
कर्नाटक कांग्रेस में चल रही अंदरूनी खींचतान अब बंद कमरों से निकलकर खुले मंच पर आ चुकी है। हालिया घटना ने यह साफ कर दिया है कि सत्ता के दो बड़े केंद्र—मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार—के बीच का तनाव अब छिपा नहीं रह गया है। एमएनरेगा से जुड़े मुद्दों पर आयोजित कांग्रेस कार्यक्रम के दौरान जब मंच के सामने से ‘डीके-डीके’ के नारे लगे, तो मुख्यमंत्री सिद्धारमैया अपना आपा खो बैठे और वहीं मंच पर नाराज़गी जाहिर कर दी। यह दृश्य कर्नाटक कांग्रेस के भीतर चल रही शक्ति संघर्ष की सबसे खुली तस्वीर बन गया।
यह कार्यक्रम कांग्रेस द्वारा केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ और एमएनरेगा से जुड़े मुद्दों को लेकर आयोजित किया गया था। मंच पर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया मौजूद थे और पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे थे। माहौल औपचारिक था, लेकिन अचानक भीड़ के एक हिस्से से ‘डीके-डीके’ के नारे गूंजने लगे। यह नारे सीधे तौर पर उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के समर्थन में माने गए।
कुछ पल के लिए मंच पर मौजूद नेता भी चौंक गए। आम तौर पर किसी कार्यक्रम में मुख्यमंत्री के सामने दूसरे नेता के समर्थन में नारे लगना पार्टी अनुशासन के खिलाफ माना जाता है। सिद्धारमैया ने जैसे ही ये नारे सुने, उनका चेहरा बदल गया। उन्होंने बीच भाषण में ही रुककर नाराज़गी जताई और कार्यकर्ताओं को फटकार लगाई।
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, सिद्धारमैया ने मंच से साफ शब्दों में कहा कि यह पार्टी का कार्यक्रम है, किसी एक व्यक्ति का नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह के नारे पार्टी की एकता को कमजोर करते हैं और अनुशासनहीनता को बढ़ावा देते हैं। उनके शब्दों और हावभाव से साफ झलक रहा था कि वे इस घटनाक्रम से बेहद असहज और नाराज़ हैं।
यह घटना ऐसे समय में हुई है, जब कर्नाटक कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर लंबे समय से खींचतान चल रही है। विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच खुली प्रतिस्पर्धा देखी गई थी। आखिरकार आलाकमान ने समझौते के तहत सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री और डीके शिवकुमार को उपमुख्यमंत्री बनाया।
हालांकि, यह फार्मूला सत्ता तो बना गया, लेकिन पार्टी के भीतर दो पावर सेंटर भी खड़े कर गया। सिद्धारमैया का अपना मजबूत समर्थक वर्ग है, तो डीके शिवकुमार की भी जमीनी पकड़ और संगठन पर गहरी पकड़ मानी जाती है। यही द्वंद्व अब बार-बार अलग-अलग रूपों में सामने आ रहा है।
‘डीके-डीके’ के नारे सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि उस अंदरूनी संदेश का प्रतीक माने जा रहे हैं, जो पार्टी के एक वर्ग द्वारा दिया जा रहा है। यह संदेश साफ है—कि डीके शिवकुमार को सिर्फ उपमुख्यमंत्री नहीं, बल्कि भविष्य का मुख्यमंत्री माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह घटना अचानक नहीं हुई। लंबे समय से पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा चल रही है कि सत्ता का असली केंद्र कौन है। कुछ लोग मानते हैं कि सिद्धारमैया प्रशासनिक रूप से मजबूत हैं, तो कुछ का कहना है कि संगठन पर डीके शिवकुमार का नियंत्रण ज्यादा है।
