विराट गंगा का विराट मन – गंगा दशहरा पर विशेष 2

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गंगा को क्रोध भी आता है। जब वह असंख्य ग्रामों को निगल जाती हैं। जब कोसों तक खेत जलमग्न हो जाते हैं, पर गंगा का क्रोध बहुत जल्द शांत हो जाता है। उस समय। गंगा फिर से खुश नज़र आती है। लोकमाता गंगा को सचमुच इसी तरह खुश रहना चाहिए। आज भी देश की अधिकांश आबादी गंगा के तट पर है। क्रोध की बात भुलाकर गंगा को हमेशा खुश रहना अधिक पसन्द है। और उनका आशीर्वाद मुझको सदैव प्राप्त रहता है। आर्यों के बड़े बड़े साम्राज्य गंगा के तट पर स्थापित हुए थे। गंगा की छोटी बड़ी लहरें उन साम्राज्यों की गाथा आज भी सुना सकती हैं।

गंगा को सदैव इस बात पर गर्व रहेगा कि उसी ने कुरुपांचाल प्रदेश का अंग बंग आदि प्रदेशों के साथ गठबंधन कराया।  बाल्मीकि और व्यास ने गंगा को प्रणाम किया। बुद्ध और महावीर ने उसका आभार माना। अशोक, समुद्रगुप्त और हर्ष ने उसमें स्नान किया होगा। कालिदास ने इसके तट पर खड़े होकर देखा होगा कि किस प्रकार लोकमाता बाँह उठाकर आगंतुक का स्वागत करती हैं। तुलसी और कबीर ने बार बार उनके दर्शन किये होंगे।

जय गंगा मैया! भक्तों का जयघोष गंगा की शत गौरव – गाथा का प्रतीक है। गंगा का जल लेकर गंगा का अभिषेक करने वालों की कभी कमी नहीं रही। चारों तरफ शान्ति का स्निग्ध वातावरण , यह गंगा तट की विशेषता है।

जैसे हर कोई यह पूछना चाहता हो-

गोत्री के संस्मरण तो तुझे याद होंगे, गङ्गा मैया !
दूर तक फैला हुआ क्षितिज,
हरे भरे खेत, एक साम्राज्ञी की तरह अपने पथ पर अग्रसर होती गंगा, यह दृश्य गंगा की मातृ वत्सलता का प्रतीक है।

मेरी समझ से यही लगता है कि ‘गंगा का दर्शन कुछ एक ही तरह का नहीं है। गंगोत्री के पास बर्फ से ढके हुए प्रदेशों में इसका खेलने वाली गुड़िया बेटी का कन्या रूप। उत्तर काशी की ओर चीड़ देवदार के काव्यमय प्रदेश में मुग्धारूप। देव प्रयाग के पहाड़ी और संकरे प्रदेश में चमकीली अलकनन्दा के साथ इसकी अठखेलियां। लक्ष्मण झूले की विकराल दंष्ट्रा में से छूटने के बाद हरिद्वार के पास कई धाराओं में अलग होकर इसका मनोहारी विहार।

कानपुर से सटकर जाता हुआ इसका इतिहास प्रसिद्ध प्रवाह। तीर्थराज प्रयाग के विशाल पाट के ऊपर इसका यमुना के साथ लोकपावन त्रिवेणी संगम हरेक की शोभा कुछ निराली ही है। एक दृश्य को देखकर दूसरे की कल्पना ही नहीं हो सकती। हरेक का सौदर्य जुदा। हरेक का भाव जुदा। हरेक का वातावरण जुदा और हरेक का महात्म्य जुदा है।

हे राम ! पंजाबी लोकगीतों में गंगा की प्रेम आराधना आज भी प्रतिध्वनित होती है। अब यही सोचते हैं कि पंजाब की धरा से गंगा का क्या सरोकार.? लेकिन पंजाब से लेकर प्रयाग तक गंगा गंगा का उद्घोष होता रहता है।

गंगा और यमुना को सहोदरा बहनों के रूप में देखने की बात मर्मस्पर्शी है। भव्यता का भण्डार हिमालय दोनों बहनो का पीहर यानी मायका है। 

