‘सुन्नी NATO’ बनाने वाला पाकिस्तान कैसे जीतेगा ‘शिया ईरान’ का भरोसा? नकवी के तेहरान दौरे पर क्यों टिकी नजर

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नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच पाकिस्तान एक बार फिर खुद को ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी बुधवार को तेहरान पहुंचे, जहां उन्होंने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और विदेश मंत्री अब्बास अराघची समेत शीर्ष नेताओं से मुलाकात की। पाकिस्तान का उद्देश्य ईरान-अमेरिका के बीच बातचीत को दोबारा शुरू कराने और क्षेत्र में तनाव कम करने के प्रयासों को आगे बढ़ाना है। 

लेकिन पाकिस्तान की इस कूटनीतिक कोशिश के सामने एक बड़ी चुनौती भी है। हाल ही में पाकिस्तान ने सऊदी अरब और तुर्की के साथ एक नए आपसी रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते को कई विश्लेषक ‘इस्लामिक NATO’ या ‘सुन्नी NATO’ जैसे नामों से जोड़कर देख रहे हैं। दूसरी ओर, ईरान खुद को इस नए सुरक्षा समीकरण से अलग पाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि पाकिस्तान एक तरफ सऊदी अरब और तुर्की के साथ सुरक्षा साझेदारी मजबूत करते हुए दूसरी तरफ शिया बहुल ईरान का भरोसा कैसे कायम रखेगा?

नकवी का तेहरान दौरा क्यों महत्वपूर्ण?

मोहसिन नकवी का मौजूदा तेहरान दौरा केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है। पाकिस्तान लंबे समय से ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता की कोशिश कर रहा है। अप्रैल में इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत भी हुई थी, हालांकि उस समय किसी व्यापक समझौते तक पहुंचना संभव नहीं हुआ था।

अब पश्चिम एशिया में तनाव फिर बढ़ने के बाद पाकिस्तान इस कूटनीतिक पहल को दोबारा सक्रिय करने की कोशिश कर रहा है। नकवी ने ईरानी नेतृत्व से मुलाकात कर क्षेत्रीय सुरक्षा और संघर्ष को कम करने के रास्तों पर चर्चा की है।

पाकिस्तानी विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भी संकेत दिया है कि संघर्षरत पक्ष किसी तरह की व्यवस्था या समझौते के करीब पहुंच सकते हैं। ऐसे में इस्लामाबाद खुद को एक ऐसे देश के रूप में पेश करना चाहता है, जो दोनों पक्षों के साथ संवाद कर सकता है।

‘सुन्नी NATO’ से ईरान क्यों चिंतित हो सकता है?

पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की तीनों मुस्लिम बहुल देश हैं, लेकिन क्षेत्रीय राजनीति में इनके हित हमेशा एक जैसे नहीं रहे हैं। नए रक्षा समझौते के तहत किसी एक सदस्य पर हमला होने की स्थिति में दूसरे देशों की सहायता की व्यवस्था की गई है।

इस समझौते को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह ऐसे समय में हुआ है जब पश्चिम एशिया में ईरान और उसके विरोधी देशों के बीच तनाव काफी बढ़ा हुआ है। विश्लेषकों के एक वर्ग ने इसे क्षेत्र में नया सुरक्षा ढांचा बनाने की कोशिश बताया है।

ईरान के लिए सबसे बड़ा सवाल यह हो सकता है कि अगर भविष्य में सऊदी अरब और ईरान के बीच तनाव बढ़ता है तो पाकिस्तान किस पक्ष में खड़ा होगा।

यही विरोधाभास नकवी की तेहरान यात्रा को महत्वपूर्ण बनाता है।

पाकिस्तान के सामने दोहरी कूटनीतिक चुनौती

पाकिस्तान के लिए ईरान के साथ संबंध सिर्फ धार्मिक पहचान का मामला नहीं है। दोनों देशों के बीच लगभग 900 किलोमीटर लंबी सीमा है और व्यापार, सुरक्षा तथा सीमा प्रबंधन जैसे मुद्दे सीधे तौर पर एक-दूसरे से जुड़े हैं।

