संवेदनाओं का सेहरा है शब्द

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-बच्चों को मनाने जितना कठिन है लिखना
-शब्दों में ही लव से हेट तक की दूरी छिपी है


जब हमारे पास कोई हसीन नजारे दिखने बंद हो जाते हैं तो शब्द हमें अपनी दुनिया की सैर कराते हैं। शब्दों की जादुई दुनिया में प्यार, इज़हार, तकरार, गुस्सा, नफरत, हसीन ख्वाब, कमजोर हक़ीकत, नज़रफ़रेब नज़ारे, संस्कार, संहार; सबकुछ दिखाई देता है। कहते हैं एक चित्र हजार शब्द को बयां करता है। लेकिन जब चित्रों और चेहरों से नफरत और चिढ़ होने लगे तो एक शब्द लाखों मंजरों की दास्तां कहने लगता है। 

अब ईश्क को ही ले लें..! प्रेमी अपनी जिन्दगी का हर सुनहरा पल, स्वर्णिम उत्कृष्ट लगा देता है बस अपने कानों को वो ऐतिहासिक तीन शब्द सुनने के लिए; आई लव यू..!
…..लेकिन आगे चलकर यही फाॅरमेट कैसे बदल जाता है इसका अंदाजा किसी को नहीं लगता।

शब्दों के विन्यास यानी सेंटेक्स में कर्ता और कर्म यानी सब्जेक्ट और ऑब्जेक्ट तो वही रहते हैं बस क्रिया कैसे बदल जाती है यह लाजवाब और लाइलाज प्रश्न या मर्ज है। जो इंतजार की कहानी आई लव यू सुनने से शुरू होती है वो अक्सर आई हेट यू पर खत्म होने को कैसे बेताब हो जाती है। यह सब शब्द के सिवा और कोई नहीं बता सकता। इंसान की सारी हरकतों में शब्दों की अधिक एहमियत होती है।

इंसान जब खालीपन से गुजरता है तो उसे शब्द ही सहारा देने आते हैं। अगर आपका प्यार थोड़ा परेशान है तो आप उसे दुनिया के उपहार दे डालिये उसके मन को न भायेगा, लेकिन वहीं कोई चंद रोमांटिक शब्दों की माला उसे पहना दीजिये तो वो आपके लिए मन के कुसुम बिछा देगा/देगी।

इसमें एक शर्त भी है। आप बहुत मेहनत करके लिखिए। और सामने वाला उसे टेकेन फ़ॉर ग्रांटेड ही लेकर उसे छोड़ दे तो आपको ये कतई नहीं समझना चाहिए कि आपसे वो नाराज़ है। उस स्थिति में आपको अपने कंटेंट पर फिर नज़र दौड़ानी चाहिए। कहीं न कहीं आपके लिखने में या अभिव्यक्ति में ही दिक्कत हुई है जो उसे स्विकार नहीं हुआ। बहुत बार ऐसा होता है कि आपका लिखा हुआ पाठक के मन तक न जाये। आपने भले ही बहुत मन से लिखा हो। सारा काम छोड़कर लिखा हो।

प्यार के शिरे में डुबोये शब्दों और यादों के व्याकरण से अगर कुछ लिखा जाए तो निश्चित सामने वाले का रिप्लाई मिलेगा ही मिलेगा। अगर नहीं मिलता है तो लिखने में कमी है।

पाठक, दर्शक, महबूब, बच्चे; बतौर लेखक, सर्जक हमारे सच्चे समीक्षक होते हैं। तो पहले इनके दिल में उतरने के लिए शब्द साधना जरूरी है। वो दुष्यंत कुमार कहते हैं न

मेरे गीत तुम्हारे पास सहारा पाने आएँगे
मेरे बाद तुम्हें ये मेरी याद दिलाने आएँगे।।
थोड़ी आँच बची रहने दो, थोड़ा धुआँ निकलने दो,
कल देखोगी कई मुसाफ़िर इसी बहाने आएँगे।।

