मिलिए देश की पहली डॉक्टर से – नेशनल डॉक्टर्स डे

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-डॉ आनंदी बाई जोशी थीं भारत की पहली मॉर्डन मेडिकल की डॉक्टर
-महज़ 22 साल की उम्र में उन्होंने जीवन के चरम स्तर का कष्ट सहा और लक्ष्य को किया प्राप्त


संघर्ष हमेशा ही रचना को जन्म देता है। और बात जब भारत की हो तो यहां की मिट्टी में ही संघर्ष का सोंधा पन है। इसीलिए दुनिया की नज़र भारत के लिए कुछ विशेष ही होती है। भारत में अनेक विषमताएं रही हैं। जिसकी आलोचना, समीक्षा समय समय पर होती रही है। कभी दलित विमर्श तो कभी स्त्री विमर्श।

आज हम बात एक संघर्ष की करेंगे। एक स्त्री की करेंगे। वैसे भी भारत में हर स्त्री अपने आप में संघर्ष ही है। उसका जीवन एक संघर्ष होता है। केवल स्त्री ही नहीं बल्कि लगभग सभी स्त्रीलिंग अस्तित्व ही संघर्ष की बुनियाद पर टिका है। बात चाहे गंगा की हो या गाय की, या फिर खुद हमारी सम्पूर्ण प्रकृति की, हर एक संघर्षरत है।

पर बात यहाँ एक स्त्री की होगी। एक संघर्षशील स्त्री की। भारत की पहली डॉक्टर की। डॉ आनंदी बाई जोशी की। आज यानी एक जुलाई को नेशनल डॉक्टर्स डे मनाया जाता है। सबसे बड़ी बात तो ये है कि जिनके नाम (डॉ विधान चन्द्र रॉय) से ये दिन मनाया जाता है, जब वे महज चार साल के थे उस समय ही डॉ आनंदी बाई जोशी ने अपनी मेडिकल की पढ़ाई कर स्वदेश लौट गई थीं।
इस मायने से डॉ जोशी देश की पहली मॉडर्न मेडिकल की डिग्री धारक डॉक्टर थीं। लेकिन डॉक्टर्स डे उनके नाम के बजाय वोट बैंक के मद्देनजर पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री और डॉक्टर विधान चन्द्र रॉय के जन्म मृत्यु (डॉ विधान का जन्म और मृत्यु 1 जुलाई को ही हुई थी) के दिन मनाया जाना स्त्री मेधा को नजरंदाज करने योग्य है। खैर वोट बैंक की राजनीति का तकाज़ा कुछ भी हो, सच और इतिहास तो नहीं ही बदला जा सकता न..! चुँकि उस समय देश में पहली बार गढ़बन्धन की केंद्र सरकार बनी थी। वामपंथी गठबंधन के साथ इंदिरा गांधी ने सत्ता हासिल की थी। तो उन्होंने कई उपहारों में से एक ये भी उपहार वामपंथियों को दिया।

अब बात फिर से डॉ आनंदी बाई जोशी की ही करते हैं। डॉ जोशी की ज़िंदगी ने दुनिया के फेमिनिस्ट जमात को सोचने पर मजबूर कर दिया कि संघर्ष की पराकाष्ठा क्या हो सकती है.? कोई कितना सह सकता है और कितना टिक सकता है। हर कसौटी पर स्त्रियां ही खरी उतरी हैं।

ज़रा सोचिए, 19वीं सदी का भारत। भारत का भी वो भाग जहाँ के ब्राह्मण परिवार अपनी परम्पराओं के लिए अत्यंत संवेदनशील होते हैं। वहाँ की एक ब्राह्मण परिवार की एक बेटी की शादी महज़ 9 साल की उम्र में कर दी जाती है। आप केवल डॉ आनंदी के जीवन के एक एक पल को महसूस करते हुए सोचिए कि आपके घर में नौ साल का बच्चा क्या हैसियत रखता है। बात लड़के और लड़की की नहीं। नौ साल के बच्चों में तो अभी ठीक से संवेदनाओं के मनोभाव भी नहीं जागते। ऐसी परिस्थिति में महज नौ साल की बच्ची की शादी कर दी जाती है।

