1993 से 2026 तक हर बड़े शिक्षा सुधार में क्यों दिखती है ISRO की छाप? जानिए सरकार बार-बार अंतरिक्ष वैज्ञानिकों पर क्यों जताती है भरोसा

2

नई दिल्ली। भारत की शिक्षा व्यवस्था में जब भी बड़े बदलाव की जरूरत महसूस हुई है, सरकार ने कई बार ऐसे वैज्ञानिकों पर भरोसा जताया है जिनका संबंध भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) से रहा है। वर्ष 1993 में प्रोफेसर यश पाल की समिति से लेकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के मसौदे का नेतृत्व करने वाले पूर्व ISRO प्रमुख डॉ. के. कस्तूरीरंगन और अब 2026 में परीक्षा सुधारों के लिए गठित नई टास्क फोर्स में पूर्व ISRO अध्यक्ष डॉ. एस. सोमनाथ की अहम भूमिका—यह सिलसिला बताता है कि शिक्षा सुधारों में तकनीकी दृष्टि और वैज्ञानिक सोच को लगातार महत्व दिया गया है। हाल ही में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित और पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से नई उच्चस्तरीय टास्क फोर्स का गठन किया है।

यह नई पहल ऐसे समय सामने आई है जब देश में प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं में पेपर लीक और परीक्षा सुरक्षा से जुड़ी घटनाओं ने अभ्यर्थियों का भरोसा कमजोर किया है। इसी पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परीक्षा सुधारों के लिए एक उच्चस्तरीय समिति की घोषणा की, जिसकी अध्यक्षता इंफोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणी कर रहे हैं। समिति में पूर्व ISRO प्रमुख एस. सोमनाथ, आईआईटी मद्रास के निदेशक वी. कामकोटि सहित कई विशेषज्ञ शामिल किए गए हैं। इस समिति का प्रमुख उद्देश्य तकनीक की मदद से परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और भरोसेमंद बनाना है।

1993: यश पाल समिति और ‘Learning Without Burden’

शिक्षा सुधारों में ISRO से जुड़े विशेषज्ञों की भूमिका की शुरुआत 1993 में प्रमुख रूप से देखने को मिली। उस समय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने प्रोफेसर यश पाल की अध्यक्षता में एक समिति गठित की। यश पाल भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम और ISRO के स्पेस एप्लिकेशन कार्यों से जुड़े रहे थे। उनकी समिति ने “Learning Without Burden” नामक ऐतिहासिक रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें रटने की संस्कृति कम करने, विद्यार्थियों पर पाठ्यपुस्तकों का बोझ घटाने, अवधारणात्मक शिक्षा को बढ़ावा देने और परीक्षा प्रणाली में बदलाव की सिफारिश की गई। बाद के वर्षों में स्कूल शिक्षा से जुड़े अनेक सुधारों की नींव इसी रिपोर्ट ने रखी।

NEP 2020 और कस्तूरीरंगन की भूमिका

दो दशक से अधिक समय बाद केंद्र सरकार ने देश की नई शिक्षा नीति तैयार करने की जिम्मेदारी पूर्व ISRO अध्यक्ष डॉ. के. कस्तूरीरंगन को सौंपी। उनकी अध्यक्षता में तैयार मसौदे के आधार पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लागू की गई। इस नीति में 5+3+3+4 संरचना, बहुविषयक शिक्षा, मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा, कौशल विकास, लचीले पाठ्यक्रम और शोध को बढ़ावा देने जैसे कई बड़े बदलाव शामिल किए गए। विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण और दीर्घकालिक योजना बनाने की क्षमता ने इस नीति को व्यापक स्वरूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

2026: परीक्षा सुरक्षा के लिए तकनीकी समाधान

वर्तमान परीक्षा सुधार टास्क फोर्स का फोकस पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि परीक्षा प्रणाली की सुरक्षा है। सरकार का उद्देश्य डिजिटल तकनीक, डेटा विश्लेषण, सुरक्षित परीक्षा अवसंरचना और आधुनिक निगरानी तंत्र के माध्यम से पेपर लीक जैसी घटनाओं की संभावना को कम करना है। पूर्व ISRO प्रमुख एस. सोमनाथ को तकनीकी रणनीति तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है। माना जा रहा है कि अंतरिक्ष अभियानों में विकसित उच्च स्तरीय सुरक्षा, सिस्टम इंजीनियरिंग और जोखिम प्रबंधन का अनुभव परीक्षा प्रणाली को अधिक मजबूत बनाने में उपयोगी हो सकता है।

आखिर ISRO के वैज्ञानिकों पर ही क्यों भरोसा?

विशेषज्ञों के अनुसार, ISRO के वैज्ञानिक जटिल परियोजनाओं के प्रबंधन, उच्च स्तर की तकनीकी विश्वसनीयता, डेटा-आधारित निर्णय, पारदर्शी प्रक्रियाओं और लंबे समय की रणनीतिक योजना बनाने के लिए जाने जाते हैं। अंतरिक्ष मिशनों में बेहद कम त्रुटि की गुंजाइश होती है, इसलिए वहां विकसित कार्यशैली को प्रशासन और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में भी उपयोगी माना जाता है। यही कारण है कि जब भी शिक्षा व्यवस्था में व्यापक और संरचनात्मक बदलाव की आवश्यकता महसूस हुई, सरकार ने बार-बार ऐसे विशेषज्ञों को जिम्मेदारी सौंपी जिनका वैज्ञानिक और तकनीकी नेतृत्व का मजबूत रिकॉर्ड रहा है।

आगे की राह

नई टास्क फोर्स की विस्तृत कार्ययोजना अभी सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन उम्मीद की जा रही है कि यह समिति परीक्षा प्रणाली में तकनीकी सुधार, सुरक्षा मानकों, डिजिटल निगरानी और पारदर्शिता को लेकर ठोस सुझाव देगी। यदि इन सिफारिशों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो यह न केवल पेपर लीक जैसी समस्याओं को रोकने में मदद करेगा, बल्कि देश की सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली पर छात्रों और अभिभावकों का भरोसा भी मजबूत कर सकता है। 1993 से लेकर 2026 तक का सफर यही दर्शाता है कि भारत ने शिक्षा सुधारों में बार-बार वैज्ञानिक नेतृत्व और तकनीकी विशेषज्ञता को परिवर्तन का प्रमुख आधार माना है।

Share it :

End