प्लान-बी पर भारत की बड़ी चाल: EU के साथ मेगा डील की तैयारी, चीन और अमेरिका को एक साथ लग सकता है झटका

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वैश्विक राजनीति और व्यापार के बदलते समीकरणों के बीच भारत अब सिर्फ प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक खिलाड़ी की भूमिका में उतरता दिख रहा है। चीन और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव, सप्लाई चेन में अस्थिरता और वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता के माहौल में भारत ने अपना “प्लान-बी” पूरी तरह सक्रिय कर दिया है। संकेत साफ हैं—अगले हफ्ते भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच होने वाला बड़ा समझौता न सिर्फ भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए निर्णायक साबित हो सकता है, बल्कि चीन और अमेरिका—दोनों को एक साथ कड़ा संदेश भी दे सकता है।

दरअसल, भारत और EU के बीच लंबे समय से फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को लेकर बातचीत चल रही है। कई दौर की वार्ता, अड़चनें और राजनीतिक मतभेदों के बाद अब यह समझौता अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंचता नजर आ रहा है। सरकार के सूत्रों का कहना है कि अगले हफ्ते इस डील को लेकर बड़ा ऐलान हो सकता है, जो भारत की व्यापार नीति में एक ऐतिहासिक बदलाव का संकेत होगा।

यह डील ऐसे समय में आ रही है, जब भारत के पारंपरिक व्यापार साझेदारों—खासकर चीन और अमेरिका—के साथ रिश्तों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। चीन के साथ सीमा विवाद और व्यापार असंतुलन लंबे समय से भारत के लिए चिंता का विषय रहे हैं। वहीं अमेरिका के साथ व्यापारिक रिश्तों में भी टैरिफ, वीज़ा और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर जैसे मुद्दों पर मतभेद बढ़ते रहे हैं।

इसी पृष्ठभूमि में भारत ने यूरोप की ओर मजबूती से कदम बढ़ाया है। यूरोपीय संघ 27 देशों का समूह है और दुनिया के सबसे बड़े व्यापारिक ब्लॉकों में गिना जाता है। अगर भारत के साथ यह FTA फाइनल हो जाता है, तो यह भारतीय निर्यातकों के लिए एक विशाल बाजार के दरवाजे खोल देगा।

सरकारी रणनीतिकारों का मानना है कि यह डील सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि भू-राजनीतिक संतुलन का भी बड़ा हथियार बन सकती है। एक तरफ अमेरिका अपनी “अमेरिका फर्स्ट” नीति पर चलता रहा है, दूसरी तरफ चीन अपनी आक्रामक आर्थिक कूटनीति के जरिए बाजारों पर कब्जा जमाने की कोशिश करता रहा है। भारत अब इन दोनों ध्रुवों के बीच अपनी स्वतंत्र और मजबूत पहचान बनाने की कोशिश में जुटा है।

EU के साथ होने वाला समझौता कई सेक्टरों के लिए गेम चेंजर माना जा रहा है। खासतौर पर ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल, आईटी सर्विसेज और ग्रीन एनर्जी के क्षेत्र में भारत को बड़ा फायदा मिल सकता है। यूरोप की कंपनियों के लिए भी भारत एक तेजी से बढ़ता हुआ बाजार है, जहां मैन्युफैक्चरिंग और डिजिटल इकोनॉमी दोनों में जबरदस्त संभावनाएं हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस FTA के बाद भारत से यूरोप को होने वाले निर्यात पर टैरिफ काफी हद तक कम हो सकते हैं। इससे भारतीय सामान यूरोपीय बाजार में ज्यादा प्रतिस्पर्धी हो जाएगा। इसका सीधा असर चीन पर पड़ेगा, जो अब तक यूरोप का बड़ा सप्लायर रहा है।

