वापस पकड़ ली। मैं हाँफते हुए उसके साथ फिर से चल दिया।

मेरी उँगली पकड़ के चलने से
सारे मंज़र गँवा दिए तूने।।

बेटी जानती है, कि उसके साथ सफ़र करते हुए कोई मंज़र गँवा देना ना-मुमकिन है। बल्कि आइन्दा इतने और ऐसे मनाज़िर खुलते जाएँगे कि मुझ जैसा नई-नई आँखों वाला हैरान होने के सिवा कुछ नहीं कर सकेगा।

मैंने बेटी से कहा ‘क्या तुम्हें मालूम है कि मेरी तुम्हारी पहली मुलाक़ात कहाँ हुई थी?’

कहने लगी ‘हाँ जब मैं पैदा हुई थी उसी रोज़ ! फिर मैंने बेटी से कहाँ, लेकिन तुम्हें याद नहीं होगा।’ बेटी ने मुझसे पूछा ‘तुम उस वक़्त कहाँ थे?’ मैने कहा ‘तुम्हारे कानों के नज़दीक हवा में घुला हुआ मँडरा रहा था। तुम्हें याद नहीं होगा, बेटी, नर्स ने कहा था- आप ‘‘निस्फिकर’’ रहिए माँ और बच्चा दोनों तंदरुस्त हैं।’

मैं हिसाब लगाता हुआ:

‘बच्चा… ! तंदरुस्त … ! हाँ ये तो तुम ही हो। लेकिन ‘‘निस्फिकर’’ क्या है?

फिर बेटी ने कहा ‘ये मेरे सफ़र का एक हिस्सा है। मेरी एक दोस्त है। एक दोस्त क्या… मेरी एक ही दोस्त है। जो मेरी दीदी भी है। हप्पू नाम है उसका। उसके साथ सबकुछ चलता रहता है।

बेटी मुस्कुराने लगी और कहने लगी ‘ये बताओ बाजार से क्या समझते हो?’

मैंने कहा ‘अब मैं समझता नहीं, जानता हूँ, कि बाज़ार उस बाज़ार को कहते हैं जो छावनी के अन्दर या नज़दीक होता है और मैं ये भी जानता हूँ, कि बाज़ार को ‘‘सदर बाज़ार’’ भी कहते हैं।’ कहने लगी ‘शाबाश तुम तो बड़े अच्छे पा हो।’

शाबाश से मुझे याद आया कि मेरी तुम्हारी मुलाक़ात पहली बार तब हुई थी, जब मेरे पापा ने मुझे पहली बार इंटर फर्स्ट डिवीजन पास होने पर शाबाश कहा था। मैंने बेटी से कहा ‘और अब मैं ये भी जानता हूँ, कि ‘‘शाबाश’’ फ़ारसी के लफ़्ज़ ‘‘शादबाश’’ की छोटी शक्ल है।’

बेटी ने कहा ‘तुम बातूनी बहुत हो। निस्फिकर से शादबाश पर आ गए।’ मैंने कहा ‘हाँ शाएद ! लेकिन पहले ये बताओ कि जब लोगों ने तुम्हारा नाम ‘‘टैंटो, येल्लो, गिज्जु, डिब्बा’’ रखा तब तुम्हें बुरा नहीं लगा?’ कहने लगी ‘किस बात का बुरा? मैं तो इसका भी बुरा नहीं मानती जब लोग कहते हैं कि तुम्हारे पास है ही क्या सिवाए, बकवास के? मैं जानती हूँ, कि आगे बढ़ने का ही फ़ल्सफ़ा है ‘‘सबको साथ ले कर चलो’’ और फिर बकवास भी तो वो बच्चे हैं जिन्हें मेरी माँ ‘‘’भारतभूमि’’ ने दूध पिलाया है। इसीलिए मुझे तब भी बुरा नहीं लगा जब मेरा नाम ये सब कर दिया गया और तब भी नहीं जब मेरे ‘‘बे- फ़िक्र’’ और समाज के ‘‘निश्चिन्त’’ से तुम्हारे शहर के लोगों ने उसे ‘‘निस्फिकर’’ कर दिया।’ मैंने कहा ‘निस्फिकर तो बोलने- सुनने में बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा।‘कहने लगी ‘कोई बात नहीं जब हम किसी के घर जाते हैं, तो उनके तौर के मुताबिक़ रहते हैं और फिर ये तो इलाकों की हैसियत और रवायत है। इसमें मैं क्या कर सकती हूं पा। और मैं जानती हूँ, कि वो लोग निस्फिकर बोलते तो हैं, लेकिन कभी भी कहीं भी लिखते नहीं और कभी लिखेंगे भी नहीं।’

मैंने येल्लो से कहा ‘तुम जानती हो मैं आजकल अपने माँ- बाप और बाक़ी घर वालों को बहुत छेड़ता हूँ।’ पूछने लगी ‘भला वो कैसे?’ मैंने कहा ‘मैंने अपनी माँ से एक दिन पूछा कि ‘‘चबूतरा’’ को हिन्दी में क्या कहते हैं? तो उन्होंने कहा ‘‘चौतरा’’ मैंने कहा- नहीं ये दोनों फ़ारसी / उर्दू के लफ़्ज़ हैं। कहने लगीं- तो ‘‘प्लेटफ़ॉर्म’’ कहते होंगे। मैंने कहा- प्लेटफ़ॉर्म तो अंग्रेज़ी का लफ़्ज़ है। कहने लगीं तो ‘‘मचान’’ कहते होंगे। मैंने कहा- हाँ कह सकते हैं। माँ ने कहा- लेकिन कितने लोग कहते हैं।’ बेटी ने कहा ‘मचान तो कितना सुन्दर शब्द है। मैं तो इसे भी अपना बना कर रखना चाहूँगी।’

