मानवता के महान मेटाफर

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-दिशा दिखाती हैं कबीर की पंक्तियाँ

समाज को एक करने की चाहत और सत्ता शासन के ख़िलाफ़ विद्रोह के साक्षात विग्रह कबीर हैं। कबीर अपने आपमें विद्रोह के रूपक हैं। उन्होंने समाज के विघटन का विरोध करने के लिए जो शब्दों का हथियार उठाया वो आज एक मेटाफर हो चुका है।

कबीर ने समाज को स्पष्ट किया कि राम सत्य हैं शोध नहीं। राम त्याग हैं भोग नहीं। राम दया हैं क्रोध नहीं। और ऐसे राम हर घट में हैं, इसके लिए किसी आकार प्रकार विशेष के चक्कर में पड़ने की ज़रूरत नहीं।

कबीर का अन्वेषण इतना महीन होता है कि इंसान के जीवन के हर पहलू को उनकी पंक्तियां छू जाती हैं।

कबीर दास का दोहा है, जिसका अर्थ है कि पोथी पढ़-पढ़कर संसार में बहुत लोग मर गए लेकिन विद्वान न हुए पंडित न हुए। जो प्रेम का ढाई आखर यानी अक्षर पढ़ लेता है वह पंडित हो जाता है।

एक लड़का गया और प्रेम-प्रेम खूब रट डाला और आकर कहा कि पिताजी, मैंने प्रेम को खूब पढ़ लिया है। पिता ने कहा कि बेटा, यह प्रेम पढ़ना न हुआ। यह कागज का प्रेम है। इस कागज के प्रेम को पढ़ने के लिए कबीर साहब ने नहीं कहा है।

प्रेम एक घंटा पढ़ने की चीज नहीं है। पूरा जीवन पढ़ा जाता है तब कहीं प्रेम उदय होता है और नहीं भी होता। जब प्रेम उदय होता है तब वह किसी एक के लिए नहीं होता सबके लिए होता है। प्रेम चारों ओर होता है। जैसे आग की लौ सबके लिए गरम होती है। वह किसी के लिए ठंडक और किसी के लिए गरम होती है ऐसी बात नहीं, सबके लिए एक समान होती है।

धरती की कठोरता, पानी की तरलता, हवा की कोमलता और आकाश की शून्यता सबके लिए एक समान होती है। इसी तरह ईश्क़ सबके लिए होता है। प्यार हर तरफ और हर एक के लिए होता है।

पत्नी के प्रति प्रेम, प्रेम नहीं, मोह है, पुत्र के प्रति प्रेम, प्रेम नहीं, मोह है। इसी प्रकार जाति विशेष, संप्रदाय विशेष, देश विशेष के प्रति प्रेम, प्रेम नहीं मोह है, ममता है। प्रेम एक ऐसी चीज है जो बहुमुखी यानी मल्टीडायमेंशनल है। प्यार जब होता है तब हम पंडित होते हैं। हम लोग पंडित कहलाकर भी हमारा प्रेम अपने परिवार के प्रति होता है अथवा अपनी जाति एवं अपने संप्रदाय के लिए होता है।

हम लोग सत्य को काट-काट कर बांट लेते हैं। भगवान को काट-काटकर बांट लेते हैं। इसलिए सब जाति और संप्रदाय के भगवान अलग-अलग हैं। किसी का भगवान संस्कृत जानता है, किसी का भगवान अरबी और किसी का भगवान हिब्रु। किसी का भगवान वेद भेजता है, किसी का भगवान कुरान तथा किसी का बाइबिल। एक भगवान दूसरे भगवान के संप्रदाय वालों को मार डालने तक का आदेश करता है। लेकिन जो सत्य भगवान है अगर उसका बोध हो जाए, तो उससे प्रेम उदय होगा। उसी प्रेम को पढ़ने की जरूरत है।

प्रेम उदय तब होता है जब हमारा स्वार्थ घटता है। यह स्वार्थ ही रोड़ा है, किंतु स्वार्थ हर आदमी में बड़ा अंतर होता हैं एक पशुता का स्वार्थ होता है, एक मनुष्यता का। कुत्तों के बीच में रोटी डाल दी जाए तो वे लड़कर खाते हैं। इंसानों के बीच में रोटी रख दी जाए तो हम बांटकर खाते हैं। अगर हम लोग भी लड़कर खाएं, तो हम भी जानवर हैं।

स्वार्थ के कारण गद्दियों के लिए लड़ाइयां होती हैं। कुर्सियों के लिए लड़ाइयां होती हैं। चार पैसे के लिए लड़ाई होती है। लेकिन जब मनुष्यता का उदय होगा तब लड़ने की बात नहीं रह जाएगी। जब प्रेम का उदय होगा तब लड़ने की बात नहीं रह जाएगी।

पोथी पढ़ी पढ़ी जग मुआ पण्डित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पण्डित होय।।

कबीर के तीखे प्रहारों में विद्रोह, हीनता तथा वैमनस्य का भाव नहीं है। उनके दोहों और पदों में भी द्वेष या आत्मश्लाघा नहीं है। किन्तु एक आत्मविश्वास है स्वयं की आत्मा को तमाम विषमताओं के बीच शुद्ध रखने का। 

कबीर चुँकि बनारस की धरती पर हैं। यहाँ कण कण में सनातन गंगा हैं। इसीलिए उन्हें पावनता का ज्ञान है। और उस पावनता को बरकरार रखने की चिंता भी है।

सो चादर सुर नर मुनि ओढि, ओढि क़ै मैली कीनी चदरिया।
दास कबीर जतन से ओढि, ज्यों कि त्यों धर दीनी चदरिया।।

कहने का अर्थ यह है कि समाज सुधारक बनने की आकांक्षा के बिना ही अपने निरगुन राम के दीवाने कबीर को स्वत: ही सुधारक का गरिमामय पद उनकी इस प्रवृत्ति के चलते प्राप्त हुआ।

वास्तव में तो जनता के दुःख और उसकी वेदना से फूट कर ही उनके काव्य की धारा बही।

कबीर की  वाणी आज के समाज में उतनी ही खरी व उपयोगी है जितनी कि तब थी। 

कबीर का अन्वेषण उनकी रमैनी के एक पद में देखने को मिलता है। इस पद में उनका विश्वास भी पूरे गर्व से झलकता है। वे आज की परिस्थितियों पर लगभग छह शताब्दी पहले कह दिए हैं। उनका ईश्वर के प्रति प्रेम और विश्वास इतना गहरा है कि वे जानते हैं कि भगवान को किसी लाउडस्पीकर की ज़रूरत नहीं है। वो चींटी के पैर में बंधी नूपुर यानी पायल की झंकार सुन लेता है। उसकी नज़रों से कोई नहीं बचता। सबकी खैर वो लेता है।

ना जाने तेरा साहिब कैसा है।
मसजिद भीतर मुल्ला पुकारै, क्या साहिब तेरा बहिरा है?
चिंउटी के पग नेवर बाजे, सो भी साहिब सुनता है।
पंडित होय के आसन मारै लम्बी माला जपता है।
अन्दर तेरे कपट कतरनी, सो भी साहब लखता है।”

इसीलिए कबीर हमेशा ही मानवता, प्यार, ईश्क़ के महान मेटाफर बने रहेंगे।

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