तमिलनाडु की विजय सरकार को बड़ा झटका, करूर भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने का आदेश मद्रास हाईकोर्ट ने किया रद्द

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चेन्नई। मद्रास हाईकोर्ट ने करूर भगदड़ मामले में तमिलनाडु की विजय सरकार को बड़ा झटका देते हुए मृतकों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने संबंधी राज्य सरकार के आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि इस प्रकार की नियुक्तियां संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (सरकारी नौकरियों में समान अवसर) की भावना के अनुरूप नहीं हैं। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी नौकरियों का वितरण केवल संवेदना के आधार पर नहीं किया जा सकता और इसके लिए संवैधानिक तथा वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन अनिवार्य है।

यह मामला सितंबर 2025 में करूर जिले में आयोजित एक राजनीतिक रैली के दौरान हुई भीषण भगदड़ से जुड़ा है, जिसमें 41 लोगों की मौत हो गई थी और कई अन्य घायल हुए थे। हादसे के बाद राज्य सरकार ने पीड़ित परिवारों को आर्थिक सहायता के साथ सरकारी नौकरी देने का निर्णय लिया था। इसी महीने मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने करूर में आयोजित कार्यक्रम में कई पीड़ित परिवारों को नियुक्ति पत्र भी सौंपे थे।

राज्य सरकार के इस फैसले को चुनौती देते हुए कई जनहित याचिकाएं दायर की गई थीं। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि सरकारी नौकरी देना सहानुभूति का विषय नहीं हो सकता, क्योंकि इससे अन्य पात्र उम्मीदवारों के समान अवसर के अधिकार का उल्लंघन होता है। सुनवाई के दौरान अदालत ने इस संवैधानिक पहलू पर विशेष ध्यान दिया और अंततः सरकार के आदेश को निरस्त कर दिया।

मद्रास हाईकोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि करूर भगदड़ की जांच फिलहाल केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) कर रही है और इस जांच की निगरानी सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर भी की जा रही है। अदालत ने कहा कि चूंकि जांच अभी जारी है, इसलिए वह हादसे के कारणों या किसी व्यक्ति की जिम्मेदारी पर कोई टिप्पणी नहीं करेगी। अदालत का फैसला केवल सरकारी नौकरियों से जुड़े आदेश की वैधता तक सीमित है।

गौरतलब है कि इससे पहले जुलाई में मद्रास हाईकोर्ट ने अंतरिम राहत देते हुए सरकार को अस्थायी आधार पर नियुक्ति पत्र वितरित करने की अनुमति दी थी। साथ ही यह स्पष्ट किया गया था कि ये नियुक्तियां अंतिम न्यायिक निर्णय के अधीन रहेंगी। अब अंतिम फैसला आने के बाद सरकार का वह आदेश पूरी तरह रद्द कर दिया गया है।

अदालत के इस निर्णय के बाद राज्य सरकार के सामने नई कानूनी और प्रशासनिक चुनौती खड़ी हो गई है। सरकार अब यह तय करेगी कि वह इस फैसले को स्वीकार करती है या फिर उच्च न्यायालय के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देती है। वहीं कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला भविष्य में ऐसी घटनाओं के बाद राहत और पुनर्वास के तौर-तरीकों को लेकर भी महत्वपूर्ण नजीर बन सकता है।

इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि दुर्घटनाओं और आपदाओं के पीड़ित परिवारों की सहायता किस प्रकार की जानी चाहिए। एक ओर सरकार मानवीय आधार पर राहत देने की बात करती है, वहीं अदालत ने स्पष्ट किया है कि सरकारी नियुक्तियों जैसे संवेदनशील विषय पर संवैधानिक सिद्धांतों और समान अवसर के अधिकार से समझौता नहीं किया जा सकता। अब इस मामले में राज्य सरकार की अगली कानूनी रणनीति पर सभी की नजर बनी हुई है।

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