यही कारण है कि जब मुख्यमंत्री मंच पर बोल रहे थे, तब ‘डीके-डीके’ के नारे लगना एक सोची-समझी ताकत दिखाने की कोशिश भी मानी जा रही है। यह सीधे तौर पर मुख्यमंत्री की सत्ता को चुनौती देने जैसा संदेश देता है।
इस घटना के बाद कांग्रेस आलाकमान की चिंता भी बढ़ गई है। पार्टी नेतृत्व पहले ही कर्नाटक में गुटबाजी को लेकर सतर्क है। चुनाव के बाद से ही हाईकमान लगातार दोनों नेताओं के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर यह संतुलन कमजोर पड़ता दिख रहा है।
पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि अगर समय रहते इस खींचतान को नहीं संभाला गया, तो इसका सीधा फायदा विपक्षी दलों को मिलेगा। कर्नाटक में भाजपा पहले से ही कांग्रेस की अंदरूनी कलह को बड़ा मुद्दा बना रही है और इस तरह की घटनाएं उसके आरोपों को मजबूती देती हैं।
इस पूरे घटनाक्रम का एक और पहलू है—कार्यकर्ताओं की भूमिका। आम तौर पर कार्यकर्ता वही नारे लगाते हैं, जिनसे उन्हें ऊपर से संकेत मिलते हैं। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या यह नारे स्वतःस्फूर्त थे या फिर किसी रणनीति का हिस्सा?
डीके शिवकुमार की ओर से फिलहाल इस मामले पर कोई तीखी प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। उन्होंने सार्वजनिक तौर पर पार्टी अनुशासन और एकता की बात कही है। लेकिन उनके समर्थकों की सक्रियता यह संकेत जरूर देती है कि नेतृत्व को लेकर उनकी महत्वाकांक्षा अब छिपी नहीं रह गई है।
सिद्धारमैया के लिए यह घटना व्यक्तिगत अपमान से कहीं ज्यादा गंभीर है। मुख्यमंत्री के तौर पर मंच पर उनका अधिकार और गरिमा सीधे तौर पर चुनौती दी गई है। यही वजह है कि उन्होंने तुरंत प्रतिक्रिया देकर यह संदेश देने की कोशिश की कि सरकार और पार्टी की कमान अभी उनके हाथ में है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो सत्ता साझेदारी हमेशा तनावपूर्ण होती है। जब दो मजबूत नेता एक ही सरकार में साथ होते हैं, तो टकराव की आशंका बनी रहती है। कर्नाटक कांग्रेस का यह मॉडल उसी तनाव का उदाहरण बनता जा रहा है।
पार्टी के भीतर कुछ नेता अब खुलकर कह रहे हैं कि यह दोहरी नेतृत्व व्यवस्था लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकती। या तो भविष्य में नेतृत्व का स्पष्ट फैसला करना होगा, या फिर सत्ता संघर्ष सरकार की कार्यक्षमता पर असर डालने लगेगा।
विपक्ष इस पूरे घटनाक्रम को कांग्रेस की कमजोरी के तौर पर पेश कर रहा है। भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस सरकार अंदर से ही टूट रही है और यह जनता के भरोसे के लिए खतरा है।
इस घटना ने यह भी साफ कर दिया है कि कर्नाटक कांग्रेस में आने वाले महीनों में सत्ता संघर्ष और तेज हो सकता है। जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव और भविष्य की राजनीति नजदीक आएगी, नेतृत्व की यह लड़ाई और खुलकर सामने आ सकती है।
कुल मिलाकर, सिद्धारमैया के सामने लगे ‘डीके-डीके’ के नारे सिर्फ एक अनुशासनहीनता की घटना नहीं थे। यह कर्नाटक कांग्रेस के भीतर चल रही उस गहरी दरार का संकेत हैं, जो अब मंच से लेकर सड़क तक दिखाई देने लगी है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस आलाकमान समय रहते इस सत्ता संघर्ष को थाम पाएगा, या फिर यह रार आगे चलकर सरकार और पार्टी—दोनों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाएगी।