
नई दिल्ली। CJP (कॉकरोच जनता पार्टी) के नेतृत्व में हुए हालिया प्रदर्शनों के दौरान सोशल मीडिया पर फैलाई गई कथित भ्रामक सामग्री और AI-जनित डीपफेक वीडियो को लेकर जांच एजेंसियों ने बड़ा खुलासा किया है। महाराष्ट्र साइबर विभाग का दावा है कि प्रदर्शन से जुड़े कई फर्जी सोशल मीडिया अकाउंट पाकिस्तान और मध्य-पूर्व (मिडिल ईस्ट) के विभिन्न देशों से संचालित किए जा रहे थे। इन खातों के माध्यम से डीपफेक वीडियो, एडिटेड तस्वीरें और भ्रामक पोस्ट साझा कर आंदोलन से जुड़ा गलत नैरेटिव बनाने तथा लोगों को गुमराह करने की कोशिश की गई।
जांच एजेंसियों के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बड़ी संख्या में ऐसे वीडियो सामने आए जिनमें प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों और अन्य सार्वजनिक हस्तियों के कथित बयान दिखाए गए थे। बाद में सरकारी फैक्ट-चेक एजेंसियों ने इनमें से कई वीडियो को AI-जनित डीपफेक और डिजिटल रूप से छेड़छाड़ किया गया कंटेंट बताया। अधिकारियों का कहना है कि इन वीडियो का उद्देश्य लोगों में भ्रम फैलाना और आंदोलन को लेकर तनाव बढ़ाना था।
महाराष्ट्र साइबर की प्रारंभिक जांच में यह भी सामने आया कि कई संदिग्ध अकाउंट विदेशों से संचालित किए जा रहे थे। अधिकारियों के मुताबिक, इन खातों के आईपी लॉग, गतिविधियों के पैटर्न और समन्वित पोस्टिंग से संकेत मिले कि कुछ नेटवर्क पाकिस्तान और मध्य-पूर्व से जुड़े हो सकते हैं। हालांकि जांच अभी जारी है और अंतिम निष्कर्ष डिजिटल फोरेंसिक विश्लेषण के बाद ही सामने आएंगे।
इस बीच दिल्ली पुलिस ने भी दावा किया है कि उसने 400 से अधिक ऐसे सोशल मीडिया हैंडल की पहचान कर उन्हें ब्लॉक करने की प्रक्रिया शुरू की, जो कथित रूप से पाकिस्तान से संचालित होकर CJP आंदोलन से जुड़ी भ्रामक सामग्री और अफवाहें फैला रहे थे। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि इनमें से कई अकाउंट पहले भी ऑपरेशन सिंदूर के दौरान गलत सूचनाएं फैलाने में सक्रिय रहे थे। पुलिस ने लोगों से अपील की है कि वे किसी भी वीडियो, पोस्ट या संदेश को साझा करने से पहले उसकी सत्यता की जांच अवश्य करें।
सरकारी फैक्ट-चेक इकाइयों ने प्रदर्शन से जुड़े कई वायरल वीडियो का विश्लेषण कर उन्हें फर्जी बताया। इनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल के नाम से प्रसारित कुछ कथित वीडियो भी शामिल थे। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि इन वीडियो में प्रयुक्त आवाज और दृश्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से तैयार या डिजिटल रूप से बदले गए थे तथा संबंधित नेताओं ने ऐसे बयान कभी नहीं दिए।
साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक AI तकनीकों की मदद से कुछ ही मिनटों में बेहद वास्तविक दिखने वाले वीडियो और ऑडियो तैयार किए जा सकते हैं। ऐसे डीपफेक चुनावों, आंदोलनों और संवेदनशील घटनाओं के दौरान गलत सूचना फैलाने का प्रभावी माध्यम बन रहे हैं। इसी वजह से जांच एजेंसियां अब सोशल मीडिया मॉनिटरिंग, डिजिटल फोरेंसिक और प्लेटफॉर्म कंपनियों के सहयोग से ऐसे नेटवर्क की पहचान करने पर विशेष जोर दे रही हैं।
फिलहाल महाराष्ट्र साइबर और अन्य एजेंसियां मामले की विस्तृत जांच कर रही हैं। अधिकारियों का कहना है कि संदिग्ध खातों, डिजिटल सबूतों और संबंधित प्लेटफॉर्म से प्राप्त जानकारी का विश्लेषण किया जा रहा है। जांच पूरी होने के बाद यदि किसी व्यक्ति या संगठन की भूमिका प्रमाणित होती है, तो उसके खिलाफ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और अन्य लागू कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाएगी। वहीं नागरिकों से अपील की गई है कि किसी भी वायरल सामग्री पर भरोसा करने से पहले उसकी पुष्टि आधिकारिक स्रोतों या विश्वसनीय फैक्ट-चेक माध्यमों से अवश्य करें।