दिल्ली की जहरीली हवा का सच: पराली नहीं, स्थानीय प्रदूषण बना बड़ा अपराधी – CSE रिपोर्ट में खुलासा

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दिल्ली की हवा हर सर्दियों में जहरीली हो जाती है, और पारंपरिक रूप से हर बार इसका दोष किसानों द्वारा जलाए जाने वाली पराली पर डाल दिया जाता है। लेकिन सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की नई रिपोर्ट ने इस बार एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। इस अध्ययन में बताया गया है कि दिल्ली की रोजाना बिगड़ती हवा के लिए पराली मुख्य कारण नहीं है, बल्कि राजधानी के अंदर ही मौजूद कई स्थानीय स्रोत असली गुनहगार हैं। रिपोर्ट का कहना है कि प्रदूषण के उछाल में सबसे ज्यादा भूमिका सड़कों की धूल, भारी ट्रैफिक, औद्योगिक गतिविधियों और स्थानीय निर्माण कार्यों की है, न कि केवल पराली जलाने की।

यह खुलासा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कई वर्षों से पराली को ही दिल्ली की खराब हवा के लिए सबसे बड़ा आरोपी माना जाता रहा है। कई राजनीतिक बहसों और सरकारी रिपोर्टों में भी यही मुद्दा सामने लाया गया था कि पंजाब-हरियाणा की पराली दिल्ली की हवा को दम घोंट रही है। लेकिन CSE की रिपोर्ट इस विचार को चुनौती देती है और यह बताती है कि दिल्ली के स्थानीय प्रदूषण की हिस्सेदारी अपेक्षा से कहीं ज्यादा है।

रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली के वायु प्रदूषण की दैनिक वृद्धि में स्थानीय कारणों की हिस्सेदारी अक्सर 60 से 80 फीसदी तक पहुंच जाती है, जबकि पराली जलाने से आने वाले धुएं का प्रभाव केवल कुछ दिनों के लिए दिखाई देता है और उसका योगदान सीमित रहता है। खासतौर पर जब हवा की दिशा बदलती है या मौसम स्थिर हो जाता है, तब स्थानीय प्रदूषण का स्तर और भी बढ़ जाता है।

दिल्ली के कई हिस्सों में की गई ग्राउंड स्टडी में यह पाया गया कि सुबह और शाम के समय ट्रैफिक की संख्या बढ़ने से PM2.5 और PM10 के स्तर में अचानक उछाल आता है। जैसे ही गाड़ियां सड़क पर बढ़ती हैं, हवा में प्रदूषक कणों की मात्रा तेजी से बढ़ जाती है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि राजधानी की सड़कों पर जमा धूल, निर्माण स्थलों से उड़ता मलबा और औद्योगिक प्रदूषण लगातार हवा को अधिक जहरीला बना रहे हैं। धूल को नियंत्रित करने के लिए किए जाने वाले उपायों की कमी रिपोर्ट में खासतौर पर उजागर की गई है।

CSE ने यह भी बताया कि दिल्ली में मौजूद 35 से ज्यादा हाई-डस्ट स्पॉट ऐसे हैं, जहाँ धूल और मलबा सामान्य स्तर से कहीं अधिक पाया गया। ये स्थान मुख्य रूप से बड़ी सड़कों, निर्माण स्थलों और औद्योगिक क्षेत्रों के आसपास हैं। यहां पर रूटीन सफाई, वॉटर स्प्रिंकलिंग और कवरिंग जैसे उपाय बेहद कमजोर पाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, अगर इन प्रमुख धूल स्रोतों पर उचित नियंत्रण किया जाए, तो दिल्ली की हवा में बड़ा सुधार देखा जा सकता है।