उनकी शादी जिनसे होती है, उनकी उम्र में साल या दो साल का अंतर नहीं रहता बल्कि पूरे 20 साल का अंतर रहता है। मतलब नौ साल के बच्ची की शादी 29 साल के आदमी गोपालराव जोशी से करा जाती है।

कहर किसको कहेंगे..? आगे सुनिए, वो नौ साल बच्ची अपनी शादी के छह साल में यानी डॉ आनंदी जब 14 साल की हुईं तब वो मां बन चुकी थीं। यातना, संताप की पराकाष्ठा केवल सोचकर मन सिहर उठता है, ज़रा सोचिए कि जिस महिला (मूलतः बच्ची) पर ये सब गुजर रहा होगा उसकी मानसिक हालत क्या रही होगी.!

एक तो बाल विवाह, दूसरा कम उम्र में माँ बनना, इसके बाद भी संकट का दौर खतम नहीं होता है। जिस बच्चे को उन्होंने जन्म दिया था उसकी महज 14 दिन में ही मृत्यु हो जाती है। उनकी मानसिक स्थिति को सोचिए तो मन व्याकुल हो उठता है।

………लेकिन यही अंतर होता है स्त्री और पुरुष में। जब संकट पुरुष पर आता है तो सबसे पहले उसका विवेक मर जाता है। और वही संकट जब स्त्री के हिस्से में आता है उसका विवेक जाग उठता है। ऐसा ही विवेक का जागरण डॉ आनंदी का भी हुआ। बच्चे को खोने के दर्द ने आनंदी को दुखी करने के साथ ही एक लक्ष्य भी दिया। उन्होंने ठान लिया कि वे एक दिन डॉक्टर बनकर रहेंगी। उनके इस संकल्प को पूरा करने में उनके पति ने भी उनकी पूरी मदद की।

अमेरिका में बनीं MD

मेडिकल की डिग्री हासिल करने के लिए शादीशुदा आनंदी अमेरिका गई। उस दौर में किसी शादीशुदा महिला का विदेश जाना एक संघर्ष और अजूबा और ही था। लेकिन तमाम आलोचनाओं से विचलित हुए बिना अपने संकल्प को पूरा करने के लिए आनंदी ने कोलकाता से पानी का जहाज पकड़ा और न्यूयॉर्क जा पहुंची। यहां उन्होंने पेंसिल्वेनिया के महिला मेडिकल कॉलेज में चिकित्सा पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया। 1886 में आनंदीबाई ने MD की डिग्री हासिल कर ली।… और इस तरह वे भारत की पहली महिला डॉक्टर बन गई। उसी साल आनंदीबाई भारत लौट आईं। डॉक्टर बन कर देश लौटीं आनंदी का भव्य स्वागत किया गया था। बाद में उन्हें कोल्हापुर रियासत के अल्बर्ट एडवर्ड अस्पताल के महिला वार्ड में प्रभारी चिकित्सक की नियुक्ति मिली।

टीबी से हुई मौत

जन्म और मृत्यु तो जीवन का अंग हैं। इंसान मर जाते हैं लेकिन उनका संघर्ष उन्हें कभी मरने नहीं देते।

26 फरवरी 1887 को आनंदीबाई की केवल 22 साल की उम्र में टीबी से मौत हो गई। साल 1888 में, अमेरिकी नारीवादी लेखक कैरोलिन वेल्स हीली डैल ने आनंदीबाई की जीवनी लिखी। डॉल, आनंदीबाई से परिचित थीं। साल 2019 में, मराठी में उनके जीवन पर एक फिल्म आनंदी गोपाल नाम से भी बनाई गई।

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