राम मंदिर में झूलनोत्सव के बीच बदला अर्चकों का पहनावा, पीले उत्तरीय वस्त्र में दिखे पुजारी

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अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में धार्मिक व्यवस्थाओं को लेकर एक नया बदलाव लागू किया गया है। मंदिर में पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान कराने वाले अर्चकों के लिए नया ड्रेस कोड प्रभावी कर दिया गया है। श्रावण शुक्ल तृतीया से लागू हुई इस नई व्यवस्था के तहत अर्चक अब पीले रंग के उत्तरीय वस्त्र धारण कर धार्मिक सेवाएं करते दिखाई दे रहे हैं। शुक्रवार दोपहर की दूसरी पाली से यह बदलाव पूरी तरह प्रभावी नजर आया। मंदिर में चल रहे झूलनोत्सव के दौरान भी अर्चकों ने इसी निर्धारित वेशभूषा में पूजा और अन्य धार्मिक प्रक्रियाएं संपन्न कराईं।

नए ड्रेस कोड का उद्देश्य केवल अर्चकों के पहनावे में बदलाव करना नहीं माना जा रहा है, बल्कि इसके पीछे मंदिर की धार्मिक मर्यादा, अनुशासन और परंपरागत स्वरूप को अधिक व्यवस्थित रूप देने की सोच भी जुड़ी हुई है। मंदिर में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं और यहां होने वाली पूजा, आरती तथा अन्य धार्मिक गतिविधियों का अपना निर्धारित विधान है। ऐसे में अर्चकों की वेशभूषा में एकरूपता मंदिर की धार्मिक व्यवस्था को एक विशिष्ट पहचान देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

नई व्यवस्था लागू होने के बाद मंदिर में अर्चकों के पहनावे में स्पष्ट समानता दिखाई देने लगी है। दैनिक पूजा, आरती और दूसरे धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान अर्चक पीले उत्तरीय वस्त्र धारण कर रहे हैं। इससे मंदिर में धार्मिक सेवाएं करने वाले अर्चकों की पहचान भी एक समान स्वरूप में दिखाई देती है। मंदिर प्रशासन और धार्मिक व्यवस्था से जुड़े लोगों के लिए वेशभूषा में यह एकरूपता अनुशासन और गरिमा बनाए रखने का माध्यम मानी जा रही है।

इस बदलाव का समय भी विशेष माना जा रहा है, क्योंकि अयोध्या के राम मंदिर में इन दिनों झूलनोत्सव का आयोजन चल रहा है। झूलनोत्सव के दौरान श्रीरामलला की चल प्रतिमा को विशेष धार्मिक विधि-विधान के साथ पालकी में विराजमान कराया जाता है और इसके बाद उसे झूला बिहार के लिए ले जाया जाता है। इसी प्रक्रिया से पहले अर्चकों ने नए पीले उत्तरीय वस्त्र धारण कर पूजा-अर्चना की। मंत्रोच्चार और वैदिक अनुष्ठानों के बीच चल प्रतिमा को फूलों से सजी पालकी में विराजमान कराया गया। इस धार्मिक आयोजन के दौरान नए ड्रेस कोड का असर स्पष्ट रूप से देखने को मिला।

मंदिर की धार्मिक समिति ने अर्चकों के लिए इस वेशभूषा को निर्धारित किया है। यह व्यवस्था रामानंदाचार्य परंपरा और वैष्णव धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप अर्चकों के आचरण तथा पहनावे को व्यवस्थित करने की दिशा में उठाया गया कदम बताया जा रहा है। राम मंदिर में पूजा पद्धति को लेकर पहले से ही परंपरा, धार्मिक शुचिता और निर्धारित नियमों पर विशेष जोर दिया जाता रहा है। इसी व्यापक व्यवस्था के तहत अर्चकों की वेशभूषा को भी एक निर्धारित स्वरूप देने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई है।

राम मंदिर में अर्चकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। मंदिर में होने वाली दैनिक पूजा, आरती, धार्मिक अनुष्ठान और अन्य निर्धारित सेवाओं को संपन्न कराने में अर्चक सीधे तौर पर जुड़े होते हैं। इसलिए उनकी वेशभूषा और आचरण को मंदिर की धार्मिक व्यवस्था का हिस्सा माना जाता है। नए ड्रेस कोड के माध्यम से इस भूमिका को एक समान और अनुशासित स्वरूप देने का प्रयास किया गया है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी यह बदलाव आसानी से दिखाई देने वाला है, क्योंकि धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान अर्चकों का पहनावा अब एक निर्धारित रंग और शैली में नजर आएगा।

