सादगी के महामानव का साक्षात दर्शन

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डॉ अब्दुल कलाम की पुण्यतिथि

-आई आई टी बीएचयू के दीक्षांत समारोह के मुख्य अतिथि बने थे कलाम साहब
-विशिष्ट कुर्सी को नकारते हुए अपनी सादगी से कराया था परिचय

बात एक बहुत छोटी प्रेरक कहानी से शुरू करते हैं। उसके बाद कहानी का निहितार्थ बताते हैं।

एक समय चंद्रगुप्त मौर्य के गुरू और प्रधानमंत्री आचार्य चाणक्य एक झोपड़ी में रहते थे। एक दिन एक मेहमान उनसे मिलने पहुंचा।

चाणक्य एक दिये की रोशनी में बैठे कुछ लिख रहे थे। मेहमान के पहुंचने पर उन्होंने वह दिया बुझा दिया और एक दूसरा दिया जलाकर मेहमान से बातचीत करने लगे।

हैरत में आए मेहमान ने थोड़ी देर बाद इसका कारण पूछा। चाणक्य ने बताया कि पहले वाले दिये में तेल सरकारी खर्चे में से डाला गया था। उसकी रोशनी में वे सरकारी काम कर रहे थे।

आगंतुक उनका निजी मेहमान था इसलिए उन्होंने दूसरा दिया जला लिया जिसमें उनके पैसे से लाया गया तेल डाला गया था।

अब बात करते हैं आज के समय की। बात 10 जुलाई 2013 की है। हम उस समय दैनिक जागरण अखबार के काम करते थे। मेडिकल, टेक्नोलॉजी, हायर एजुकेशन, मौसम और एयरपोर्ट मेरी बीट थी।

इस दिन बीएचयू के इतिहास में एक अध्याय और जुड़ा था। इस तारीख को आई आई टी बीएचयू का पहला दीक्षान्त समारोह हुआ था। इस दीक्षान्त समारोह के मुख्य अतिथि थे भारत के अभूतपूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न डॉ0 ए. पी.जे. अब्दुल कलाम।

डॉ कलाम के विचारों और उनकी बातों के बारे में अक्सर चर्चाएं होती हैं। उनपर लेख लिखे जाते हैं। आज की पीढ़ी के लिए डॉ कलाम एक मोटिवेशनल मेंटर हैं, इसमें कोई संशय नहीं है। इतना सबकुछ है लेकिन हम एक बात गर्व कह सकते हैं कि हमने डॉ कलाम से न सिर्फ मुलाकात की है बल्कि उनके साथ लगभग दो घण्टे बातचीत भी की। ये दिन मेरे करियर का मास्टरस्ट्रोक था।

1918 में स्थापित देश का पहला इंजीनियरिंग कॉलेज बनारस हिंदू इंजीनियरिंग कॉलेज (बेंको), जो बाद में आई टी और फिर आई आई टी बीएचयू बना। इस आई आई टी बीएचयू का पहले दीक्षान्त समारोह दुनिया भर के उच्च शिक्षा संस्थाओं के लिए बहुत बड़ा सन्देश दे रहा था। क्योंकि इसमें इंजीनियरिंग की डिग्री लेने वाले अत्याधुनिक भावी इंजीनियर धोती कुर्ता और साफा पहनकर डिग्री और मेडल ले रहे थे।

डॉ कलाम साहब खुद कुर्ता पायजामा और अपनी जानी पहचानी अचकन और साफा पहनकर आये थे। दीक्षान्त समारोह बीएचयू के स्वतंत्रता भवन में हो रहा था। जब ड्रम बीट पर आचार्यों की शिष्ट यात्रा दीक्षांत स्थल पर पहुंची तो सभागार में बैठे सभी लोग इस यात्रा को देखकर गौरव के साथ शांतिपूर्ण ढंग से खड़े हो गए। इस यात्रा का नेतृत्व स्वयं डॉ कलाम साहब कर रहे थे। हमारी मीडिया गैलरी मंच के दाईं ओर बनाई गई थी। जागरण के प्रतिनिधि होने के नाते हमें मीडिया गैलरी में सबसे आगे की सीट मिली थी।