इसके अलावा पाकिस्तान के लिए सऊदी अरब भी बेहद महत्वपूर्ण साझेदार है। आर्थिक, सैन्य और राजनीतिक संबंधों के कारण इस्लामाबाद रियाद से दूरी नहीं बना सकता।

ऐसे में पाकिस्तान को ऐसी विदेश नीति अपनानी होगी जिसमें वह सऊदी अरब के साथ रणनीतिक संबंध भी बनाए रखे और ईरान को यह भरोसा भी दिलाए कि उसके खिलाफ कोई क्षेत्रीय मोर्चा बनाने में पाकिस्तान की भूमिका नहीं है।

ईरान का भरोसा कैसे जीतेगा पाकिस्तान?

ईरान का विश्वास हासिल करने के लिए पाकिस्तान के पास सबसे बड़ा हथियार संवाद और भौगोलिक निकटता है। दोनों देशों के बीच लंबे समय से राजनयिक संबंध हैं और पाकिस्तान पहले भी ईरान तथा पश्चिमी देशों के बीच संवाद के लिए चैनल उपलब्ध कराता रहा है।

2026 में पाकिस्तान ने अमेरिका-ईरान संघर्ष के दौरान मध्यस्थता की भूमिका निभाई थी और इस्लामाबाद में बातचीत की मेजबानी भी की थी। पाकिस्तान का तर्क यही है कि वह किसी एक पक्ष का सैन्य सहयोगी बनने के बजाय बातचीत के रास्ते खुले रखना चाहता है।

नकवी की मौजूदा यात्रा इसी संदेश को मजबूत करने की कोशिश मानी जा रही है।

नकवी ने ईरान को क्या समझाया?

ईरानी मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, नकवी ने तेहरान में पाकिस्तान और ईरान के बीच संबंधों के साथ-साथ क्षेत्रीय सुरक्षा पर चर्चा की। इस दौरान पाकिस्तान के हालिया सऊदी-तुर्की रक्षा समझौते को लेकर भी जानकारी साझा की गई।

यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पाकिस्तान नहीं चाहता कि ईरान नए रक्षा समझौते को अपने खिलाफ बने किसी गठबंधन के रूप में देखे।

इस्लामाबाद की कोशिश संभवतः यह समझाने की होगी कि सऊदी अरब और तुर्की के साथ रक्षा संबंधों का मतलब ईरान के खिलाफ सैन्य मोर्चा बनाना नहीं है।

पाकिस्तान को किस संतुलन की जरूरत?

पाकिस्तान की कूटनीति का असली परीक्षण यहीं है। अगर वह ईरान के बहुत करीब जाता है तो सऊदी अरब और अन्य खाड़ी साझेदारों के साथ उसके संबंध प्रभावित हो सकते हैं। वहीं, अगर वह सऊदी-तुर्की सुरक्षा ढांचे में बहुत ज्यादा सक्रिय दिखाई देता है तो तेहरान का भरोसा कमजोर हो सकता है।

इसलिए पाकिस्तान के लिए रणनीतिक संतुलन बेहद जरूरी है।

एक तरफ वह ईरान को यह संदेश देना चाहता है कि वह उसकी सुरक्षा चिंताओं को समझता है, वहीं दूसरी तरफ रियाद को भी यह भरोसा दिलाना चाहता है कि पाकिस्तान की ईरान के साथ बातचीत सऊदी हितों के खिलाफ नहीं है।

भारत के लिए भी महत्वपूर्ण घटनाक्रम

पश्चिम एशिया में पाकिस्तान की बढ़ती कूटनीतिक भूमिका का असर भारत पर भी पड़ सकता है। भारत के ईरान के साथ ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध हैं। खास तौर पर चाबहार पोर्ट भारत के लिए मध्य एशिया तक पहुंच का महत्वपूर्ण मार्ग है।

