संस्कार की सांस गंगा धर्म की विश्वास गंगा

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गंगा दशहरा पर विशेष–1

हमारा देश भारत और माँ गंगा एक दूसरे से उसी प्रकार जुड़े हैं जैसे प्राण से शरीर। गंगा गोमुख से निकलकर 2525 किलोमीटर की जो संस्कारवादी संस्कृति की रेखा खिंचती हैं, वह अद्भुत  है।

निर्गुण सन्त कबीर के ‘निराकार’ राम से लेकर सगुण सन्त गोस्वामी तुलसीदास के ‘नराकार’ राम का इतिहास इसी संस्कार की रगों में संस्कृति के कण-कण और गंगा की कल-कल के साथ प्रवाहमान है।

यह गंगा के ही किनारों में वह ऊर्जा है जहाँ एक ओर, बुद्ध ने सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह का संदेश देते हुए भगवान बने तो दूसरी तरफ मन चंगा कर गंगा को कठौती लाने वाले सन्त रैदास ने स्थूल से सूक्ष्म की ओर आने का राग छेड़ा। 

इन्हीं किनारों पर विभिन्न मत मतान्तरों की अनुपम परंपरा जन्मी है। शैव्य, वैष्णव, द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि के चिंतनधारा गंगा तट से ही आगे बढ़ी।

यही गंगा, निराकार ब्रह्म के उपासक संत कबीर के नराकार राम के भक्त गुरु रामानंद की साक्षी हैं।

महापुरुषों ने गंगा को ही अपनी कर्म भूमि बनाई। आदि शंकराचार्य, महामना मालवीय, भारतेंदु हरिश्चंद्र, बाबूराव विष्णु पराड़कर जी, लाल बहादुर शास्त्री, कमलापति त्रिपाठी, नज़ीर बनारसी से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री तक ने अपनी कर्मभूमि गंगा संस्कृति को ही चुना।

भारत दुनिया में एकमेव राष्ट्र है जहाँ आज भी प्रकृति को देव रूप में पूजा जाता है। चींटी से लेकर शेर, कण से लेकर पहाड़ तक में देवत्व की प्रतिष्ठा मानी जाती है।

माँ गंगा न केवल भारत के लिए बल्कि सम्पूर्ण धरा का अनमोल अमृत रूपी उपहार हैं।

यह नदी के साथ साथ पालन करने वाली माँ भी हैं।

माँ गंगा मानव जीवन संस्कार की वह अमिट रेखा हैं जिनपर चलने की सीख हमेशा दी जाती है। गंगा का मतलब, शुद्ध, निर्मल, सतत प्रवाहमान। अविरलता हमारी संस्कृति की मूल पहचान है। इस पहचान को सम्बल प्रदान करती हैं, गंगा।

भारतीय सनातनी मानव जीवन में 16 प्रमुख संस्कार होते हैं। अधिकांश संस्कार गंगा तट पर सम्पन्न कराए जाते हैं। जहाँ गंगा का सानिध्य प्राप्त नहीं है वहाँ शब्दों के माध्यम से माँ का ध्यान और प्रणाम किया जाता है।

जातक के जन्म के छठवें दिन सूतिका को छट्ठी का स्नान भले घर में कराया जाता हो, लेकिन यह नहान गंगा को समर्पित गीतों/मन्त्रों के साथ सम्पन्न होता है। इसी प्रकार 12वें दिन पर बरही का स्नान होता है।

मुण्डन : जन्म के बाद प्रथम आधिकारिक संस्कार मुण्डन संस्कार है। यह संस्कार गंगा किनारे और गंगाजी को ‘पियरी’ चढ़ाने के साथ पूर्ण होता है।

विद्यारम्भ : मुण्डन के बाद विद्यारम्भ संस्कार होता है। विद्यारम्भ संस्कार में प्रथम पूज्य गणेश जी की आराधना के तुरंत बाद ही गंगा पूजैया होनी आवश्यक है। इसकी पूर्णता गंगा किनारे बैठकर वेदाभ्यास करके एवं वहीं सन्ध्या वंदन, स्नान के साथ पूर्ण होती है।

कन्छेदन : विद्यारम्भ के बाद जातक का कन्छेदन संस्कार होता है। घर पर गीत-गवनई एवं मंत्रोच्चार के बाद गंगा में स्नान एवं उनकी पूजा तथा उनसे सन्तान के स्वास्थ्य एवं आयु की प्रार्थना की जाती है।