डॉ कलाम शिष्ट यात्रा लेकर दीक्षान्त स्थल पहुंचते हैं। यहाँ उनसे बीएचयू के तत्कालीन कुलपति पद्म श्री डॉ लालजी सिंह और आई आई टी बीएचयू के निदेशक प्रो आर के संगल मंच पर बैठने का आग्रह करते हैं। कलाम साहब मंच पर पहुंचकर थोड़ा पीछे हट जाते हैं। कारण यह था कि मंच पर पाँच कुर्सियां लगी हुई थीं। कलाम साहब की कुर्सी अन्य चार से विशिष्ट थी। इस विशिष्टता को देखकर कलाम साहब अपनी मधुर वाणी में कहा कि आई एम नॉट अ प्रेसिडेंट राइट नाउ। सो मिस्टर वीसी यु शुड सिट इन दिस चेयर। आई एम जस्ट अ कॉमन मैन। लाइक दीज़ स्टूडेंट्स एंड प्रोफेसर्स।

ये सुनते ही वीसी और डायरेक्टर सकपका गए। उन्होंने तुरन्त वो कुर्सी हटवाई और सामान्य कुर्सी लग गयी। कार्यक्रम की शुरुआत में ही विराट मानव का नज़दीक से दर्शन मिला था हमें। यह देखकर मन विभोर हो रहा था और मन ही मन महामना मालवीय जी को धन्यवाद भी दे रहा था कि आज हम इसी परिसर से पढ़कर इसी परिसर के एक अभिन्न इतिहास के साक्षी हो रहे हैं।

कलाम साहब का दीक्षान्त भाषण लगभग 40 मिनट का रहा। उसके बाद वो सभागार से निकलकर स्वतंत्रता भवन के मीटिंग रूम में चले गए। उनके साथ वीसी और डायरेक्टर भी थे। हम उनका कुछ इंटरव्यू लेने की फिराक में थे। लेकिन एसपीजी घेरे के कारण जुगाड़ नहीं लग रहा था। अन्य वरिष्ठ पत्रकार अपने अपने ऑफिस के लिए निकल लिए। हम और जनसंदेश के अमित सिंह ही रह गए थे।

उसी समय हमें बीएचयू के चीफ प्रॉक्टर प्रो अरविंद जोशी जी दिख गए। वो उत्तराखंड के हैं। हमने कलाम साहब से मिलने के लिए यहाँ क्षेत्रवाद किया। प्रो जोशी से हमने उत्तराखंडी पहाड़ी ब्राह्मण का नाता जोड़ा और पहुंच गए वहाँ, जहाँ डॉ कलाम थे। प्रोफेसर जोशी ने सीधे कलाम साहब से हमारा परिचय कराया। फिर कलाम साहब ने खुलकर बात की। हमें तो टेक्नोलॉजी का टी भी नहीं मालूम था तो हमने उस क्षेत्र का प्रश्न ही नहीं किया उनसे।

हमने बस उसने उनकी इस सादगी के बारे में पूछा। और टेक्नोलॉजी के प्रति उनके अनुराग के बारे में प्रश्न किया। उन्होंने सहजता से बताया कि जो भी लक्सरी हमें मिली है या मिलती है, वो सब सरकारी है। ये सब सुविधाएँ हमें काम करने के लिए दी जाती है न कि उनका अनायास उवभोग करने के लिए। इसपर उन्होंने एक वाक्या सुनाया हमें।

उन्होंने बताया कि एक बार कलाम साहब के कुछ रिश्तेदार उनसे मिलने राष्ट्रपति भवन आए। कुल 50-60 लोग थे। स्टेशन से सब को राष्ट्रपति भवन लाया गया जहां उनका कुछ दिन ठहरने का कार्यक्रम था।

उनके आने-जाने और रहने-खाने का सारा खर्च कलाम साहब ने अपनी जेब से दिया। संबंधित अधिकारियों को साफ निर्देश था कि इन मेहमानों के लिए राष्ट्रपति भवन की कारें इस्तेमाल नहीं की जाएंगी।