अगर पाकिस्तान ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थ के रूप में अपनी भूमिका मजबूत करता है, तो क्षेत्रीय कूटनीति में उसका महत्व बढ़ सकता है। हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि भारत और पाकिस्तान की पश्चिम एशिया को लेकर रणनीतिक प्राथमिकताएं अलग हैं।

क्या ईरान पाकिस्तान पर भरोसा करेगा?

यह सबसे बड़ा सवाल है और इसका जवाब फिलहाल स्पष्ट नहीं है। पाकिस्तान के पास ईरान से संवाद करने के लिए मजबूत भौगोलिक और ऐतिहासिक आधार जरूर है, लेकिन सऊदी अरब और तुर्की के साथ नए रक्षा समझौते ने उसकी स्थिति को जटिल बना दिया है।

ईरान शायद पाकिस्तान की बात सुने, लेकिन वास्तविक भरोसा इस बात पर निर्भर करेगा कि संकट की स्थिति में पाकिस्तान व्यवहार में किस तरह की नीति अपनाता है।

सिर्फ कूटनीतिक बयान और मुलाकातें भरोसा कायम करने के लिए पर्याप्त नहीं होंगी। तेहरान यह देखेगा कि इस्लामाबाद अपने नए सुरक्षा साझेदारों के साथ संबंधों और ईरान के साथ अपनी पुरानी साझेदारी के बीच किस तरह संतुलन बनाता है।

मध्यस्थ की भूमिका कितनी सफल होगी?

पाकिस्तान ने पिछले कुछ महीनों में खुद को एक संभावित मध्यस्थ के तौर पर पेश करने में काफी सक्रियता दिखाई है। इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान वार्ता की मेजबानी और अब नकवी का तेहरान दौरा इसी रणनीति का हिस्सा है।

लेकिन मध्यस्थ की भूमिका तभी सफल होती है जब दोनों पक्ष मध्यस्थ को निष्पक्ष और विश्वसनीय मानें। पाकिस्तान के लिए यही सबसे बड़ी परीक्षा है।

एक तरफ ‘सुन्नी NATO’ जैसी छवि वाला नया रक्षा समीकरण है, दूसरी तरफ शिया बहुल ईरान के साथ पुराने संबंध। इन दोनों के बीच संतुलन बनाना पाकिस्तान की मौजूदा विदेश नीति की सबसे कठिन चुनौतियों में से एक है।

निष्कर्ष

मोहसिन नकवी का तेहरान दौरा सिर्फ एक मंत्री की विदेश यात्रा नहीं है, बल्कि पाकिस्तान की बदलती पश्चिम एशिया नीति का महत्वपूर्ण संकेत है। इस्लामाबाद अमेरिका-ईरान तनाव में मध्यस्थ की भूमिका निभाकर अपनी कूटनीतिक अहमियत बढ़ाना चाहता है।

लेकिन उसके सामने विरोधाभास भी साफ है। सऊदी अरब और तुर्की के साथ नया रक्षा समझौता पाकिस्तान को ईरान के सामने कठिन सवालों में डाल सकता है। अब पाकिस्तान को यह साबित करना होगा कि उसकी सऊदी-तुर्की साझेदारी ईरान विरोधी सैन्य गठबंधन नहीं है और वह तेहरान के साथ स्वतंत्र एवं भरोसेमंद संवाद बनाए रख सकता है।

नकवी की तेहरान यात्रा से फिलहाल इतना जरूर साफ है कि पाकिस्तान पश्चिम एशिया के इस संकट में सिर्फ दर्शक बनकर नहीं रहना चाहता। वह खुद को मध्यस्थ, संवादकर्ता और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन में अहम खिलाड़ी के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।

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