“50 लाख बच्चों ने 5वीं तक सेब तक नहीं देखा होगा” – देश की पोषण व्यवस्था पर धर्मेंद्र प्रधान के तीखे सवाल

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देश के बच्चों की सेहत और पोषण व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस छिड़ गई है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भोपाल में आयोजित एक शैक्षणिक कार्यक्रम के दौरान ऐसा बयान दिया, जिसने नीतियों की जमीनी हकीकत पर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए। उन्होंने कहा कि संभव है देश में ऐसे करीब 50 लाख बच्चे हों, जिन्होंने पांचवीं कक्षा तक सेब जैसा साधारण फल भी कभी नहीं देखा होगा। यह बयान न केवल शिक्षा व्यवस्था बल्कि देश की पोषण नीतियों की मौजूदा स्थिति को लेकर एक गंभीर चेतावनी माना जा रहा है।

बच्चों की थाली और जमीनी हकीकत

धर्मेंद्र प्रधान ने अपने संबोधन में कहा कि हम भले ही बड़े-बड़े विकास के दावे करें, नई शिक्षा नीति लागू करें और डिजिटल भारत की बातें करें, लेकिन अगर हमारे बच्चे बुनियादी पोषण से वंचित हैं, तो यह पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करता है। उन्होंने कहा कि देश के कई ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में आज भी बच्चे दूध, फल और पौष्टिक आहार से कोसों दूर हैं।

उनका कहना था कि जिन बच्चों को बचपन में सही पोषण नहीं मिलता, उनका शारीरिक और मानसिक विकास दोनों ही प्रभावित होता है। ऐसे बच्चे आगे चलकर पढ़ाई, खेल और जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी पिछड़ जाते हैं।

सेब सिर्फ एक फल नहीं, एक प्रतीक है

धर्मेंद्र प्रधान ने अपने बयान में सेब का उदाहरण देते हुए कहा कि सेब सिर्फ एक फल नहीं, बल्कि यह उस पोषण असमानता का प्रतीक है, जो देश के अलग-अलग हिस्सों में बच्चों के बीच मौजूद है। उन्होंने कहा कि बड़े शहरों में बच्चे रोज फ्रूट जूस, ड्राय फ्रूट्स और हेल्दी डाइट लेते हैं, जबकि कई इलाकों में बच्चों को पेट भर दाल-चावल भी नियमित रूप से नसीब नहीं होता।

उन्होंने इसे सामाजिक और नीतिगत विफलता बताया और कहा कि इस असमानता को खत्म करना सरकार, समाज और शिक्षा व्यवस्था — तीनों की साझा जिम्मेदारी है।

शिक्षा और पोषण का गहरा संबंध

केंद्रीय मंत्री ने इस बात पर भी जोर दिया कि शिक्षा और पोषण एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि भूखे पेट पढ़ने वाला बच्चा कभी भी बेहतर प्रदर्शन नहीं कर सकता। अगर किसी छात्र को सही भोजन नहीं मिलेगा, तो उसकी सीखने की क्षमता, एकाग्रता और आत्मविश्वास पर सीधा असर पड़ेगा।

उन्होंने यह भी कहा कि सरकार भले ही नई शिक्षा नीति, डिजिटल क्लासरूम और स्मार्ट बोर्ड जैसी योजनाएं लागू कर रही हो, लेकिन अगर बच्चों की बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं होंगी, तो ये सारी योजनाएं अधूरी रह जाएंगी।

मिड-डे मील और पोषण योजनाओं पर भी सवाल

धर्मेंद्र प्रधान के बयान के बाद मिड-डे मील योजना और अन्य पोषण कार्यक्रमों की प्रभावशीलता को लेकर भी बहस तेज हो गई है। उन्होंने इशारों-इशारों में कहा कि कागजों में योजनाएं चाहे जितनी भी सफल दिखें, लेकिन जमीनी स्तर पर अभी भी कई कमजोरियां हैं।

कई क्षेत्रों में भोजन की गुणवत्ता, नियमित आपूर्ति और पोषण मूल्य को लेकर गंभीर शिकायतें आती रही हैं। कई जगह बच्चों को मन मुताबिक पोषक आहार नहीं मिल पाता। कहीं दूध नहीं पहुंचता, तो कहीं फल सिर्फ नाम के लिए दिए जाते हैं।