परिवहन क्षेत्र भी प्रदूषण के बड़े स्तंभों में से एक है। दिल्ली में वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और लगभग हर व्यक्ति के पास निजी वाहन होने से सड़कें हमेशा खचाखच भरी रहती हैं। पेट्रोल और डीजल वाहनों से निकलने वाली गैसें सीधे PM2.5 के स्तर को बढ़ाती हैं। खासकर पुराने वाहनों, ऑटो-रिक्शा, बसों और भारी ट्रकों से निकलने वाला धुआँ हवा की गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित करता है।

CSE की रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि प्रदूषण का मसला केवल बाहरी स्रोतों पर दोष डालकर हल नहीं होगा। दिल्ली को अपनी खुद की प्रदूषण समस्या स्वीकार करनी होगी और उस पर कड़े कदम उठाने होंगे। रिपोर्ट कहती है कि पराली का प्रभाव मौसमी है और कुछ सप्ताह तक रहता है, लेकिन दिल्ली के स्थानीय प्रदूषण स्रोत साल भर हवा को खराब करते रहते हैं। इसलिए हवा की गुणवत्ता को बेहतर करना हो तो शहर के भीतर मौजूद प्रदूषण का सटीक विश्लेषण और प्रभावी नियंत्रण बेहद जरूरी है।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि पिछले कुछ वर्षों में पराली के जलने की घटनाएं कम हुई हैं, और पंजाब-हरियाणा में किसानों को मशीनों, सब्सिडी और जागरूकता कार्यक्रमों का लाभ मिला है। इसके बावजूद, दिल्ली में प्रदूषण का ग्राफ लगातार ऊंचा क्यों है? इसका जवाब रिपोर्ट स्थानीय स्रोतों में ढूंढती है।

दिल्ली में घरेलू प्रदूषण, जैसे – कूड़ा जलाना, पुराने हीटर और चूल्हों का इस्तेमाल, भी हवा को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। राजधानी के बाहरी इलाकों में कई छोटे उद्योग हैं जो रात में अवैध रूप से प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियां चलाते हैं। अक्सर ये धुआँ पकड़ में नहीं आता लेकिन यह हवा की गुणवत्ता को quietly बर्बाद करता रहता है।

इसके अलावा, मौसम की स्थिति भी बड़ा कारक बन जाती है। सर्दियों में तापमान कम होते ही हवा भारी हो जाती है, और प्रदूषक जमीन के पास जमने लगते हैं। हवा की गति धीमी होने से प्रदूषण निकल नहीं पाता और AQI खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता है। लेकिन CSE का कहना है कि यदि स्थानीय प्रदूषण स्रोतों को प्रभावी तरीके से नियंत्रित कर लिया जाए, तो मौसम का असर भी उतना गंभीर नहीं होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को अब ध्यान केंद्रित करना होगा—

  • सड़कों की नियमित सफाई और धूल कम करने पर

  • निर्माण स्थलों पर सख्त निगरानी पर

  • पुराने वाहनों को बंद करने या हटाने पर

  • सार्वजनिक परिवहन को मजबूत बनाने पर

  • औद्योगिक क्षेत्रों में प्रदूषण मापने और रोकने के अधिक आधुनिक सिस्टम पर

CSE ने यह भी सुझाव दिया है कि दिल्ली को अपनी प्रदूषण नियंत्रण नीति में समग्र परिवर्तन करने की आवश्यकता है। केवल दीर्घकालिक योजनाएं बनाना ही काफी नहीं, बल्कि उनके क्रियान्वयन पर गंभीरता से काम करना भी जरूरी है।

यह रिपोर्ट एक स्पष्ट संदेश देती है:
दिल्ली की जहरीली हवा को सुधारने के लिए बाहर झांकने से पहले शहर को अपने भीतर की समस्याओं से मुकाबला करना होगा। पराली का मुद्दा बड़ा है, लेकिन असली अपराधी हमारे आस-पास मौजूद वे कारक हैं जिन्हें हम रोज देखते हैं, लेकिन नजरअंदाज कर देते हैं।

 

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