
नई दिल्ली। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने राहुल गांधी के नेतृत्व में चलाए जा रहे ‘छात्रों की गूंज’ अभियान को लेकर दिए अपने बयान पर सफाई दी है। थरूर के बयान के बाद राजनीतिक हलकों में यह चर्चा शुरू हो गई थी कि उन्होंने कांग्रेस और राहुल गांधी के छात्र अभियान की आलोचना की है। अब थरूर ने स्पष्ट किया है कि उनके बयान को मीडिया में जिस तरह पेश किया गया, वह उनके मूल विचार से अलग था। उन्होंने कहा कि उनकी टिप्पणी को पार्टी की आलोचना के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि वह युवाओं और Gen-Z के साथ राजनीतिक संवाद को लेकर आत्ममंथन की बात कर रहे थे।
दरअसल, थरूर ने हाल ही में छात्रों के बीच राहुल गांधी के अभियान और हाल के छात्र आंदोलनों के प्रभाव को लेकर सवाल उठाए थे। उन्होंने इस बात पर विचार करने की जरूरत बताई थी कि आखिर कांग्रेस द्वारा उठाए गए छात्र मुद्दों को उतनी व्यापक जन प्रतिक्रिया क्यों नहीं मिली, जितनी हालिया छात्र आंदोलनों को मिली। उन्होंने यह भी सवाल किया था कि क्या कांग्रेस युवाओं की बात पर्याप्त रूप से सुन नहीं पाई या फिर पार्टी Gen-Z की सोच और प्राथमिकताओं को समझने में पीछे रह गई।
थरूर की इस टिप्पणी को कई जगहों पर इस तरह पेश किया गया कि उन्होंने राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम को असफल बताया है। इसके बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं में कांग्रेस के भीतर मतभेद की अटकलें भी लगने लगीं। हालांकि, थरूर की सफाई के बाद यह स्पष्ट करने की कोशिश की गई कि उनका उद्देश्य राहुल गांधी के अभियान को खारिज करना नहीं था, बल्कि उसके प्रभाव और युवाओं के साथ राजनीतिक जुड़ाव के तरीके पर विचार करना था।
CJP आंदोलन का भी किया था जिक्र
थरूर की मूल टिप्पणी में हालिया CJP छात्र आंदोलन का संदर्भ भी आया था। उन्होंने कहा था कि जिन मुद्दों को लेकर छात्र सड़कों पर उतरे, उनमें से कई मुद्दे कांग्रेस और राहुल गांधी पहले से उठा रहे थे। इसके बावजूद आंदोलन को युवाओं और आम लोगों के बीच जिस तरह की प्रतिक्रिया मिली, उस पर पार्टी को आत्ममंथन करना चाहिए।
उनका सवाल मूल रूप से यह था कि यदि राजनीतिक दल किसी मुद्दे को लंबे समय से उठा रहे हैं, लेकिन उसी मुद्दे पर छात्रों का स्वतंत्र आंदोलन ज्यादा प्रभावशाली नजर आता है, तो राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति पर विचार करना चाहिए। थरूर ने इसे युवाओं की बदलती राजनीतिक सोच को समझने के संदर्भ में रखा था।
Gen-Z को लेकर क्या बोले थरूर?
शशि थरूर ने यह भी रेखांकित किया कि आने वाले समय में Gen-Z और Gen-Alpha की राजनीतिक भूमिका काफी महत्वपूर्ण होने वाली है। हालिया छात्र आंदोलनों को उन्होंने राजनीतिक दलों के लिए एक तरह का चेतावनी संकेत बताते हुए कहा कि युवाओं की आवाज को गंभीरता से सुनने की जरूरत है।
थरूर के मुताबिक, आज की युवा पीढ़ी पहले की तुलना में अधिक डिजिटल रूप से जुड़ी हुई है और अपने मुद्दों को सोशल मीडिया तथा दूसरे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए तेजी से सामने रख सकती है। ऐसे में राजनीतिक दलों के लिए केवल भाषण या पारंपरिक प्रचार के माध्यम से युवाओं तक पहुंचना पर्याप्त नहीं हो सकता।
राहुल गांधी का ‘छात्रों की गूंज’ अभियान
राहुल गांधी का ‘छात्रों की गूंज’ अभियान देश के छात्रों और युवाओं से जुड़े मुद्दों को सामने लाने के उद्देश्य से चलाया जा रहा है। इसमें पेपर लीक, बेरोजगारी, महंगी शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं की अनियमितताओं और युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता दी जा रही है। शनिवार को प्रयागराज में हुए कार्यक्रम में राहुल गांधी ने युवाओं की समस्याओं और शिक्षा व्यवस्था को लेकर केंद्र सरकार पर भी निशाना साधा।
इस अभियान के तहत अलग-अलग स्थानों पर छात्रों के साथ संवाद और कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। कांग्रेस का दावा है कि इसका उद्देश्य युवाओं की समस्याओं को राजनीतिक बहस के केंद्र में लाना है।
BJP ने भी साधा निशाना
थरूर की शुरुआती टिप्पणी के बाद कांग्रेस के राजनीतिक विरोधियों को भी हमला बोलने का मौका मिला। वहीं, केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने राहुल गांधी के प्रयागराज कार्यक्रम को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्हें रांची जाकर वहां आंदोलन कर रहे छात्रों से मिलना चाहिए था। रांची में JPSC और JSSC से जुड़ी कथित अनियमितताओं को लेकर छात्र आंदोलन जारी है।
इस पूरे घटनाक्रम से साफ है कि छात्र आंदोलन और Gen-Z की राजनीतिक भूमिका अब राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण मुद्दा बन चुकी है। थरूर की सफाई के बाद विवाद को शांत करने की कोशिश जरूर हुई है, लेकिन उनके सवाल ने कांग्रेस के सामने एक बड़ा मुद्दा जरूर रखा है कि वह देश के युवा मतदाताओं के साथ अपना संवाद किस तरह और अधिक प्रभावी बनाए।
आने वाले वर्षों में Gen-Z की बढ़ती राजनीतिक हिस्सेदारी को देखते हुए यह मुद्दा और महत्वपूर्ण हो सकता है। ऐसे में थरूर की टिप्पणी को केवल एक बयान के विवाद के रूप में नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों द्वारा युवा वर्ग के साथ संवाद की रणनीति पर चल रही व्यापक बहस के रूप में भी देखा जा रहा है।