
मुंबई महानगरपालिका (BMC) चुनाव 2026 के नतीजों ने महाराष्ट्र की राजनीति में कई नए संदेश दिए हैं। भले ही चुनावी आंकड़ों में ठाकरे ब्रदर्स को अपेक्षित सफलता न मिली हो, लेकिन इसके बावजूद उनकी राजनीतिक साख बनी रही—ऐसा मानना है प्रदीप गुप्ता, जो देश की जानी-मानी चुनावी सर्वे एजेंसी Axis My India के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं। उनके मुताबिक, BMC चुनाव के नतीजों को सिर्फ जीत-हार के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसके पीछे छिपे वोट शेयर, ब्रांड वैल्यू और राजनीतिक संदेश को भी समझना जरूरी है।
BMC चुनाव को हमेशा से महाराष्ट्र की राजनीति का सेमीफाइनल माना जाता रहा है। देश की सबसे अमीर नगर निगम होने के साथ-साथ यह मुंबई की सत्ता और राजनीतिक प्रभाव का प्रतीक भी है। इस बार के चुनाव में मुकाबला बेहद दिलचस्प रहा। एक तरफ बीजेपी और शिवसेना (शिंदे गुट) का गठबंधन था, तो दूसरी ओर ठाकरे ब्रदर्स—उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे—की राजनीति को जनता किस नजर से देखती है, इस पर सबकी नजरें टिकी थीं।
प्रदीप गुप्ता का कहना है कि भले ही बीएमसी की सत्ता ठाकरे खेमे के हाथ से निकल गई हो, लेकिन वोटिंग पैटर्न यह दिखाता है कि मुंबई की राजनीति में ‘ठाकरे ब्रांड’ अभी भी प्रासंगिक है। उनके अनुसार, चुनाव में ठाकरे ब्रदर्स से जुड़े दलों को जो वोट मिले, वह यह साबित करता है कि शहरी मतदाताओं के एक बड़े वर्ग में अब भी उनके लिए भावनात्मक और वैचारिक जुड़ाव मौजूद है।
उन्होंने यह भी कहा कि चुनावी नतीजों में सीटों की संख्या कई बार वास्तविक राजनीतिक ताकत को पूरी तरह नहीं दर्शाती। अगर वोट शेयर और शहरी इलाकों में समर्थन को देखा जाए, तो ठाकरे ब्रदर्स की साख पर कोई बड़ी चोट नहीं लगी है। यही वजह है कि वे इस चुनाव को पूरी तरह हार के रूप में नहीं देखते, बल्कि एक संक्रमणकालीन चरण मानते हैं।
प्रदीप गुप्ता के मुताबिक, इस चुनाव में एक और अहम बात सामने आई—वोटों का बंटवारा। मुंबई जैसे महानगर में जब एक ही वैचारिक स्पेस में कई दल सक्रिय होते हैं, तो सीटों का गणित बदल जाता है। ठाकरे ब्रदर्स के समर्थक वोट बैंक का कुछ हिस्सा अलग-अलग विकल्पों में बंट गया, जिसका सीधा फायदा गठबंधन को मिला। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि ठाकरे परिवार की राजनीति खत्म हो गई है।
उनका मानना है कि उद्धव ठाकरे की राजनीति को अब भी एक ‘सॉफ्ट लेकिन विश्वसनीय नेतृत्व’ के तौर पर देखा जाता है, खासकर मध्यम वर्ग और मराठी अस्मिता से जुड़े मतदाताओं में। वहीं राज ठाकरे की अपील अलग तरह की है—वे तेज, आक्रामक और मुद्दों को सीधे उठाने वाले नेता माने जाते हैं। इन दोनों धाराओं का अलग-अलग प्रभाव BMC चुनाव में भी दिखा।
Axis My India के एमडी के अनुसार, यह चुनाव ठाकरे ब्रदर्स के लिए एक चेतावनी भी है और एक अवसर भी। चेतावनी इसलिए कि बदलते शहरी मतदाता अब केवल भावनाओं के आधार पर वोट नहीं देता, बल्कि स्थानीय मुद्दों, विकास और प्रशासनिक क्षमता को भी महत्व देता है। अवसर इसलिए कि अभी भी उनके पास एक मजबूत कोर वोट बैंक मौजूद है, जिसे सही रणनीति के जरिए दोबारा संगठित किया जा सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि बीजेपी और शिंदे गुट की जीत के बावजूद, मुंबई में मुकाबला पूरी तरह एकतरफा नहीं हुआ। कई वार्डों में कांटे की टक्कर देखने को मिली, जो यह दर्शाती है कि आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में महाराष्ट्र की राजनीति और ज्यादा रोचक हो सकती है। ठाकरे ब्रदर्स अगर संगठनात्मक स्तर पर खुद को मजबूत करते हैं, तो वे भविष्य में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
प्रदीप गुप्ता के मुताबिक, राजनीतिक साख केवल सत्ता से नहीं बनती, बल्कि जनता के बीच विश्वसनीयता, पहचान और निरंतर उपस्थिति से बनती है। ठाकरे नाम आज भी मुंबई और महाराष्ट्र की राजनीति में एक मजबूत पहचान रखता है। यही वजह है कि हार के बावजूद उनके समर्थकों में निराशा के साथ-साथ उम्मीद भी नजर आती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि BMC चुनाव में ठाकरे ब्रदर्स का प्रदर्शन यह संकेत देता है कि महाराष्ट्र में विपक्ष की राजनीति पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। सत्ता भले ही दूसरी तरफ हो, लेकिन विपक्ष के पास मुद्दे, नेतृत्व और जनाधार अब भी मौजूद है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए भी अहम मानी जाती है।
कुल मिलाकर, Axis My India के एमडी प्रदीप गुप्ता का यह आकलन बताता है कि BMC चुनाव को केवल हार-जीत के पैमाने पर देखना अधूरा विश्लेषण होगा। ठाकरे ब्रदर्स ने भले ही सत्ता गंवाई हो, लेकिन उनकी राजनीतिक साख, ब्रांड वैल्यू और जनाधार अब भी कायम है। आने वाले चुनाव यह तय करेंगे कि वे इस साख को दोबारा सत्ता में बदल पाते हैं या नहीं, लेकिन फिलहाल इतना साफ है कि मुंबई की राजनीति से ठाकरे नाम को नजरअंदाज करना आसान नहीं है।