उपनयन : जातक का नियमानुसार आठवें वर्ष में उपनयन संस्कार होना चाहिए। यह संस्कार बिना गंगाजी के आशीर्वाद के पूर्ण होता ही नहीं। उपनयन के साथ माँ गंगा का सानिध्य संस्कार के रूप में आजीवन लग जाता है। गुरु मंत्र प्राप्त करने के बाद प्रतिदिन बटुक को गंगा स्नान के बाद माँ को सन्ध्या वंदन के साथ गुरु मन्त्र सुनाना पड़ता है। कहा जाता है कि गलती होने पर माँ सुधार करती हैं।

इस क्रिया के करने से बदज़बान कभी नहीं निकलती। यदि गलती हो भी जाती है तो माँ की सीख याद आती है।

विवाह : उपनयन के बाद विवाह संस्कार में गंगाजी का सपत्नीक आशीर्वाद आवश्यक है। इस अवसर पर गंगा जी को एक बार फिर पियरी चढ़ाई जाती है।

अंत्येष्टि : जीवन भर के लेन देन और दुनियादारी से जब विदाई होती है तो सिर्फ़ गंगा की गोद, उनका किनारा, और उनका स्पर्श मिलता है। शेष सभी लोग तो जल्दी से जल्दी लाश समझकर त्यागने में लग जाते हैं। जातक की, पुत्र द्वारा मुखाग्नि पाने से अधिक की अभिलाषा अपने सभी बन्धु बांधवों से गंगा जल की अंजुलि की रहती है। जबतक गंगाजल के साथ तिलांजलि नहीं मिलती तब तक धरती का सारा तीर्थ व्रत व्यर्थ है।

इतना ही नहीं, हमारे संस्कारों में गंगा का इतना प्रभाव है कि सूर्यास्त के बाद गंगा पार करना वर्जित माना गया है। कहा जाता है कि रात में माँ शयन करती हैं। सोती हुई माँ का उल्लंघन करना अपराध है। इतना संवेदनशील संस्कार सिर्फ गंगा किनारे ही मिलता है। यही भाव मनुष्य को मुक्ति दिलाता है।

अब रोती-रूठती माँ गंगा :

गंगा और भारत की 48 करोड़ की जनसंख्या, जिनके जीवन पर माँ गंगा का कर्ज है। इस संस्कृति  को लेकर सैकड़ों ग्रंथ लिखे जा चुके हैं। उनपर
तमाम कार्यक्रम भी आ चुके हैं। आज संस्कृति की पहचान गंगा अपने अस्तित्व(प्रवाह) के लिए पूरे देश और तमाम पुत्रों से गुहार लगा रही हैं।

जिनकी गोद में प्रतिदिन अनगिनत को मोक्ष मिलता है। जिनकी एक एक बूंद में वैकुंठ, कैलाश और मुक्ति व्याप्त है, आज उनकी धारा अविरलता की कमी के संकट से जूझ रही है। गंगा के मध्य तक जमीनी वाहन चल रहे हैं। जीती जागती संस्कृति को आभासी रूप देने का फैशन चल रहा है।

गंगा को समाप्त करके उनका अभास कराने वाला म्यूजियम बनाने की ओर बढ़ा जा रहा है।

जिस प्रकार किसी व्यक्ति को जोर से पहले बांध दिया जाय, इतना कि उसका सांस लेना मुश्किल हो जाय, फिर उसकी नसों में कैंसर के कीड़े छोड़े जाएं, जब मर्ज बढ़ जाए तो इलाज की राह खोजी जाय। ठीक इसी प्रकार माँ गंगा के साथ हुआ है। पहले बांध बनाकर इनकी सांस बाधित की गई। फिर इनकी नसों में सीवर जोड़े गए। जब जल कैंसरयुक्त हो गया तो तमाम वैज्ञानिक उपाय होने लगे।

आज दुःखद यह है कि जिनके किनारे बैठकर जीवन की सांस मांगी जाती है। जो करोड़ो लोगों की मोक्ष की आस हैं, वो स्वयं मोक्ष की दिशा में जा रही हैं। यही हालत रहे तो हर ओर अतृप्ति और व्याकुलता का ही प्रवाह होगा। क्योंकि तृप्ति और संतुष्टि की महान प्रतीक माँ गंगा ने मुक्ति की ओर प्रयाण कर दिया है।

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