उन्हे बेटियों के रूप में अपनाया गया है -दोनों बेटियों में गंगा से यमुना बड़ी हैं। समझदार हैं। सयानी हैं। गम्भीर है। वह कृष्ण भगिनी द्रौपदी जैसी कृष्णवर्णा और वैसी ही मानिनी भी हैं।

गंगा तो मानो बेचारी मुग्धा शकुन्तला ही ठहरी; तो भी देवाधिदेव महादेव ने उसे अङ्गीकार किया और इसीलिए यमुना ने अपना बड़प्पन छोडकर गंगा को ही अपनी सरपरस्ती सौंप दी। ये दोनों हिमालय की बेटियाँ आपस में मिलने के लिए बड़ी ही उतावली दिखाई देती हैं। हिमालय में एक जगह पर तो दोनों बहुत ही नज़दीक आ जाती है। लेकिन ईर्ष्यालु दंडाल पहाड़ बीच में विघ्नसन्तोषी की तरह आड़े आकर उनका सम्मिलन नहीं होने देता।

गढ़वाली लोकवार्ता में एक ऋषि की गाथा आज भी सुरक्षित है। यमुना तीर पर इस ऋषि की कुटिया थी। पर उन्होंने यह शपथ ले रखी थी कि हर रोज गंगा स्नान किया करेंगे। वर्षों तक उनका यही कार्यक्रम रहा। रोज़ गंगा पर नहाने जाते और यमुना के तीर पर अपनी कुटिया में लौट आते। फिर जब वृद्धावस्था के कारण गंगास्नान कठिन हो गया तो गंगा मैया को ऋषि पर दया आ गई और अपने प्रतिनिधि के रूप एक झरना यमुना तीर पर ऋषि की कुटिया के समीप ही भेज दिया।

कई वर्षों तक ऋषि इस झरने में स्नान करते रहे। आज भी वह झरना ऋषि की पुण्यस्मृति में कलकल निनाद करता बह रहा है। हिमालय के यात्री को देहरादून के समीप यह ख़्याल अवश्य आता है कि गंगा और यमुना बहनों की तरह गले मिलेगी और फिर एक लम्बी यात्रा के लिए अग्रसर होंगी।

पर उनका सम्मिलन नहीं हो पाता। गंगा उत्तर काशी की ओर लपकती है; टेहरी, श्रीनगर, हरिद्वार, कन्नौज, ब्रह्मावर्त, कानपुर आदि प्राचीन स्थानों की प्यास बुझाने की बात उसे किसी के भुलाये नहीं भूलती। उधर यमुना कुरुक्षेत्र और पानीपत के मैदान के रास्ते भारत की राजधानी के समीप आ पहुंचती है और फिर मथुरा, वृन्दावन और आगरे की शोभा बढाती हुई गंगा से मिलने के लिए आगे बढ़ती है। सच है, कानपुर और कालपी दूर नहीं। यहां गंगा का समाचार पाकर यमुना एक दौड़ लगाती है।  तीर्थराज प्रयाग में पहुँच कर गंगा के गले से लिपट जाती है।
खुशनसीब है हिमालय जो गंगा यमुना के यशस्वी पिता हैं। अपनी बेटियों के मिलन को देखकर विभोर हो जाते हैं।

गंगा की सहायक नदियों मे यमुना की ब्रजकेलियां यात्री का ध्यान आकर्षित करती हैं तो सरयू की अठखेलियों भी उसे कुछ कम नहीं भाती। सरस्वती की अगोचरता सुविख्यात है। गदकारी सोनभद्र का सुनहरा चीर फहराने लगता है तो दृश्य और भी सुन्दर नज़र आता है। राम गंगा तो वस्तुतः एक कन्या के समान है। गात की मझोली, भाव की गम्भीर – बरेली, मुरादाबाद , शाहजहाँपुर, फरूखाबाद और हरदोई के जिलों मे राम गंगा का चंचल सौंदर्य खिल उठता है। फुदकती, मचलती, वह मुड़ मुड़कर देखती हैं। लौट – लौटकर पीहर की याद में खोई सी, अनेक ग्रामों को प्रायद्वीप बनाती हुई। इस प्रकार वह गंगा से मिलने के लिए आगे बढ़ती हैं। कहते हैं गंगोत्री से लेकर प्रयाग तक उत्तरांत्तर बढ़ती हुई गंगा एक रूप है। दोहरे पाट वाली खेलती – कूदती यमुना को प्रयाग के स्थान पर गंगा में मिलते देखकर कालिदास की लेखनी ने एक सजीव चित्र प्रस्तुत कर दिया था।

चौदह वर्ष के वियोग के पश्चात पुष्पक विमान में बैठे राम नीचे गंगा यमुना के संगम का दृश्य देखकर सीता से कहते हैं

‘हे निर्दोष अङ्ग वाली सीते!

देखो, इस गंगा के प्रवाह में यमुना की तरंगें धंस कर प्रवाह को खंडित कर रही हैं। यह कैसा अनूठा दृश्य है! कहीं ऐसा दीखता है, मानो मोतियो की माला में पिरोये हुए इन्द्रनीलमणि मोती की आभा को धुंधला कर रहे हों। कहीं ऐसा लगता है, मानो श्वेत कमल के हार में नीले कमल गूंथ दिये हो। कहीं मानो मानसरोवर को जाते हुए श्वेत हंसों के साथ कृष्ण वर्ण कादंब पक्षी उड़ रहे हों। और कहीं ऐसा प्रतीत होता है, मानो महादेव के भस्म – भूषित शरीर पर काले – काले साँपो के आभूषण धारण करा दिये हों। अनेक नदियां हैं। अनेक संगम हैं। पर प्रयागराज के त्रिवेणी संगम से क्या मुकाबला?

गंगा की अद्वितीय सरलता और निष्कपटता देखकर हम उसे एक तपस्वी कन्या के रूप में अपनाते हैं। यमुना मानिनी है , जैसे वह कोई राज – कन्या हो। सब संगम देख पाइए। प्रयागराज की शोभा अद्वितीय है। यह शुक्ल – कृष्ण प्रवाह और कहाँ मिलेगा? गंगा के अनेक रेखाचित्र अंकित किये जा सकते हैं।

प्रयाग के बाद गंगा एक कुलवधू की तरह गम्भीर और सौभाग्यवती दिखाई देती है। इसके बाद गंगा में बड़ी – बड़ी नदियां मिलती जाती हैं। यमुना का जल मथुरा – वृन्दावन से श्रीकृष्ण के संस्मरण अर्पण करता है। अयोध्या में होकर आने वाली सरयू आदर्श नरपति रामचन्द्र के प्रताप, किन्तु करुण जीवन की स्मृतियां लाती है। दक्षिण की ओर से आने वाली चंबल नदी राजा रंतिदेव के यज्ञ – योग की बातें सुनाती है। जब कि महान कोलाहल करता हुआ सोनभद्र नद गज और काशी के भीषण युद्ध की झांकी कराता है। इस भांति हृष्ट – पुष्ट बनी हुई गंगा पाटलिपुत्र (पटना) के पास मगध साम्राज्य, के समान विस्तीर्ण हो जाती है।

फिर भी गंडकी अपना अमूल्य कर – भार लिये हुए हिचकिचाई नहीं। जनक और अशोक की, बुद्ध और महावीर की प्राचीन भूमि से निकल कर आगे बढ़ती हुई गंगा मानो विचार में पड़ जाती है कि अब कहाँ जाना चाहिए। जब इतनी प्रचण्ड जलराशि अपने अमोघ वेग से पूर्व की ओर बह रही हो, तब उसे दक्षिण की ओर मोड़ देना क्या कोई सरल बात है फिर भी वह उस ओर मुड़ जाती है।

