संवेदनाओं से जोड़ते हैं मेटाफर्स

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-फाइन आर्ट्स को मुकम्मल करते हैं रूपक
-साहित्य या संवाद में वज़न लाने के लिए जरूरी है रूपकों का प्रयोग
-भारतीय राजनीति और साहित्य में मेटाफर्स का रहा है अहम स्थान


आजकल न्यूज़ चैनल को देखने से लगता है कि हम अचानक से मध्यकाल में पहुँच गए हैं। अजकल न्यूज़ चैनलों पर खबर नहीं बल्कि अवध के नवाबों की तरह मुर्गे लड़वाये जाते हैं। एक उसका रेफरी होता है जिसे एंकर कहते हैं।

आज खबरों में न तो सपाट बयानी यानी सीधी सादी न्यूज़ है और न ही रूपक यानी मेटाफर युक्त बातें। अधिक दूर न जाते हुए हम पिछले 15 पीछे जाते हैं। समाचार को देखकर बोलने और बात करने का सलीका सीखा जाता था। शाम को सात बजे उत्तर प्रदेश की खबर जब आती थी तो एक वरिष्ठ संवाददाता होते थे ए पी दीवान।

वो सारी खबर कह लेते थे तो अंतिम के वाक्य कुछ यूं होते थे कि खबर तो बहुत है फिर भी खबर यही है। लखनऊ से दूरदर्शन संवाददाता ए पी दीवान..! उनका एपी दीवान कहने मात्र में इतनी कशिश होती थी कि पिछली सारी न्यूज़ की एक पिक्चर आंखों में छप जाती थी।

खबरों में मेटाफर्स यानी रूपकों का प्रयोग हुआ करता था। राजनीति में रूपक..! हाँ, राजनीतिक में मेटाफर्स का प्रयोग समाचार के जरिये ही हुआ है। जैसे अटल बिहारी वाजपेयी को अजातशत्रु कहा गया। अटल जी के लिए ये रूपक डीडी नेशनल के रात नौ बजे आने वाले समाचार परिक्रमा में मृणाल पाण्डेय ने दिया था।

खैर हम बात केवल मेटाफर्स के प्रयोग की कर रहे हैं। न्यूज़ चैनल की अपनी रणनीति है, उनका काम वो देखें।

ऐसे ही राइटिंग या डायलॉग में अनेक अनेक पहलू होते हैं जिसमें रूपक यानी मेटाफर्स का प्रयोग होने से उस क्रिएशन में जीवंतता आ जाती है। मेटाफर्स क्रिएशन को ज़िंदा कर देते हैं। फाइन आर्ट्स (डांसिंग, सिंगिंग, एक्टिंग, पेंटिंग और राइटिंग) को मेटाफर्स ही मुकम्मल करते हैं। इसीलिए हर वो रचनाधर्मी जिसका करियर ही क्रिएशन है उसको मेटाफर्स का इल्म होना ही चाहिए।

बातों को रोचक बनाते हैं.!

राइटिंग सबसे अहम और जरूरी फाइन आर्ट की स्किल है। क्योंकि लिखने के बाद ही उसका अभिनय हो सकता है। उसे गाया जा सकता है। उसपर आधारित चित्र बनाये जा सकते हैं। शब्द से ही सृष्टि है। इसीलिए शब्दों को टकसाल में सिक्कों की तरह ढालना चाहिए। जिससे कि क्रिएशन कालजयी बने न कि कालातीत हो जाएं।

बदन और रूह में झगड़ा पड़ा है कि
हिस्सा ईश्क में किस का बड़ा है।
बहुत ज्यादा रोना से हूं दर-ब-दर
मैं कि घर में सर तलक पानी खड़ा है..

इन पंक्तियों में मशहूर शायर फरहत एहसास ने शेर-ओ-शायरी को अपने लफ्जों के साथ तराशा। लेखक के अंदर शब्दों का कारवां रहता है जिसे वो अनेक रूप में तराशकर पेश करता है।

जैसे कविता या शायरी में रूह मेटाफर बनकर रह गई

आज जिस्म के रास्ते बड़ी दुश्वारियां पैदा कर दी गई हैं। जिस्म को जीन्स के साथ जोड़ दिया गया है। रूह एक कंडीशन है। जो अजर है। अमर है। मगर इंसान को जीन्स से जोड़ दिया है। वो मेटाफर बन गया है। शायरी कविताओं में शायर अथवा कवि रूह या आत्मा का मेटाफर के रूप में इस्तेमाल करने लगा है। जब हम किसी से मुहब्बत करते हैं, पहली दफा उसके जिस्म से ईश्क करते हैं। फिर आगे जाकर हमारी संवेदनाएं उनसे जुड़ती हैं। और फिर इंसान अपनी मुहब्बत को अपने तरीके से इंटरप्रेट करता है।

जब कवि ने राष्ट्र बचाया

जब जब सियासत की वजह से समाज में सन्नाटा छाया है, तब तब साहित्य ने अपने रूपकों से सन्नाटे को तोड़ कर सुख व शांति की स्थापना की है। इसके लिए एक किंवदंती बताई जाती है।
50 के दशक में लाल किले पर जब कवि सम्मेलन हो रहा था। स्टेज की सीढ़ी काफी ऊंची थी। ऐसे में पंडित जवाहर लाल नेहरू लडख़ड़ा गए। कवि दिनकर ठीक उनके पीछे थे। दिनकर ने उन्हें संभालते हुए कहा, देश की राजनीति जब-जब लड़खड़ाएगी, साहित्य उसको संभालेगा। उसी समय नेहरू ने दिनकर का जवाब दिया कि आज कवि ने राष्ट्र को बचा लिया। लोग तो ये भी कहते हैं कि इसी घटना के बाद दिनकर को राष्ट्रकवि की उपाधि दी गई थी। ये राष्ट्रकवि भी अपने आपमें रूपक यानी मेटाफर है।

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