अगर आपके शब्दों की ज्योति में कोई मुसाफ़िर नहीं आता दिखाई दे रहा है तो अपने शब्दों के व्याकरण रूपी तेल को चेक करने की बहुत ज़रूरत है।

आज के सोशल मीडिया के ज़माने में भी ये शब्द एहमियत रख रहे हैं। लाइक्स, शेयर और सब्सक्रिप्शन भी शब्दों की सुनहरी मंजरी होने पर ही मिलते हैं।

अक्षर हमारी भाषा की, हमारी अभिव्यक्ति की पहली इकाई होते हैं। संस्कृत में अक्षर का अर्थ है, जिसका क्षरण न हो। यानि जो हमेशा रहे। विचार की यही शक्ति है। यही सामर्थ्य है। हजारों साल पहले जो विचार, जो ज्ञान किसी ऋषि, महर्षि, वैज्ञानिक, दार्शनिक ने हमें दिया, वो आज भी संसार को आगे बढ़ा रहा है। इसीलिए, हमारे उपनिषदों में, हमारे शास्त्रों में अक्षर ब्रह्म की बात कही गई है, ‘अक्षरम् ब्रह्म’ का सिद्धान्त दिया गया है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है-“शब्द ब्रह्मणि निष्णातः परम् ब्रह्माधि गच्छति”॥ यानि, शब्द ही ब्रह्म है। जो इस शब्द ब्रह्म को पूरी तरह जान लेता है, वह ब्रह्मत्व को, ईश्वरत्व को पा लेता है।

शब्द की महिमा, शब्द को ईश्वर कहने का ऐसा उदाहरण कहीं और नहीं मिलता। इसलिए, शब्दों में सच कहने का साहस, झूठ का तिलिस्म, सकारात्मकता देने की शक्ति, शब्दों से सृजन करने की सोच, ये भारतीय मानस का स्वभाव है। हमारी प्रकृति है। जब हम इस शक्ति को महसूस करते हैं, तब एक साहित्यकार के रूप में, एक लेखक के रूप में अपने महत्व को समझ पाते हैं। समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी महसूस कर पाते हैं।

मेरी बेटियाँ हैं। दोनों जब नाराज़ होती हैं तब एक कहानी लिखनी पड़ती है हमें। उन्हें कहानी सुनाकर मनाना होता है। मेरी कहानी तब तक मुकम्मल नहीं होती जब तक मेरी बेटी हमसे लिपट कर सो नहीं जाती। उसे अगर कहानी नापसन्द हुई तो वो सुनती ही नहीं। तब नाराज़गी दो दिनों तक खिंच जाती है।
ये मेरे लिए जीवंत उदाहरण है।

पाठक या दर्शक भी बच्चे की ही तरह हैं। उन्हें जब कंटेंट अच्छा लगेगा तभी हमें या आपको सुनेंगे या देखेंगे। वरना हजारों टीवी चैनल, लाखों यू ट्यूब चैनल और करोड़ों की संख्या में वेबसाइट, उन्हें अपनी ओर खींचने को तैयार हैं।

जब मन रोता है और कोई उसकी सिसकी सुनने वाला नहीं होता तो कलम से कागज पर आंसूओं के जिन्दा बयान दर्ज होते हैं। इंसान की लेखनी यानी हैंडराइटिंग बताती है कि लिखने वाला का मन कितना रुआसा है या खुशी से भरा या गुस्सा से जल रहा है। शब्दों की बुनावट हमारी बनावट को बयां करती है। इसीलिए कहने वाले कह के भी गए हैं कि तोल के बोल। नहीं तो यही शब्द हमारी कह के लेने लगते हैं। हमारी ज़िन्दगी में शब्दों का ख़ानदान बहुत हद तक निजी तौर पर दखलंदाजी रखता है।

अंतिम में एक बार फिर दुष्यंत से ही बातों को खत्म करना चाहेंगे-

वो मुतमईन है कि पत्थर पिघल नहीं सकता,
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिए।।

तो अब बच्चे को मनाने की कवायद शुरू करते हैं। अपने शब्दों में असर खोजते हैं।

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