जिस प्रकार दो सम्राट अथवा दो जगद्गुरु एकाएक एक दूसरे से नहीं मिलते, उसी तरह गंगा और ब्रह्मपुत्र का हाल है। ब्रह्मपुत्र हिमालय के उस ओर का जल समेट कर आसाम में से होती हुई पश्चिम की ओर जाती है और गंगा इस ओर से पूर्व की ओर जाती है। दोनों का मिलाप आमने – सामने कैसे हो सकता है? कौन किसके सम्मुख पहले मुड़े? कौन किसे पहले रास्ता दे? अन्त में दोनों ने निश्चय किया कि दोनों को दाक्षिण्य – एक दूसरे को प्रसन्न करने की उदारता का विचार करके सरित्पति – सागर के दर्शन के लिए जाना चाहिए और भक्ति – नम्र होकर जाते – जाते, जहाँ भी सम्भव हो वहाँ, मार्ग में एक – दूसरे से मिल लेना चाहिए।

इस प्रकार गोलन्दो के पास जब गंगा और ब्रह्मपुत्र का विशाल जल आकर मिलता है तब यह शंका होने लगती है कि क्या समुद्र इससे कोई भिन्न ही तरह का होता होगा? जिस प्रकार विजय पाने के बाद खड़ी हुई सेना अव्यवस्थित हो जाती है और विजयी वीर जहां – तहाँ घूमते – फिरते हैं, उस तरह संगम के बाद इन नदियों की भी वही दशा होती है। ये अनेक रास्तों से सागर में मिल जाती है। गंगा और ब्रह्मपुत्र, एक होकर पद्मा का नाम धारण करती हैं। यही पद्मा आगे जाकर मेघना के नाम से पुकारी जाती है।

यह अनेक मुखी गंगा कहां जा रही है? सुन्दरवन में बेत के मुण्ड उगाने के लिए या सागरपुत्रों की वासना को तृप्त कर, उनका उद्धार करने के लिए? 

एक लहर दूसरी लहर के गले मिलती है। जाने किसकी बांसुरी इस लहर को अपने स्वगे पर उठा लेती है। गंगा का नाम बढ़ा है। गंगा की लहरें भी कोई साधारण लहरें नहीं। बाँसुरी के स्वरों पर ये लहरें गर्व से सिर उठाती हैं। निर्जन वन – प्रांतर को चीरते , इधर – उधर टकराते बांसुरी के स्वर गंगा की लहरों का अभिनन्दन करते हैं। बाँसुरी बजाने वालों मे वे भाग्यशाली हैं जो किसी – न – किसी रूप में गंगा का गान करते हैं । मुझे भय है कि कहीं कोई यह न समझ ले कि लोकगीतों में कुछ ऐसी रचनाएँ होती ही नही जिन्हें काम – चलाऊ तो कह सकते हैं पर सफल नहीं कह सकते , क्योंकि वे अपने विषय को पकड़ नहीं पाती । ऐसे असफल गीतों की गिनती कुछ कम नही । पर मेरा संकेत तो उन्हीं गीतों की ओर है जिनमें लोक – मानस ने गंगा को पूरी तरह देखते हुए गहरे – हलके रंगो के मेल से गंगा का चित्र प्रस्तुत किया है । लोक – मानस ने भी प्रत्येक युग में प्रयोग किये हैं । शब्द , स्वर , लय , ताल – प्रत्येक सूत्र को हिलाकर मंझोड़ कर व्यापक सत्य की अभिव्यक्ति , यही इन प्रयोगों का ध्येय रहा है । गंगा चढे वेग से आगे बढ़कर – पहाडो को पीछे छोड़कर , समतल धरती पर उतरती है । वही वस्तुतः उसकी विशालता का प्रारम्भ होता है । जैसे वह एक सांस्कृतिक इकाई के रूप में अपनी पुण्य गति से धरती का माप लेती हुई सागर तक पहुँचने के लिए उत्सुक हो उठी हो । कोई उससे आशीर्वाद माँगे तो वह संकोच नहीं करेगी , पर वह रुक नहीं सकती – उसे आगे बढ़ना है अवश्य । युक्त – प्रान्त के एक सोहर गीत की पृष्ठ भूमि मे यही भावना काम करती है कि गंगा खुश हो जाय तो नारी की कोख झट हरी हो सकती है।

