“…तो आतंक का अड्डा बन जाएगा बांग्लादेश” — चुनाव से पहले शेख हसीना के बेटे सजीब वाजेद के तीखे आरोप

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बांग्लादेश में आगामी चुनाव से ठीक पहले सियासी माहौल गरमा गया है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के बेटे सजीब वाजेद ने बड़ा बयान देते हुए दावा किया है कि यदि वर्तमान राजनीतिक समीकरण बदले, तो देश की सुरक्षा और स्थिरता पर गंभीर असर पड़ सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि गलत नेतृत्व आने की स्थिति में बांग्लादेश “कट्टरपंथ और अस्थिरता” की ओर जा सकता है।


क्या कहा सजीब वाजेद ने?

सजीब वाजेद ने चुनावी परिदृश्य पर टिप्पणी करते हुए कहा कि देश ने पिछले वर्षों में विकास और स्थिरता देखी है, लेकिन राजनीतिक अस्थिरता से सुरक्षा तंत्र कमजोर हो सकता है।

उनका आरोप है कि कुछ ताकतें चुनाव के नतीजों को प्रभावित करने और अस्थिर माहौल बनाने की कोशिश कर रही हैं। हालांकि उन्होंने किसी विशेष दल का नाम नहीं लिया।


चुनावी माहौल में बढ़ी बयानबाजी

बांग्लादेश में चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। सत्ता पक्ष और विपक्ष एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं।

विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव से पहले इस तरह के बयान समर्थकों को संगठित करने और मतदाताओं को प्रभावित करने की रणनीति का हिस्सा हो सकते हैं।


सुरक्षा और स्थिरता का मुद्दा

सजीब वाजेद ने कहा कि बांग्लादेश ने आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है और पिछले वर्षों में सुरक्षा स्थिति बेहतर हुई है। उनका संकेत था कि यदि राजनीतिक स्थिरता कमजोर हुई, तो यह प्रगति प्रभावित हो सकती है।

हालांकि विपक्षी दल इन आरोपों को चुनावी बयान करार दे रहे हैं।


अंतरराष्ट्रीय नजरें भी टिकीं

बांग्लादेश के चुनाव पर क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें हैं। दक्षिण एशिया की राजनीति और सुरक्षा समीकरणों में इस देश की भूमिका अहम मानी जाती है।

ऐसे में चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और परिणामों की स्वीकार्यता महत्वपूर्ण होगी।


विपक्ष की प्रतिक्रिया

विपक्षी नेताओं ने सजीब वाजेद के बयान को अतिशयोक्तिपूर्ण बताया है। उनका कहना है कि चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया है और मतदाता ही अंतिम निर्णय करेंगे।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में बयानबाजी और तेज हो सकती है।


निष्कर्ष

चुनाव से ऐन पहले सजीब वाजेद का बयान बांग्लादेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर गया है। सुरक्षा और स्थिरता को लेकर उठाए गए सवाल चुनावी बहस का केंद्र बन सकते हैं।

अब यह देखना होगा कि मतदाता इन दावों को किस नजर से देखते हैं और चुनाव परिणाम किस दिशा में जाते हैं।

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