बेटी के साथ सफ़र पर निकला हुआ मैं बे- हद ख़ुश हूँ। बिटिया कितनी बातें करती है। मेरे सवालों से कभी नहीं झुँझलाती बल्कि मेरे हर सवाल का जवाब बड़े इत्मीनान से देती है। बिटिया से बातें करते- करते मैंने महसूस किया कि मैं भी बातूनी तो हो चुका हूँ। लेकिन मैं अपने आदत से मुँह तो नहीं फेर सकता। मेरा यक़ीन है ‘अगर सवाल है तो उसका जवाब भी होता है।’ और फिर जब मेरी उँगली खुद मेरी बेटी ने थाम रखी हो तब सवाल करने से क्यों और क्या सोचना? लिहाज़ा मैं बग़ैर किसी हिचकिचाहट के बेटी से फिर एक सवाल पूछ लेता हूँ ‘एक बात बताओ अंग्रेज़ हमारे हिन्दुतान से पैसा, रुपया, सोना, चाँदी, कोहिनूर क्या- क्या नहीं ले गए। हमारे मुल्क को दो मुल्कों में बंटवारा कर गए। हमारी ज़बान से न जाने कितने शब्द ले गए। उन्हें तो कोई कुछ नहीं कहता कि ‘‘यार’’ फ़ारसी / उर्दू का लफ़्ज़ है या तुमने हमारी संस्कृत के लफ़्ज़ ‘‘शर्करा’’ से अपना लफ़्ज़ ‘‘sugar’’ बनाया है।’ कहने लगी ‘इसीलिए तो कल भी हम आगे थे और आज भी। उन्हें जो लफ़्ज़ अच्छा लगता है, उसे अपनी डिक्शनरी में शामिल कर लेते हैं। वैसे मैं भी कम नहीं हूँ, मैंने भी उनके लफ़्ज़ ‘‘Member’’ से अपने लिए ‘‘मेम्बरान’’ बना लिया है। ‘‘फ़ोन’’, ‘‘कॉल’’, ‘‘लॉन’’ बल्की ‘‘एरिट्रोक्रेसी’’, ‘‘रिहर्सल’’ जैसे लफ़्ज़ भी लगातार इस्ते’माल करते जा रहे हैं। ये बात और है कि बावजूद इसके मुझे नहीं पता ये मेरी डिक्शनरी में इन्हें कभी शामिल करेंगे कि नहीं।’

बिटिया ने आगे कहा:

‘ख़ैर ! मैं तो सफ़र पर कब की निकली हुई हूँ। मुझे अभी बहुत दूर जाना है। और मुझमें एक ख़ासियत है, कि मुझे जो भी सुनने में अच्छा लगे उसे अपनाने में देर नहीं लगाती। और मैं तो बस सबको अपनाना चाहती हूँ।

कॉमन फीलिंग

मैंने कहा ‘सो तो है मैंने जब बहुत सारे आम लोगों से पूछा कि ‘‘बन्दूक़’’ किस ज़बान का लफ़्ज़ है? तो सबने कहा हिन्दी का। मैंने जब पूछा कि ‘‘चन्दा’’ किस ज़बान का लफ़्ज़ है ? तब भी सबने कहा हिन्दी का। मैंने जब पूछा कि गाँधी जी का ‘‘चर्ख़ा’’ किस ज़बान का लफ़्ज़ है? तब भी सबका जवाब था हिन्दी का। किसी ने नहीं कहा कि बन्दूक़ अरबी / उर्दू का लफ़्ज़ है और इसे हिन्दी में ‘‘शतघ्नी’’ कहते हैं। चन्दा फ़ारसी / उर्दू का लफ़्ज़ है और हिन्दी में इसे ‘‘अभिदान’’ या ‘‘अंशदान’’ कहते हैं। किसी का जवाब नहीं था कि चर्ख़ा फ़ारसी / उर्दू का लफ़्ज़ है।

बिटिया मुस्कुराई, उसने पूछा ‘तुम जानते हो चर्ख़ा, ‘‘चर्ख़’’ से बना है। चर्ख़ का मतलब होता है ‘‘आसमान’’ चूँकि आसमान दिन-रात घूमता रहता है इसी लिए चर्ख़ का दूसरा मतलब ‘‘चक्कर’’ या ‘‘घूमना’’ भी होता है और चर्ख़ा घूमता है तभी उससे सूत काता जा पाता है। तुमने मीर का वो शेर तो सुना होगा?’ मैंने कहा ‘कौन सा?’

बिटिया ने कहा:

‘मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों
तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं

इस शेर में मीर यही तो कह रहे हैं फ़लक (आसमान) जब बरसों चक्कर काटता है तब कहीं जा कर ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं।’

मैंने कहा ‘ग़ालिब का भी तो एक शेर है:

रात दिन गर्दिश में हैं सात आसमाँ
हो रहेगा कुछ न कुछ घबराएँ क्या

यहाँ भी आसमान के चक्कर लगाने की बात हो रही है।’

मेरी बेटी ने फिर से उसी अंदाज में कहा ‘शाबाश !’

उसने पूछा पा ‘तुम थके तो नहीं?’

मैंने कहा ‘नहीं ! मैं तुम्हारे साथ आख़िरी साँस तक चलूँगा।’

बिटिया मुझसे लिपट गयी। मैंने उसका माथा चूमा। मेरी आँख खुल गई।

बिटिया नहीं थी। वो जा चुकी थी। अपने अनंत सफर पर। मैं सोता रह गया था।

Share on facebook
Facebook
Share on whatsapp
WhatsApp
Share on google
Google+
Share on twitter
Twitter
Share on linkedin
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *