भारत-अफगान दोस्ती पर भड़का पाकिस्तान, तालिबान मंत्री मुत्तकी ने दिया करारा जवाब

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अफगानिस्तान और भारत के रिश्ते लंबे समय से स्थिर और दोस्ताना रहे हैं। लेकिन हाल के दिनों में जैसे-जैसे दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ा है, पाकिस्तान की बेचैनी भी साफ दिखाई देने लगी है। भारत-अफगानिस्तान संबंधों पर पाकिस्तान ने हाल में आलोचनात्मक बयान दिया, जिसके बाद तालिबान सरकार के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी ने बेहद तीखा और स्पष्ट जवाब देते हुए पाकिस्तान की बोलती बंद कर दी। उनका कहना था कि अफगानिस्तान का भारत के साथ संबंध पूरी तरह स्वतंत्र और संप्रभु फैसलों पर आधारित हैं, और किसी तीसरे देश को इसमें दखल देने का हक नहीं।


🔹 पाकिस्तान की आलोचना पर अफगानिस्तान का पलटवार

कुछ दिनों पहले पाकिस्तान की ओर से बयान आया था कि भारत और तालिबान के बीच बढ़ती नजदीकियाँ दक्षिण एशिया के लिए “चिंताजनक” हैं। पाकिस्तान ने यह भी दावा किया कि भारत अफगानिस्तान में अपनी रणनीतिक मौजूदगी फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

इस बयान के बाद तालिबान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी ने कहा कि—

  • अफगानिस्तान अपने विदेशी संबंध दबाव में नहीं बनाता

  • किसी देश की आलोचना उनकी नीति पर प्रभाव नहीं डाल सकती

  • भारत के साथ संबंध ऐतिहासिक, विकासात्मक और लोगों के हित में हैं

मुत्तकी ने साफ कहा कि पाकिस्तान का काम नहीं है कि वह तय करे कि अफगानिस्तान किस देश से किस तरह का रिश्ता रखे। उनके इस बयान ने पाकिस्तान को सीधी चुनौती दी और यह संदेश दिया कि तालिबान सरकार अपने राजनयिक फैसलों में स्वतंत्र है।


🔹 भारत-अफगान संबंध क्यों हैं मजबूत?

भारत अफगानिस्तान के लिए दशकों से एक प्रमुख विकास साझेदार रहा है। तालिबान शासन से पहले, भारत ने अफगानिस्तान में:

  • सड़कें, बांध और अस्पताल बनाए

  • शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में निवेश किया

  • अफगान छात्रों को बड़ी संख्या में स्कॉलरशिप दी

  • संसद भवन से लेकर सलमा डैम जैसे प्रोजेक्ट पूरे किए

यह योगदान अफगान जनता के बीच भारत की सकारात्मक छवि बनाता है। तालिबान सरकार आने के बाद भी भारत का मानवीय सहायता कार्यक्रम जारी रहा है, जिसमें गेहूं, दवाइयां और अन्य आवश्यक वस्तुएं भेजी गईं।

तालिबान सरकार इस सहयोग को अफगानिस्तान के लिए जरूरी मानती है और इसलिए भारत के साथ संवाद को महत्वपूर्ण मानती है।


🔹 पाकिस्तान क्यों है असहज?

भारत और अफगानिस्तान के रिश्ते हमेशा से पाकिस्तान के लिए चिंता का विषय रहे हैं। इसके पीछे कई कारण हैं:

  1. रणनीतिक संतुलन में बदलाव — अफगानिस्तान में भारत का प्रभाव बढ़ना पाकिस्तान को कमजोर पड़ने का एहसास कराता है।

  2. दोहरे रिश्तों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि — अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच डूरंड लाइन को लेकर विवाद रहा है।

  3. आंतरिक सुरक्षा का डर — पाकिस्तान को आशंका रहती है कि अफगानिस्तान में भारत की मौजूदगी उसके पश्चिमी हिस्सों में अस्थिरता ला सकती है।

  4. तालिबान के साथ दूरियां — पाकिस्तान ने वर्षों तक तालिबान को समर्थन दिया था, लेकिन तालिबान के सत्ता में आने के बाद संबंध वैसे नहीं रहे जैसा पाकिस्तान सोचता था।

भारत और अफगानिस्तान की नजदीकियाँ पाकिस्तान की कूटनीति के असर को कमजोर करती हैं। इसलिए पाकिस्तान इस रिश्ते पर लगातार निगेटिव टिप्पणी करता रहा है।


🔹 मुत्तकी का बयान—साफ संदेश

मुत्तकी ने अपने बयान में तीन मुख्य बातें रखीं:

  • अफगानिस्तान किसी भी देश के दबाव में आकर अपनी विदेश नीति तय नहीं करेगा

  • भारत के साथ रिश्ते दोनों देशों के हित में हैं

  • क्षेत्रीय शांति के लिए अफगानिस्तान अपने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करना चाहता है

उनके इस बयान का असल मतलब था कि तालिबान सरकार पाकिस्तान के इशारों पर नहीं चलने वाली है।
यह तालिबान के लिए एक तरह से स्वायत्त विदेश नीति दिखाने का अवसर भी था।


🔹 भारत की भूमिका और कूटनीतिक हाजिरी

भारत तालिबान सरकार को आधिकारिक मान्यता नहीं देता, लेकिन उसने अपने राजनयिक चैनल खुले रखे हैं। दो देशों के बीच संवाद का मुख्य आधार:

  • व्यापार

  • मानवीय सहायता

  • सुरक्षा मामलों पर बातचीत

  • अवसंरचना की जरूरतें

भारत की यह संतुलित नीति अफगानिस्तान में उसकी सकारात्मक भूमिका बनाए रखने में मददगार है।


🔹 अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था को भारत से फायदा

तालिबान शासन के बाद अफगानिस्तान आर्थिक संकट से जूझ रहा है। ऐसे में भारत:

  • फूड सपोर्ट

  • मेडिसिन सप्लाई

  • एयर ट्रेड

  • शैक्षिक सहायता

जैसी मदद लगातार जारी रखता है।
अफगानिस्तान इस समय ऐसी किसी भी देश से सहयोग चाहता है जो बिना शर्त मदद करे, और भारत इसमें हमेशा आगे रहा है।


🔹 भविष्य में क्या होगा?

विशेषज्ञों का मानना है कि—

  • भारत अफगानिस्तान में अपना प्रभाव बढ़ाता रहेगा

  • तालिबान भारत के साथ विकास परियोजनाओं को और मजबूत कर सकता है

  • पाकिस्तान की असहजता भविष्य में भी बनी रहेगी

  • अफगानिस्तान की विदेश नीति अब अधिक स्वतंत्र हो सकती है

अगर भारत और तालिबान आपसी विश्वास बनाते हैं, तो आने वाले वर्षों में दोनों देशों के बीच सहयोग का दायरा और भी बढ़ सकता है।


🔹 निष्कर्ष: पाकिस्तान की चिंता, अफगानिस्तान की स्पष्टता

पाकिस्तान चाहता है कि अफगानिस्तान उसके रडार में रहे, लेकिन तालिबान सरकार अब इस छत्रछाया से बाहर निकलती दिख रही है।
भारत के साथ मजबूत होते संबंध इस बात का संकेत हैं कि:

अफगानिस्तान अपनी विदेश नीति खुद तय करेगा, और पाकिस्तान की आलोचना इस दिशा में अब ज्यादा असरदार नहीं रही।

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