बदरीनाथ ‘थाली भेंट’ विवाद पहुंचा हाईकोर्ट, निलंबित कर्मचारी की याचिका पर मंदिर समिति से मांगा जवाब

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उत्तराखंड के प्रसिद्ध बदरीनाथ धाम में श्रद्धालुओं की ‘थाली भेंट’ (दान) से जुड़ी कथित अनियमितताओं का मामला अब न्यायपालिका तक पहुंच गया है। श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (BKTC) के निलंबित कर्मचारी प्रमोद नौटियाल ने अपने निलंबन को चुनौती देते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। मामले की प्रारंभिक सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने मंदिर समिति से जवाब तलब किया है और याचिका पर निर्धारित तिथि तक अपना पक्ष रखने के निर्देश दिए हैं।

यह मामला उस समय सामने आया जब बदरीनाथ धाम में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाई गई ‘थाली भेंट’ की गिनती के दौरान कथित वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगे। प्रारंभिक जांच में मंदिर समिति ने प्रथम दृष्टया अनियमितता पाए जाने का दावा करते हुए प्रमोद नौटियाल को निलंबित कर दिया। इसके बाद समिति की शिकायत पर बदरीनाथ थाने में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं के तहत प्राथमिकी भी दर्ज की गई। आरोप है कि दान की गिनती के दौरान कुछ धनराशि को कथित रूप से अनधिकृत तरीके से हटाया गया।

निलंबन के बाद प्रमोद नौटियाल ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दावा किया कि उनके खिलाफ उचित विभागीय प्रक्रिया का पालन किए बिना कार्रवाई की गई। याचिका में कहा गया है कि उन्हें अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया और निलंबन आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। इसी आधार पर उन्होंने निलंबन आदेश को रद्द करने और मामले में निष्पक्ष सुनवाई की मांग की है।

हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति से विस्तृत जवाब मांगा है। अदालत ने समिति से पूछा है कि किन तथ्यों और प्रारंभिक साक्ष्यों के आधार पर कर्मचारी को निलंबित किया गया तथा क्या विभागीय नियमों का पालन किया गया। फिलहाल अदालत ने मामले में अंतिम राहत नहीं दी है और अगली सुनवाई तक संबंधित पक्षों से जवाब प्रस्तुत करने को कहा है।

इस बीच मंदिर समिति ने अपने रुख का बचाव करते हुए कहा है कि कार्रवाई किसी संस्था की छवि को प्रभावित करने के लिए नहीं, बल्कि जांच को निष्पक्ष बनाए रखने के उद्देश्य से की गई। समिति के वित्त नियंत्रक हेम कंडपाल ने कहा कि किसी एक कर्मचारी की कथित गलती को पूरी संस्था से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, मंदिर समिति वर्षों से स्थापित नियमों और पारदर्शी प्रशासनिक प्रक्रियाओं के तहत कार्य करती है तथा यदि कोई कर्मचारी दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जाती है।

मामले की जांच कई स्तरों पर जारी है। मंदिर समिति पहले ही चार सदस्यीय आंतरिक जांच समिति गठित कर चुकी है, जबकि उत्तराखंड सरकार ने भी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर एक अलग उच्चस्तरीय जांच समिति बनाई है। जांच एजेंसियां सीसीटीवी फुटेज, दान गिनती के रिकॉर्ड, कर्मचारियों के बयान और अन्य दस्तावेजों की समीक्षा कर रही हैं ताकि पूरे घटनाक्रम की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके।

इस प्रकरण ने मंदिरों में दान प्रबंधन और वित्तीय पारदर्शिता को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि बड़ी धार्मिक संस्थाओं में आधुनिक निगरानी व्यवस्था, डिजिटल रिकॉर्डिंग, नियमित ऑडिट और बहुस्तरीय सत्यापन प्रणाली अपनाने से ऐसी घटनाओं की संभावना कम की जा सकती है। वहीं श्रद्धालुओं का विश्वास बनाए रखने के लिए जांच का निष्पक्ष और समयबद्ध तरीके से पूरा होना भी आवश्यक माना जा रहा है।

फिलहाल हाईकोर्ट में मामला विचाराधीन है और अदालत के समक्ष मंदिर समिति अपना पक्ष प्रस्तुत करेगी। दूसरी ओर पुलिस और सरकारी जांच समितियां भी कथित अनियमितताओं की अलग-अलग जांच कर रही हैं। जांच पूरी होने और न्यायालय की आगे की सुनवाई के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि निलंबन की कार्रवाई विधिसम्मत थी या नहीं तथा कथित वित्तीय अनियमितताओं के मामले में आगे क्या कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

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