
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में मिली करारी हार के बाद पूर्व मंत्री और वीआईपी (विकासशील इंसान पार्टी) के अध्यक्ष मुकेश सहनी ने राजनीतिक माहौल में नया ताप ला दिया है। सहनी की पार्टी इस चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत सकी, जिसके बाद उन्होंने सत्तारूढ़ गठबंधन एनडीए पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि “बिहार में 10,000 रुपये में सरकार खरीदी जा सकती है।” उनके इस बयान ने राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है और इसे विपक्ष द्वारा बड़े मुद्दे के रूप में उछाला जा रहा है।
हार के बाद भड़के सहनी, कहा— पैसा चला, लोकतंत्र नहीं
चुनाव नतीजों के बाद मीडिया से बातचीत में सहनी ने कहा कि जनता वोट डालती है, लेकिन बाद में खरीद-फरोख्त और पैसे की ताकत से सरकारें बनाई जाती हैं। उन्होंने दावा किया कि उनके कई संभावित उम्मीदवारों को पैसे का लालच देकर चुनाव से दूर रहने या कमजोर प्रचार करने के लिए मजबूर किया गया। सहनी के अनुसार इस चुनाव में “लोकतंत्र की जगह धनतंत्र हावी रहा।”
उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष ने प्रशासनिक दबाव और पैसों के सहारे कई सीटों पर माहौल बदल दिया, जिससे विपक्षी दलों को सही मौका नहीं मिला। सहनी ने इसे बिहार के राजनीतिक इतिहास का “सबसे शर्मनाक चरण” बताया।
VIP का चुनाव प्रदर्शन: 0 सीटें, लेकिन वोट बैंक बरकरार
वीआईपी के लिए यह चुनाव बेहद निराशाजनक रहा। पिछली बार की तुलना में इस बार पार्टी कोई सीट नहीं जीत पाई। हालांकि कई सीटों पर उसका वोट प्रतिशत प्रतीकात्मक रूप से मौजूद रहा, लेकिन जीत के लिहाज से पार्टी कहीं नहीं टिक सकी।
विशेष रूप से मल्लाह और निषाद समुदाय के वोटों को मजबूत पकड़ मानने वाले मुकेश सहनी के लिए यह चुनाव एक कड़ा झटका है। 2020 में जहां उन्होंने बड़ा प्रभाव दिखाया था, वहीं इस बार उनकी पकड़ कमजोर दिखी।
NDA पर तीखे वार – ‘जनता का नहीं, पैसों का जनादेश है’
सहनी ने कहा कि बिहार की जनता बदलाव चाहती थी, लेकिन परिणाम इस भावना को प्रतिबिंबित नहीं करते। उन्होंने दावा किया कि “कुछ सीटों पर 10,000 रुपये में पूरा खेल पलट दिया गया,” जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित हुई।
हालांकि सहनी ने कोई प्रत्यक्ष सबूत पेश नहीं किया, लेकिन उनके आरोपों ने राजनीतिक बहस छेड़ दी। विपक्षी दलों ने इसे तुरंत मुद्दा बनाकर कहा है कि बिहार में चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की जरूरत है।
NDA की प्रतिक्रिया— ‘हार की खीझ मत निकालिए’
एनडीए नेताओं ने सहनी के आरोपों को सिरे से खारिज किया। सत्ता पक्ष ने कहा कि मुकेश सहनी की पार्टी जनता के बीच स्वीकार्यता खो चुकी है, इसलिए उसके लिए किसी और को दोष देना आसान है। भाजपा और जेडीयू के नेताओं ने कहा कि सहनी का बयान हार की निराशा का परिणाम है, न कि किसी तथ्य पर आधारित आरोप।
कुछ नेताओं ने कटाक्ष करते हुए कहा कि राजनीति में सिर्फ बयानबाजी से भरोसा नहीं बनता, जनता काम देखती है। इसलिए जनता ने फैसला दिया और अब किसी को इसे “पैसे का खेल” बताना लोकतंत्र का अपमान है।
VIP का भविष्य— क्या फिर से बनेगी राजनीतिक जमीन?
चुनाव हारने के बावजूद मुकेश सहनी ने कहा कि वे संघर्ष जारी रखेंगे। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अगर आवश्यक हुआ तो पार्टी संगठन में बड़े बदलाव भी किए जाएंगे। सहनी ने दावा किया कि जिन मुद्दों पर वे बोलते हैं— जैसे पिछड़ी जातियों की समृद्धि, fishermen community का अधिकार, और युवाओं को रोजगार— वे अभी भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि सहनी का बयान उनकी राजनीति को जीवित रखने की कोशिश है। उनकी पार्टी भले ही चुनाव में फेल रही, लेकिन राजनीति में ऐसे बयान अक्सर चर्चा पैदा कर देते हैं, जो आगे चलकर पार्टी को नया स्पेस दे सकते हैं।
बिहार की राजनीति में जातिगत समीकरण हमेशा अहम रहे हैं— और इस लिहाज से सहनी की भूमिका अब भी खत्म नहीं हुई है। आने वाले महीनों में वे किस रणनीति के साथ आगे बढ़ते हैं, यह बिहार की राजनीति में दिलचस्प मोड़ ला सकता है।