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महसूसेगा संकट मोचन का कोना पण्डित जसराज का न होना

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बनारस : वो साल ऐतिहासिक था। बनारस के लिए तो विशेष तौर पर। वो साल था 2014। बनारस राजनीतिक ज़मीन पर विश्व से आंखें मिलाने को तैयार हो रहा था। इसके पहले बनारस ने एकेडमिक, खेल और संगीत के स्तर पर दुनिया को अपना मुरीद बना चुका था।

शायद वो 20 अप्रैल 2014 की तारीख थी। तारीख़ में थोड़ा कन्फ्यूजन हो रहा है। प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का अगले कुछ ही दिन में बनारस के कलेक्ट्रेट में नामांकन होना था।

राजनीतिक पारा आसमान छू रहा था। मुख्य प्रतिद्वंद्वी उस समय 49 दिन की सरकार चलाकर दिल्ली से इस्तीफा दे चुके अरविंद केजरीवाल मोदी को कड़ी चुनौती दे रहे थे।

दिनभर बी एच यू, लंका, अस्सी, गोदौलिया की ख़ाक छानते, शहर का राजनीतिक बुखार नापते अपने दफ्तर पहुँचता हूँ। खबरों की सूची बना ही रहा था कि सांस्कृतिक बीट देख रहे हमारे सुपर सीनियर श्री प्रमोद यादव जी ने सीधे आदेश दिया कि खबर जल्दी से खत्म करके निकल जाओ संकट मोचन संगीत समारोह कवर करने। आज मैं नहीं जा पाऊँगा। वहाँ से फोनपर खबर नोट करा देना।

उन्होंने एक सख़्त हिदायत भी दी कि आज संगीत समारोह की महत्वपूर्ण निशा है और पद्म विभूषण पण्डित जसराज का गायन है। उनकी प्रस्तुति ज़रूर से कवर करना।

मेरे हाथ पाँव फूल गए। जीवन में पहली बार टिपिकल शास्त्रीय कार्यक्रम की कवरेज करने का असाइनमेंट मिला था। संगीत से कोसों की दूरी थी। ना तो राग मालूम थे और ना ही ख़्याल। ख़ैर, जैसे तैसे खबरों को किनारे लगाया और लगभग रात के साढ़े ग्यारह बजे दफ्तर से संकट मोचन के लिए निकल पड़ा।

मंदिर का कोना कोना खचाखच भरा हुआ था। अंदर घुसना मुश्किल था। वैशाख की गर्मी उसी रौ में बढ़ती जा रही थी। अच्छी तरह से याद है कि उस दिन बनारस में राजनीतिक पारे की तरह यहाँ का मौसमी पारा भी 44.2 डिग्री सेल्सियस था।

महन्त जी के छोटे भाई डॉक्टर साहब को फोन करके किसी तरह अपनी जगह बनाई। बड़ी बात तो ये थी कि पूरी भीड़ पण्डित जसराज को सुनने के लिए बैठी थी। उससे भी बड़ी बात तो ये थी कि उस भीड़ में कोई वीआईपी कल्चर नहीं था। रिक्शेवाले से लेकर उद्योगपति तक प्रांगण की ज़मीन पर एक साथ बैठे थे। ताज्जुब था कि रिक्शेवाले, ठेलेवाले भी पण्डित जसराज से वाकिफ़ थे।

वहाँ की संगीत के लिए दीवानगी देखकर यह बात कट गई कि संगीत सॉफिस्टिकेटेड सोसाइटी के लिए होता है। संगीत सिर्फ सोसाइटी के लिए होता है। उसकी नज़र में राजा और रंक बराबर ही हैं।

छह दिन चलने वाले संकट मोचन संगीत समारोह के दूसरे दिन पं. जसराज की आवाज के दीवानों का इंतजार भोर में करीब चार बजे खत्म हुआ। बनारस के प्रसिद्ध अभिवादन हर हर महादेव के नारे की गूंज के बीच पं. जसराज ने मंच संभाला। इसके बाद अपनी जादुई आवाज से भोर की बेला में उन्होंने ऐसा समां बांधा की सुर के श्रद्धालुओं को पता ही नहीं चला कि कब सूर्य ने आंखें खोलीं और और सुबह हो गई।

लगभग साढ़े आठ बजे उन्होंने अपना गायन समाप्त किया। मुझे लग रहा था कि वो शायद थके हों तो मीडिया से बात न करें। फिर भी हिम्मत करके आगे बढ़ा। डॉक्टर साहब का साथ मिला। उन्होंने पण्डित जी से मुलाक़ात कराई। पण्डित जी से हमने यही कहा कि गुरुजी आपने रात्रि पर्यंत सुर वर्षा की है, आप थके होंगे, इसलिये मैं आपसे कुछ पूछूँगा नहीं, बस जो आप आशीर्वाद स्वरूप कहेंगे वहीं लिख दूँगा।

उन्होंने थोड़ी देर रुक कर उन्होंने कहा कि बेटा, तुम भी तो मेरे साथ उतनी ही मेहनत किये हो। बल्कि मुझसे अधिक ही। तुम दिनभर इतनी कड़ी धूप में दौड़े होगे। फिर रातभर जगे हो। तो कौन थका है? इसीलिए इसकी चिंता मत करो, जो जी में आये पूछो।

हमने कुछ अधिक नहीं बल्कि संकट मोचन औऱ संगीत समारोह से उनका जो प्रेम है, उसके बारे में सवाल किया।
उन्होंने बिना लाग लपेट के कहा, ‘एक-दो बार छोड़कर वह साल 1972 से लगातार इस संगीत समारोह में आ रहा हूँ। यही नहीं, जब तक सांस रहेगी इसमें शामिल होते रहेंगे। संगीत के फनकारों और दीवानों के लिए काशी के संकटमोचन मंदिर में हनुमान जयंती पर हर साल आयोजित होने वाला संगीत कार्यक्रम नहीं एक पर्व है।’

उनकी वाणी में साक्षात सरस्वती का वास था। इस साल जब लॉकडाउन चल रहा था तो भी उन्होंने वर्चुअल स्वरांजलि दी। आज वो चुप हो गए। लेकिन उनकी ओजस्वी और भयंकर थकान मिटा देने वाली आवाज़ आज मेरे कानों में स्पष्ट सुनाई दे रही है।

और तो और उनका मेरे प्रति दिखाया गया वात्सल्य जो आज तक मुझे रीत देता है, बहुत याद आ रहा है। अब यही लगता है कि आगे भी संकट मोचन का प्रांगण होगा। संगीत समारोह होगा।

लेकिन समारोह के प्रांगण का हर कोना,
महसूसेगा पण्डित जसराज का न होना।

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