भाजपा के बड़प्पन की मजबूरी

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बिहार चुनाव : एक विश्लेषण

बिहार चुनाव के परिणाम इस बार कई मायनों के साथ बेहद महत्वपूर्ण शक्ल लिए सबके सामने आए हैं। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की जीत में एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रॉक स्टार की तरह देखा जा रहा है तो वहीं दूसरी ओर बिहार में चेहरा बने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को बेचारा बनने पर मजबूर कर दिया है। हालांकि भाजपा अपने वचन पर प्रतिबद्ध दिख रही है। भले ही 74 सीटों के साथ भाजपा जेडीयू से बहुत आगे है फिर भी पार्टी द्वारा नीतीश को ही राज्य का नेतृत्व देने में कोई गुरेज़ नहीं है।

वर्ष 2000 में भारतीय जनता पार्टी की अधिक सीटें होने के बावजूद भी 30-32 सीट वाली जद यू के नेता नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनने का आशीर्वाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने दिया था। हालांकि वो सिर्फ 7 दिन के मुख्यमंत्री रह सके थे।

तब से अब तक जितनी बार बिहार विधानसभा के चुनाव हुए जदयू की सीटें अधिक रहीं। लेकिन इस चुनाव में जदयू कहीं न कहीं सन 2000 वाली स्थिति में है। कार्यकर्ता स्तर पर यही आकांक्षाएं हैं कि भाजपा का चेहरा मुख्यमंत्री की शपथ ले।

दरियादिली के कई कारण : भाजपा के इस वचनबद्धता से पार्टी के कई राजनीतिक हित सधते साफ तौर पर दिख रहे हैं।

1. सबसे बड़ा हित गठबंधन धर्म का संवेदनशीलता के साथ अनुपालन करने वाली पार्टी की छवि बनकर उभरी है।

2. भाजपा के इस निर्णय से शिवसेना को भी राजनीतिक नैतिकता का संदेश देने का प्रयास किया जा रहा है।

3. नीतीश कुमार बिहार में पलटू चाचा के नाम से पुकारे जा रहे हैं। ऐसे में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को एक हल्का संशय यह भी होगा कि यदि भाजपा अपने मुख्यमंत्री की पेशकश करती है तो नीतीश पर राजद, कांग्रेस सहित महागठबंधन डोरे डालने में पीछे नहीं होगी। हो सकता है कि मुख्यमंत्री बनने के लिए नीतीश एक बार फिर पाला बदल लेते।

4. भाजपा नीतीश को मुख्यमंत्री पद देकर संसद में राज्यसभा की सीटों के बंटवारे में अपनी हिस्सेदारी को मजबूत करने का दबाव बना सकती है। क्योंकि छत्तीसगढ़, राजस्थान, झारखंड इत्यादि राज्यों में भाजपा एवं उसके गठबंधन को मिली हार के कारण राज्यसभा में कम सीटें मिलेंगी। उन रिक्त सीटों की पूर्ति बिहार कर सकता है।

5. बंगाल के चुनाव के मद्देनजर भाजपा का यह दाँव मास्टर स्ट्रोक साबित हो सकता है। क्योंकि बंगाल की बहुत बड़ी आबादी बिहार से सटी हुई है। बंगाल में आज भी मजदूरों की खपत को बिहार ही पूरा करता है। वहीं दूसरी ओर राजद और कांग्रेस की नासमझी के कारण वामदलों को एक बार फिर संजीवनी मिली है। वामदलों का स्ट्राइक रेट कांग्रेस के मुकाबले बहुत शानदार रहा है। और…भाजपा इस बात को भलीभाँति जानती है कि वामदलों का बिहार में जितना उन्हें बंगाल में मजबूती प्रदान करेगा। वामदलों को रोकने के लिए नीतीश जैसा कोई सेकुलर और उदारवादी चेहरा चाहिए होगा।

एक दिशा यह भी : भले ही सबकुछ सही तरीके से हो गया। बिहार में एनडीए सरकार की वापसी हो गयी। लेकिन सीटों के आँकड़े नीतीश और भाजपा को बेचैन कर सकते हैं। कारण स्पष्ट है। इनके घटक बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तान अवाम मोर्चा (हम) और मुकेश साहनी के दल विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) ने 4-4 सीटें हासिल की हैं। जीतनराम मांझी पहले भी महागठबंधन के घटक रह चुके हैं। यदि इनदोनों घटकों ने पाला बदलकर महागठबंधन से हाथ मिलाते हैं तो राजग का खेल बिगड़ सकता है।

कारण कि इनदोनों दलों के 4-4 विधायक अगर महागठबंधन से मिलते हैं तो विपक्ष 110 से बढ़कर 118 हो जाएगा। और.. इसबार ओवैसी की पार्टी ने 5 सीटें हासिल करके गेमचेंजर की भूमिका निभा सकती है।

खैर, कुछ भी हो, बिहार ने हिंदुस्तान की राजनीतिक धारा को प्राचीन काल से ही परिवर्तित करता आया है। जो तरंग पूरे देश में चलती है, बिहार उस रीति नीति को नकारते हुए नई धारा को जन्म देता है। यही कारण है कि बिहार के राजनीतिक दरिया का कोई थाह नहीं लगा सकता। यही कारण है जिससे कि तमाम आधुनिक तकनीक से लैस सर्वे एजेंसी और न्यूज़ चैनलों के एग्जिट पोल धरे के धरे रह जाते हैं।

बिहार में बस अपनी बहार है,
फिर से वही नीतीशे कुमार है।।

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