
बॉलीवुड की चमक-दमक कई बार जिंदगी का रुख बदल देती है—कभी सफलता देती है, तो कभी किसी को पूरी तरह नई दिशा में धकेल देती है। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। बहुत कम लोग जानते हैं कि आज न्यू जनरेटिव नेता के रूप में चर्चित चिराग पासवान ने एक समय फिल्म इंडस्ट्री में करियर बनाने की भरपूर कोशिश की थी। उन्होंने कंगना रनौत के साथ एक फिल्म में अभिनय किया, लेकिन वह बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप हो गई। हालांकि, इसी असफलता ने उनकी जिंदगी को राजनीति की तरफ मोड़ दिया और यह मोड़ उनके जीवन का सबसे निर्णायक साबित हुआ।
बॉलीवुड में एक नई शुरुआत, लेकिन सफर छोटा रहा
चिराग पासवान ने 2011 में फिल्म “मिले ना मिले हम” से बॉलीवुड में एंट्री की थी। फिल्म में उनकी को-स्टार कंगना रनौत थीं, जो तब तक इंडस्ट्री में अपना स्थान बना चुकी थीं। पासवान के लिए यह एक बड़ी शुरुआत हो सकती थी, लेकिन फिल्म दर्शकों का दिल नहीं जीत पाई। समीक्षकों ने फिल्म को फीका बताया और चिराग के अभिनय की भी खास सराहना नहीं हुई।
फिल्म की नाकामी इतनी बड़ी थी कि बॉलीवुड में उनका सफर शुरुआत में ही खत्म हो गया। उनके लिए यह एक झटका जरूर था, लेकिन उन्होंने इसे मंज़िल का अंत नहीं बल्कि नई राह की शुरुआत माना।
पिता रामविलास पासवान ने संभाली कमान— राजनीति की राह हुई साफ
फिल्म के फ्लॉप होने के बाद चिराग का ध्यान धीरे-धीरे राजनीति की तरफ गया। उनके पिता, दिग्गज नेता रामविलास पासवान, उस समय भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक थे। उन्हें उम्मीद थी कि चिराग राजनीति में उनकी विरासत को आगे बढ़ाएंगे।
बॉलीवुड में मिली असफलता ने चिराग को सोचने पर मजबूर किया कि उनका असली स्थान राजनीति में है। पिता ने भी उनका पूरा समर्थन किया और 2014 में चिराग ने पहली बार चुनावी मैदान में कदम रखा।
पहला चुनाव— राजनीति में शानदार एंट्री
2014 लोकसभा चुनाव में चिराग पासवान ने पहली बार जमुई सीट से चुनाव लड़ा और बड़ी जीत दर्ज की। यह उनके राजनीतिक सफर की मजबूत शुरुआत थी। उस जीत ने यह साबित कर दिया कि चिराग सिर्फ ‘स्टार किड’ नहीं, बल्कि जनता के बीच अपनी पहचान बनाने में सक्षम हैं।
इसके बाद वे लगातार राजनीति में सक्रिय रहे और अपनी बातों को युवाओं के बीच मजबूती से रखते रहे। उनकी साफ-सुथरी छवि, स्पष्टवादी रवैया और सोशल मीडिया पर प्रभावी उपस्थिति ने उन्हें यंग लीडरशिप का चेहरा बना दिया।
पार्टी नेतृत्व और युवा राजनीति का उभरता चेहरा
अपने पिता की विरासत को संभालते हुए चिराग आगे बढ़ते रहे। जब रामविलास पासवान का निधन हुआ, चिराग पूरी तरह लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) की कमान संभालने लगे। पार्टी में कई टूट-फूट का दौर भी आया, लेकिन उन्होंने अपनी राजनीतिक चालें और गठबंधन रणनीतियों से खुद को प्रासंगिक बनाए रखा।
कई मौकों पर उन्होंने सरकार की नीतियों का समर्थन किया, तो कई बार अपनी ही गठबंधन पार्टियों पर सवाल भी उठाए। इससे उनकी छवि एक स्वतंत्र सोच वाले नेता की बनी।
आज केंद्र में मंत्री— नाकामी ही बनी सफलता की वजह
आज चिराग पासवान केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री हैं। उनकी राजनीतिक यात्रा बताती है कि कैसे एक नाकाम फिल्म करियर ने उन्हें एक बड़ी राजनीतिक पहचान दिलाई। कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अगर उनकी पहली फिल्म सफल हो जाती, तो शायद वे बॉलीवुड में ही अपना करियर बनाते रहते और भारतीय राजनीति एक युवा, ऊर्जावान नेता से वंचित रह जाती।
चिराग की सफलता का असली सार— बदलाव को स्वीकारना
चिराग पासवान की कहानी बताती है कि जिंदगी में असफलताएं अंत नहीं होतीं। कभी-कभी वही असफलताएं हमें उस रास्ते की ओर ले जाती हैं, जहां हमारी असली क्षमता छिपी होती है। बॉलीवुड के एक फ्लॉप अनुभव ने ही उन्हें वह पहचान दिलाई, जिसने आज उन्हें देश की राजनीति में एक मजबूती से खड़ा किया है।