ग्रामीण और आदिवासी इलाकों की स्थिति ज्यादा गंभीर

धर्मेंद्र प्रधान ने खास तौर पर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों का जिक्र करते हुए कहा कि वहां बच्चों की पोषण स्थिति शहरों के मुकाबले कहीं ज्यादा खराब है। उन्होंने कहा कि इन इलाकों में कई परिवार आज भी गरीबी, कुपोषण और बेरोजगारी से जूझ रहे हैं।

इन परिस्थितियों में बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य दोनों प्रभावित होते हैं। कई बच्चे कम उम्र में ही एनीमिया, कमजोरी और अन्य गंभीर बीमारियों का शिकार हो जाते हैं।

समाज की भी है बड़ी जिम्मेदारी

केंद्रीय मंत्री ने यह भी साफ किया कि सिर्फ सरकार को दोष देना सही नहीं है। समाज, स्कूल प्रबंधन, शिक्षक और अभिभावकों की भी इसमें बड़ी भूमिका है। उन्होंने कहा कि जब तक समाज खुद इस समस्या को गंभीरता से नहीं लेगा, तब तक बदलाव संभव नहीं है।

उन्होंने स्कूलों से अपील की कि वे बच्चों को सिर्फ पढ़ाई ही नहीं, बल्कि पोषण, स्वच्छता और स्वास्थ्य के प्रति भी जागरूक करें। बच्चों में फल, दूध और संतुलित आहार की अहमियत बताई जाए।

भविष्य की पीढ़ी पर मंडराता खतरा

धर्मेंद्र प्रधान ने अपने संबोधन में चेतावनी देते हुए कहा कि अगर आज के बच्चों को सही पोषण नहीं मिला, तो आने वाली पीढ़ी शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर हो सकती है। इसका सीधा असर देश की उत्पादकता, अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना पर पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि स्वस्थ बच्चा ही मजबूत राष्ट्र की नींव बनता है। अगर नींव कमजोर होगी, तो इमारत कितनी भी सुंदर क्यों न हो, ज्यादा देर तक टिक नहीं पाएगी।

नीतियों की जरूरत है नए सिरे से समीक्षा की

इस पूरे बयान के जरिए धर्मेंद्र प्रधान ने यह संकेत भी दिया कि अब पोषण और शिक्षा से जुड़ी नीतियों की नए सिरे से समीक्षा की जरूरत है। यह देखने की आवश्यकता है कि योजनाएं कागजों तक ही सीमित तो नहीं रह गईं।

उन्होंने कहा कि तकनीक, बजट और संसाधनों के साथ-साथ अब संवेदनशीलता और ईमानदार कार्यान्वयन की भी जरूरत है।

राजनीतिक हलकों में बयान की गूंज

धर्मेंद्र प्रधान के इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में भी प्रतिक्रिया तेज हो गई है। कई विपक्षी नेताओं ने इसे सरकार की नाकामी बताते हुए सवाल उठाए, वहीं कुछ नेताओं ने इसे ईमानदार आत्ममंथन करार दिया।

हालांकि मंत्री के समर्थकों का कहना है कि उन्होंने कोई आरोप नहीं, बल्कि एक कड़वी सच्चाई सामने रखी है, जिसे स्वीकार करके ही आगे बढ़ा जा सकता है।

कुपोषण अब भी भारत की बड़ी चुनौती

भारत जैसे विशाल देश में कुपोषण आज भी एक बड़ी राष्ट्रीय चुनौती बना हुआ है। कई रिपोर्ट्स पहले भी यह संकेत दे चुकी हैं कि बड़ी संख्या में बच्चे कम वजन, एनीमिया और विकास में पिछड़ेपन की समस्या से जूझ रहे हैं।

धर्मेंद्र प्रधान का बयान इसी कड़वी हकीकत की ओर फिर से ध्यान खींचता है।

निष्कर्ष

धर्मेंद्र प्रधान का यह कहना कि “50 लाख बच्चों ने 5वीं तक सेब नहीं देखा होगा” सिर्फ एक भावनात्मक बयान नहीं, बल्कि देश की पोषण व्यवस्था पर एक गंभीर सवाल है। यह दिखाता है कि विकास के दावों के बीच आज भी एक बड़ी आबादी बुनियादी जरूरतों से वंचित है।

अब जरूरत इस बात की है कि सरकार, शिक्षा व्यवस्था और समाज मिलकर ठोस कदम उठाएं, ताकि कोई भी बच्चा भूखा न सोए, कोई बच्चा पोषण से वंचित न रहे और हर बच्चे को एक स्वस्थ भविष्य मिल सके। क्योंकि मजबूत भारत की नींव स्वस्थ बच्चों पर ही टिकी है।

 

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