शब्दों से साँसों में सिहरन लाने वाले साहिर

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ज़िन्दगी का जादूगर लुधियानवी की पुण्यतिथि पर विशेष

तुमने साहिर से बड़ा रंग देखा है कभी साहिर लुधियानवी..

नाम लेते ही ऐसा रंग सामने आता है जो आज तक हर किसी पर चढ़ा हुआ है। दिवाली से ठीक पहले आज साहिर की पुण्यतिथि है। साहिर जिनकी शायरी ने ज़िन्दगी के कई रंगों को अपने आगोश में भरा है। साहिर की पुण्यतिथि पर उनके कुछ रंगों की रंगत।

जिंदगी की उलझनों को जीकर उसे सुलझाने वाला साहिर..उनकी शख्सियत भी जादुई थी। जिनके गीत, गजलें और नज्में नौजवानों से लेकर बुजुर्गो तक पर जादू करते थे। अब्दुल हई बनकर लुधियाना में जीने का उद्यम करने वाला साहिर.. मुंबई जाकर सब पर छा जाने वाला साहिर.. जिसे माता-पिता के अलगाव के दौरान की कशमकश पत्थर बना सकती थी लेकिन जो पत्थर नहीं, साहिर बना। वही साहिर, जिसे बरक्स प्रगतिवादियों ने अली सरदार जाफरी को खड़ा करने की कोशिश की। आज फर्क समझ में आता है कि साहिर कहां और दूसरे कहां। साहिर के रंगों की बानगी यह है कि वे जितने सोज से भरे फिल्मी गीतकार थे, उतने ही संजीदा गजलगो और नज्म के शायर भी थे। नाकाम ईश्क अक्सर दिलजले पैदा करता है। शायरी में कायम स्त्री प्रतिष्ठा साहिर इतने जिम्मेदार और जिंदगी से इश्क करने वाले थे कि उनका नजरिया उनकी शायरी में झलका और आम लोगों तक पहुंचा। साहिर ने इतने रंग देखे और झेले थे कि उनका साहिर होना ही अपने आप में ऐसा रंग है जो सब पर दिखता है और अब तक दिख रहा है।

गीतों में औरतों का बयान

एक बाबुल बनकर बेटी को सुखी संसार की कामना करते हुए विदाई देने वाले साहिर ने कौन सा रंग नहीं दिया दुनिया को। दरअसल, दुनिया का दिया हुआ ही लौटाया..तजुर्बात-ओ हवादिस की शक्ल में। उनकी मौलिकता ताजमहल को भी स्वीकार करने को तैयार नहीं थी इसलिए तो महबूब को सलाह दे दी- ‘ये चमन-जार ये जमुना का किनारा ये महल/ये मुनक्कश दर ओ दीवार ये मेहराब ये ताक/इक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर/हम गरीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मजाक..मेरी महबूब कहीं और मिलाकर मुझसे।’साहिर के बस का ही था कि विसंगतियों की रात के चित्रण के बावजूद सुबह की आस जिंदा रही.. यही सृजक का धर्म है.. ‘इन काली सदियों के सिर से जब रात का आंचल ढलकेगा/जब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख का सागर छलकेगा/जब अंबर झूम के नाचेगा जब धरती नग्मे गाएगी/वो सुबह कभी तो आएगी।’

साहिर की कलम से चुनर मोरी कोरी चुनर मोरी कोरी, उमर मोरी बाली धीरे रंग डारो, करो न जोरा जोरीबरस भरे बीते, तब आए कहीं होरी झिझक नहीं हमसे, निकट आजा गोरी धीरे धीरे पिचकारी मारोनहीं मारो बेदर्दी से कस के देखो देखो बैंया न खींचो मोहे तुमरी कसम, मोहे लागे सरम मानो मानो अरज मानो मोरी चुनर मोरी कोरी भीगी भीगी चुनरी से झांके तोरे मतवाले अंगों का जादू आजा मेरी बाहों में छुप जागोरी घबरा के यूं न सिमट तु मिले तन से जो तन बुझे मन की अगन कहें हम भी की आई है होरी बरस भरे बीते।

यह रहस्य नहीं कि साहिर की शायरी में जब भी महिलाएं आई, पूरी प्रतिष्ठा और गरिमा के साथ आई। जब-जब उस प्रतिष्ठा और गरिमा का स्खलन दिखा, साहिर ने समाज को आईना दिखाने से कोई परहेज नहीं किया। फिल्म ‘साधना’ के एक गीत के बोल जब-जब गूंजते हैं, साहिर याद आते हैं, उनका स्त्री विमर्श इसी दरवाजे से खुलता है कि- ‘औरत ने जनम दिया मर्दो को, मर्दो ने उसे बाजार दिया/जब जी चाहा मसला कुचला, जब जी चाहा दुत्कार दिया/ मर्दो के लिए हर ज़ुल्म रवा औरत के लिए रोना भी खता..।