यह भी कि रिश्तेदारों के राष्ट्रपति भवन में रहने और खाने-पीने के सारे खर्च का ब्यौरा अलग से रखा जाएगा और इसका भुगतान राष्ट्रपति के नहीं बल्कि डॉ कलाम के निजी खाते से होगा।

एक हफ्ते में इन रिश्तेदारों पर हुआ तीन लाख चौवन हजार नौ सौ चौबीस रुपये का कुल खर्च देश के राष्ट्रपति डॉ अब्दुल कलाम साहब ने अपनी जेब से भरा था।

यहां हमने कलाम साहब के साथ लगभग 20 मिनट बात की। इसी समय प्रख्यात हाइड्रोजन वैज्ञानिक प्रोफेसर ओ. एन. श्रीवास्तव जी पहुँच गए। उन्होंने कलाम साहब को अपने हाइड्रोजन प्रोजेक्ट के बारे में बताया। और उन्होंने कलाम साहब से हाइड्रोजन से चलने वाली कार को देखने का अनुरोध किया। कलाम साहब इतना सुनकर प्रोफेसर साहब से हँसते हुए कहा कि क्या केवल देखने के लिए कार है या चलती भी है। प्रोफेसर श्रीवास्तव ने कहा कि ये चलती भी है। तो फिर क्या था। कलाम साहब उठे और चल पड़े हाइड्रोजन से चलने वाली नैनो कार की सवारी करने।

उनके पीछे हम भी चले। वो कार में बैठने वाले थे, तभी फिर उनकी नज़र हमारी ओर पड़ी। उन्होंने हमसे पूछा कि मीडिया माचोमैन, डु यु आल्सो लाइक टू गो..?

हमको तो मुँह माँगी मुराद मिल गयी थी। हम तुरन्त उनके साथ नैनो में बैठ गए। नैनो को प्रोफेसर श्रीवास्तव खुद चला रहे थे। उनके बगल में कलाम साहब, पीछे हम और प्रो अरविंद जोशी।

कलाम साहब का अचानक लिया हुआ ये निर्णय एसपीजी के हाथ पाँव को फुला दिया। आनन फानन में एसएसपी अजय मिश्रा और डीएम प्रांजल यादव ने खुद उनकी सुरक्षा को पुख्ता किया। सात स्तरीय सुरक्षा घेरा बनाया गया। एसपीजी की नौ गाडियाँ नैनो को घेरकर चलने लगीं।

हमलोग स्वतंत्रता भवन से लक्ष्मण दास अतिथिगृह तक आये। इस बीच हमने कलाम साहब से कुछ पूछा नहीं। बस दो बड़े वैज्ञानिकों की बात सुनी और जमकर एक्सक्लुसिव खबर निकाली।

उसदिन हमने कलाम साहब से मिलने के लिए दो पाप किये। एक क्षेत्रवाद का सहारा लिया और दूसरा हमारे हर कदम पर साथ खड़े मित्र अमित सिंह को नैनो में बैठते हुए अनदेखा कर दिया। अगर उसको देखता तो यह अनुपम सवारी न मिल पाती। हालाँकि हमने कलाम साहब की एक्सक्लुसिव खबरों में से कुछ खबरें प्रायश्चित स्वरूप उसको भी दे दी थीं। हमारा सम्बन्ध कभी नहीं बिगड़ा। आज कलाम साहब दुनिया में नहीं हैं। उनकी सादगी को लोगों ने या सुना होगा या टीवी अथवा अखबारों में देखा-पढा होगा। लेकिन हमने तो उनके साथ साथ उनकी सादगी को घण्टों जिया है।

आज कलाम साहब नहीं हैं। फिर भी वे सवा अरब देशवासियों के साथ प्रेरणा के रूप में हैं। मेरे लिए तो जीवन का ये दो घण्टा सादगी के इस अवतार का दर्शन था। आज भी वो मंज़र सोचकर मन अभिभूत हो गया।

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