चीन के लिए यह एक बड़ा झटका साबित हो सकता है। अगर यूरोप में भारतीय सामान सस्ते और ज्यादा भरोसेमंद विकल्प के रूप में उभरता है, तो चीनी निर्यात को सीधी चुनौती मिलेगी। यही वजह है कि इस डील को सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक कदम भी माना जा रहा है।

अमेरिका के संदर्भ में भी यह डील बेहद अहम है। पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक तनाव कई बार सामने आ चुके हैं। टेक्नोलॉजी एक्सपोर्ट, स्टील-एल्युमिनियम टैरिफ और वीज़ा नीति जैसे मुद्दों पर मतभेद बने रहे। ऐसे में अगर भारत यूरोप के साथ एक मजबूत व्यापारिक गठजोड़ बना लेता है, तो अमेरिका की भारत पर निर्भरता भी कुछ हद तक कम हो सकती है।

सरकार के अंदरूनी हलकों में इसे “प्लान-बी” कहा जा रहा है—यानी अगर अमेरिका और चीन के साथ रिश्ते किसी वजह से और जटिल होते हैं, तो भारत के पास यूरोप जैसा मजबूत विकल्प तैयार रहेगा।

इस डील का एक और अहम पहलू है—मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन। दुनिया की कई बड़ी कंपनियां अब चीन पर अपनी निर्भरता कम करना चाहती हैं। भारत लंबे समय से खुद को एक वैकल्पिक मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है। EU के साथ FTA इस कोशिश को जबरदस्त रफ्तार दे सकता है।

ग्रीन एनर्जी और क्लाइमेट टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भी यह समझौता बेहद अहम माना जा रहा है। यूरोप इस समय ग्रीन ट्रांजिशन पर भारी निवेश कर रहा है, और भारत सोलर, विंड और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे क्षेत्रों में बड़ी भूमिका निभा सकता है।

हालांकि, इस डील को लेकर कुछ चुनौतियां भी कम नहीं हैं। कृषि, डेयरी और बौद्धिक संपदा अधिकार जैसे मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच अभी भी मतभेद बताए जा रहे हैं। भारतीय किसान संगठनों को डर है कि यूरोपीय कृषि उत्पादों के आने से घरेलू बाजार पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं यूरोप भारत से मजबूत पेटेंट सुरक्षा की मांग कर रहा है।

सरकार का दावा है कि वह इन संवेदनशील क्षेत्रों में भारत के हितों की पूरी रक्षा करेगी और कोई भी समझौता तभी होगा, जब घरेलू उद्योग और किसानों को नुकसान न पहुंचे।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह डील मोदी सरकार की विदेश और व्यापार नीति का एक बड़ा टर्निंग पॉइंट बन सकती है। यह दिखाता है कि भारत अब सिर्फ किसी एक गुट पर निर्भर रहने के बजाय बहु-ध्रुवीय रणनीति अपना रहा है।

वैश्विक मंच पर इसका संदेश साफ है—भारत अब केवल उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि नियम तय करने वाला खिलाड़ी बनना चाहता है।

अगर अगले हफ्ते यह समझौता फाइनल होता है, तो इसका असर शेयर बाजार से लेकर विदेशी निवेश तक हर स्तर पर दिख सकता है। निवेशकों को उम्मीद है कि इससे भारत में एफडीआई बढ़ेगा, रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और निर्यात में लंबी छलांग लगेगी।

कुल मिलाकर, EU के साथ होने वाली यह डील भारत के “प्लान-बी” की सबसे बड़ी परीक्षा है। यह एक ऐसा कदम है, जो एक साथ चीन को बाजार में चुनौती देगा और अमेरिका को यह संकेत देगा कि भारत अब अपने विकल्प तैयार कर चुका है।

अब निगाहें अगले हफ्ते पर टिकी हैं—जहां यह साफ होगा कि भारत का यह बड़ा दांव सिर्फ व्यापारिक समझौता बनता है या फिर वैश्विक शक्ति संतुलन को बदलने वाली चाल साबित होता है।

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