एक अच्छा कवि जो लिखता है, वह कालजयी होता है। क्या इन पंक्तियों की प्रासंगिकता अब भी कहीं से भी कम है- ‘ये बीवी भी है और बहन भी है मां भी/ सना-ख्वान-ए-तकदीस-ए-मशरिक कहां है/ मदद चाहती है ये हव्वा की बेटी/ यशोधा की हम-जिन्स राधा की बेटी/ पयंबर की उम्मत जुलेखा की बेटी..।संवेदना में पगी नफासतसाहिर के पास नफासत और आपसी समझ का कितना ऊंचा स्तर होगा कि वे कह उठे थे- ‘चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों..! ऐसी शायरी बिना संवेदना से पगी वैचारिकी के बिना संभव ही नहीं थी। यही कारण है कि वे कहते हैं- ‘लोग औरत को फकत जिस्म समझ लेते हैं/ रूह भी होती है उस में ये कहां सोचते हैं/ रूह क्या होती है इससे उन्हें मतलब ही नहीं/ वो तो बस तन के तकाजों का कहा मानते हैं/ रूह मर जाती है तो ये जिस्म है चलती हुई लाश/ इस हकीकत को न समझते हैं न पहचानते हैं/ कितनी सदियों से ये वहशत का चलन जारी है!’

अमृता से खास रिश्ता

साहिर जैसा शायर ही कह सका था -‘बरसो राम धड़ाके से/ बुढि़या मर गई फाके से/ कल-जुग में भी मरती है सत-जुग में भी मरती थी/ ये बुढि़या इस दुनिया में सदा ही फाके करती थी..। ‘ जिनकी लेखनी में रहे हर रंग अमृता प्रीतम से उनके संबंध अब नई पीढ़ी भी जानती है। बलवंत गार्गी की पुस्तक में भी साहिर की झलक मिल जाती है। महिलाओं की सोहबत में खुशवंत सिंह भी रहे हैं, शिव बटालवी भी और साहिर भी। विचार की पुष्टता ही शिव और साहिर को अलग खड़ा करती है। शिव के यहां उदासी है, साहिर के यहां हर रंग है। इंसान की औलाद के इंसान बनने की सलाह से लेकर हर फिक्र को धुएं में उड़ाने का माहिर होने तक सिर्फ और सिर्फ साहिर..। ऐसा साहिर होना आसान कहां है। निजी दुख साहिर की अभिव्यक्ति को बंधुआ नहीं बना सका। उलाहने के स्वर में भी वैचारिकी साहिर से किनारा नहीं करती- ‘आप बे-वजह परेशान सी क्यों हैं मादाम/ लोग कहते हैं तो फिर ठीक ही कहते होंगे/मेरे अहबाब ने तहजीब न सीखी होगी/ मेरे माहौल में इंसान न रहते होंगे।’ जिंदा रही सुबह की आस साहिर के रंग युद्ध के विरुद्ध थे..नारी प्रतिष्ठा के पक्ष में थे..मानवता के साथ खड़े थे..हुस्न और इश्क को गरिमा देने के हक में थे। साहिर का ईश्क़ भी फाकाकशी का शिकार है। फाकाकशी में खुद्दारी का रंग बरकरार रहता है।

मेरे ख़्वाबों के झरोकों को सजाने वाली
तेरे ख़्वाबों में कहीं मेरा गुज़र है कि नहीं
पूछ कर अपनी निगाहों से बता दे मुझ को
मेरी रातों के मुक़द्दर में सहर है कि नहीं

चार दिन की ये रिफ़ाक़त जो रिफ़ाक़त भी नहीं
उम्र भर के लिए आज़ार हुई जाती है
ज़िंदगी यूं तो हमेशा से परेशान सी थी
अब तो हर सांस गिरां-बार हुई जाती है

प्यार पर बस तो नहीं है मिरा लेकिन फिर भी
तू बता दे कि तुझे प्यार करूं या न करूं
तू ने ख़ुद अपने तबस्सुम से जगाया है जिन्हें
उन तमन्नाओं का इज़हार करूं या न करूं

तू किसी और के दामन की कली है लेकिन
मेरी रातें तिरी ख़ुश्बू से बसी रहती हैं
तू कहीं भी हो तिरे फूल से आरिज़ की क़सम
तेरी पलकें मिरी आंखों पे झुकी रहती हैं।।

इस नज़्म के बाद खैय्याम के संगीत, गायक मुकेश की आवाज़ में साहिर के इस फेमस गीत के साथ आपको छोड़े जाते हैं।

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