होर्मुज संकट में ‘जॉम्बी जहाजों’ का खेल: रूसी तेल ढोने वाले रहस्यमयी टैंकरों पर क्यों बढ़ रही दुनिया की चिंता?

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दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में शामिल होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) एक बार फिर वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के केंद्र में आ गया है। अमेरिका-ईरान तनाव और समुद्री सुरक्षा संकट के बीच अब एक नया शब्द तेजी से चर्चा में है – ‘जॉम्बी शिप्स’। ये ऐसे तेल टैंकर हैं जो आधिकारिक रिकॉर्ड में कबाड़ घोषित, निष्क्रिय या गायब दिखते हैं, लेकिन वास्तव में समुद्र में सक्रिय रहकर तेल ढुलाई कर रहे होते हैं। विशेष रूप से रूसी तेल के व्यापार में इन जहाजों की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है।

विशेषज्ञों के अनुसार इन जहाजों को अक्सर रूस की तथाकथित ‘डार्क फ्लीट’ (Dark Fleet) या ‘शैडो फ्लीट’ (Shadow Fleet) का हिस्सा माना जाता है। पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के बाद रूस ने अपने तेल निर्यात को जारी रखने के लिए ऐसे जहाजों का व्यापक उपयोग शुरू किया। ये जहाज अक्सर अपना वास्तविक स्थान छिपाते हैं, ट्रैकिंग सिस्टम बंद कर देते हैं और कई बार दूसरी पहचान का इस्तेमाल करते हैं।

क्या होते हैं जॉम्बी जहाज?

समुद्री व्यापार में जॉम्बी जहाज उन पोतों को कहा जाता है जो कागजों में निष्क्रिय या स्क्रैप घोषित होते हैं लेकिन वास्तव में सक्रिय रूप से माल ढुलाई कर रहे होते हैं। कई मामलों में ये जहाज पुरानी पहचान का उपयोग करते हैं, झूठे झंडे (False Flag) के तहत चलते हैं या अपनी वास्तविक स्वामित्व जानकारी छिपाते हैं। हाल के महीनों में होर्मुज क्षेत्र में ऐसे कई जहाजों की गतिविधियां दर्ज की गई हैं।

कंपनियां जोखिम क्यों उठा रही हैं?

सबसे बड़ा कारण है तेल से होने वाला भारी मुनाफा

होर्मुज संकट के कारण सामान्य जहाजों के लिए बीमा प्रीमियम, सुरक्षा खर्च और परिचालन लागत काफी बढ़ गई है। कई प्रतिष्ठित शिपिंग कंपनियां जोखिम लेने से बच रही हैं। ऐसे में डार्क फ्लीट से जुड़े जहाज ऊंचे किराए पर तेल ढुलाई का काम कर रहे हैं और मोटा लाभ कमा रहे हैं। कुछ मामलों में एक ही यात्रा से लाखों डॉलर का अतिरिक्त लाभ मिलने की बात कही जा रही है।

ट्रैकिंग सिस्टम क्यों बंद कर दिए जाते हैं?

इन जहाजों द्वारा सबसे आम तरीका AIS (Automatic Identification System) को बंद करना है। AIS जहाजों की लोकेशन, दिशा और पहचान की जानकारी प्रसारित करता है। जब जहाज इसे बंद कर देते हैं तो वे समुद्री निगरानी नेटवर्क से लगभग गायब हो जाते हैं। इसी कारण इन्हें “डार्क शिप्स” भी कहा जाता है।

भारत और चीन के लिए यह मुद्दा क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत और चीन दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में शामिल हैं। दोनों देशों की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व और रूसी तेल पर निर्भर है। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति का प्रमुख मार्ग है। यदि यहां व्यवधान बढ़ता है तो तेल की उपलब्धता और कीमत दोनों प्रभावित हो सकती हैं।

रूस से मिलने वाला रियायती कच्चा तेल भारत और चीन दोनों के लिए आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण बना हुआ है। ऐसे में जब नियमित शिपिंग चैनलों में बाधा आती है, तब डार्क फ्लीट और जॉम्बी जहाजों की भूमिका बढ़ जाती है।

सबसे बड़े खतरे क्या हैं?

इन जहाजों के उपयोग से कई गंभीर जोखिम पैदा होते हैं:

  • समुद्री टक्कर की संभावना बढ़ जाती है क्योंकि जहाज अपनी वास्तविक स्थिति नहीं बताते।
  • पुराने और कम रखरखाव वाले जहाजों से तेल रिसाव का खतरा बढ़ जाता है।
  • दुर्घटना होने पर बीमा और जिम्मेदारी तय करना मुश्किल हो जाता है।
  • प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय कानूनों को लागू करना कठिन हो जाता है।
  • समुद्री सुरक्षा एजेंसियों के लिए निगरानी चुनौतीपूर्ण हो जाती है।

फिर भी इन्हें रोका क्यों नहीं जा रहा?

समस्या यह है कि वैश्विक तेल बाजार को आपूर्ति की जरूरत है। यदि सभी संदिग्ध जहाजों को तुरंत रोक दिया जाए तो तेल आपूर्ति में बड़ी कमी आ सकती है और कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। पहले से ही होर्मुज संकट के कारण लाखों बैरल प्रतिदिन की आपूर्ति प्रभावित हो चुकी है। कई बड़े टैंकर क्षेत्र में फंसे हुए हैं और बीमा लागत रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई है।

यही वजह है कि कई कंपनियां और कुछ आयातक देश इन जोखिमों को जानते हुए भी तेल आपूर्ति बनाए रखने को प्राथमिकता दे रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना इस समय सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है।

आगे क्या हो सकता है?

यदि होर्मुज क्षेत्र में तनाव लंबा खिंचता है तो डार्क फ्लीट और जॉम्बी जहाजों का उपयोग और बढ़ सकता है। साथ ही विभिन्न देश वैकल्पिक पाइपलाइन, नए समुद्री मार्ग और रणनीतिक तेल भंडार पर अधिक ध्यान दे सकते हैं। फिलहाल वैश्विक ऊर्जा बाजार की नजर होर्मुज पर टिकी हुई है, क्योंकि यहां होने वाला हर घटनाक्रम सीधे तेल की कीमतों, एशियाई अर्थव्यवस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित कर सकता है।

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