उस याचिका भक्तिन का गंगा के साथ संवाद का प्रसंग देखें-

गंगा यमुना के बीच एक स्त्री तप कर रही है , ‘ हे गंगा , अपनी एक लहर तुम मुझे दे देती तो मै मंझधार में डूब जाती । ‘ ‘ क्या तुझे सास – ससुर का दुख है ? क्या तेरा नैहर दूर है ? हे स्त्री , क्या तेरा पति परदेश में है ? किस दुखसे तुम डूबना चाहती हो ? ‘ ‘ हे गंगा , न मुझे सास – ससुर का दुःख है , न नैहर दूर है , हे गंगा , न मेरा पति परदेश मे है , मै कोखके दुःख से डूबना चाहती हूँ । ‘ ‘ हे स्त्री , तुम अपने घर जाओ , मै तुम्हें लहर न दूंगी । हे स्त्री , आज से नवे महीने तेरे पुत्र होगा । हे गंगा , मैं तुम्हे चटक रंगकी पीली साड़ी चढ़ाऊँगी , जब मेरे पुत्र होगा । गंगा , मुझे भगीरथ जैसा पुत्र दो , संसार जिसका यश गान करे । ‘

अयोध्या के प्रसिद्ध सूर्यवंशी राजा दलीप के पुत्र राजा भगीरथ घोर तपस्या करके गंगा को पृथ्वी पर लाये थे – यह पुरातन परम्परा है । इसीलिए गंगा का एक नाम भगीरथी भी है । इस लोकगीत में ग्राम की स्त्री और गङ्गा का वार्तालाप बहुत महत्वपूर्ण है । गंगा आशीर्वाद देती है , और ग्राम की स्त्री का खुश होकर गङ्गा को चटक रंग की पीली साडी चढ़ाने की बात अत्यन्त स्वाभाविक है । और उससे भी अधिक स्वाभाविक है भगीरथ जैसा पुत्र प्राप्त करने की इच्छा जिसका यश दूर – दूर तक फैलता चला जाय । युक्त प्रान्त के ग्रामो मे मेलो की प्रथा बहुत पुरानी है । स्त्रियाँ मुढ बाँधकर मेले मे सम्मिलित होने के लिए चल पड़ती हैं । चलते – चलते गाये जाने वाले गीत अत्यन्त प्रभावशाली होते है । गंगा के किनारे के ग्रामों में मेलो की शोभा विशेषरूप से उल्लेखनीय है । अतः मेले के गीतों में गंगा का दर्शन स्वाभाविक वस्तु है ।

एक प्रसंग में शिव बारह वर्षों के पश्चात् लौटते हैं और गौरी के सत की परीक्षा लेते हैं । पहली परीक्षा मे जब गौरी सूर्य के सम्मुख माथा टेकती है तो सूर्य अलोप हो जाता है । शिव कहते हैं – मै यह तुम्हारी सूर्य – परीक्षा स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं , तुम तुलसी परीक्षा दो । गौरी तुलसी पर हाथ रखती है तो तुलसी के पत्ते झड़ जाते हैं । इस पर शिव कहते है – हे गौरी , मैं तुलसी – परीक्षा स्वीकार नही करता , तुम गङ्गा – परीक्षा दो।

जब गौरी ने गङ्गा पर हाथ रखा , गङ्गा रेत मे समा गई। ऐसे करोड़ों मनोहारी और मर्मस्पर्शी प्रसंगों से गंगा का गान भरा हुआ है।

जैसे लोकगीतों में गंगा का विशेष महत्व है। उदाहरण के लिए कन्या – विदा का मार्मिक दृश्य अंकित किया गया है।

बाबा के रोवले गंगा बढ़ी अइली
आमा के रोवले अन्हार ए
आ रे भइया के रोवे चरन धोती भीजे
भउजी नयनवा न लोर

मतलब यह कि पिता के रोने से गंगा में बाढ़ आ गई। माता के रोने से अंधेरा छा गया। भाई के रोने से उसके चरणो की धोती भीग गई भावन के नयनो में अश्रु नही हैं।

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