पीला रंग भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में विशेष महत्व रखता है। हालांकि किसी विशेष मंदिर में किसी रंग के चयन के पीछे अलग-अलग धार्मिक और परंपरागत कारण हो सकते हैं, लेकिन सामान्य रूप से पीला रंग शुभता, धार्मिकता और पवित्रता से जोड़ा जाता है। राम मंदिर में अर्चकों के लिए पीले उत्तरीय वस्त्र का निर्धारण इसी धार्मिक वातावरण के अनुरूप एक प्रतीकात्मक पहचान भी प्रदान करता है। इससे मंदिर की पूजा व्यवस्था में पारंपरिक स्वरूप और दृश्य एकरूपता दोनों को बढ़ावा मिलता है।

राम मंदिर में अर्चकों के ड्रेस कोड को लेकर इससे पहले भी बदलाव किए जा चुके हैं। वर्ष 2024 में मंदिर के पुजारियों के लिए भगवा पहनावे की जगह पीले रंग की पोशाक निर्धारित किए जाने की जानकारी सामने आई थी। उस व्यवस्था में पीली चौबंदी, पीली पगड़ी या साफा और पीली धोती जैसे पारंपरिक वस्त्र शामिल किए गए थे। चौबंदी में बटन के बजाय धागे का इस्तेमाल किया जाता है और पीली धोती सूती कपड़े के एक टुकड़े के रूप में कमर के चारों ओर बांधी जाती है। उस समय नए पुजारियों को पगड़ी बांधने का प्रशिक्षण भी दिए जाने की जानकारी सामने आई थी।

पुरानी व्यवस्था में भी मंदिर प्रशासन ने अर्चकों की वेशभूषा को केवल व्यक्तिगत पसंद तक सीमित रखने के बजाय एक निर्धारित स्वरूप देने की कोशिश की थी। इसका उद्देश्य अर्चकों की एक समान पहचान बनाना और मंदिर की धार्मिक व्यवस्था में अनुशासन कायम रखना बताया गया था। बाद में अब नए बदलाव के तहत पीले उत्तरीय वस्त्र को धार्मिक सेवाओं के दौरान निर्धारित पहनावे का हिस्सा बनाया गया है। इस तरह देखा जाए तो वर्तमान बदलाव मंदिर की वेशभूषा संबंधी व्यवस्था को आगे बढ़ाने वाली प्रक्रिया के रूप में सामने आया है।

राम मंदिर में अर्चकों के लिए केवल पहनावे से जुड़े नियम ही महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि उनके आचरण और धार्मिक कर्तव्यों से संबंधित व्यवस्थाएं भी पहले से निर्धारित रही हैं। वर्ष 2024 में सामने आई जानकारी के अनुसार, पुजारियों के लिए मंदिर में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर भी प्रतिबंध लगाया गया था। विशेष रूप से गर्भगृह में स्मार्टफोन ले जाने पर रोक का उद्देश्य सुरक्षा और धार्मिक व्यवस्था बनाए रखना बताया गया था।

इसके अलावा मंदिर की पूजा पद्धति को रामानंदीय परंपरा के अनुरूप व्यवस्थित करने की दिशा में भी पहले से प्रयास किए गए हैं। प्राण प्रतिष्ठा के बाद रामलला की पूजा-अर्चना के लिए मुख्य पुजारी, सहायक पुजारी और सेवादारों की धार्मिक भूमिका तथा उनके वस्त्र पहनने के तरीके समेत कई प्रक्रियाओं को निर्धारित करने की बात सामने आई थी। इसके लिए अर्चक प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की गई थी, ताकि मंदिर की पूजा व्यवस्था में प्रशिक्षित और निर्धारित धार्मिक पद्धति का पालन करने वाले अर्चकों की भूमिका सुनिश्चित की जा सके।

वर्तमान ड्रेस कोड को इसी व्यापक धार्मिक अनुशासन की कड़ी के रूप में देखा जा सकता है। मंदिर की धार्मिक समिति द्वारा निर्धारित वेशभूषा के बाद अब सभी अर्चकों का पहनावा अधिक एकरूप नजर आ रहा है। इससे मंदिर के भीतर होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान एक व्यवस्थित दृश्य भी बनता है। विशेष रूप से ऐसे अवसरों पर, जब मंदिर में कोई धार्मिक उत्सव या विशेष आयोजन चल रहा हो, निर्धारित वेशभूषा धार्मिक वातावरण को और अधिक औपचारिक स्वरूप प्रदान करती है।

झूलनोत्सव के दौरान इस नए ड्रेस कोड का लागू होना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मंदिर की नियमित पूजा व्यवस्था और विशेष धार्मिक आयोजनों दोनों में दिखाई दे रहा है। श्रीरामलला की चल प्रतिमा को पालकी में विराजमान कराने से पहले अर्चकों द्वारा नए पीले उत्तरीय वस्त्र पहनकर विधि-विधान से पूजा करना इस बदलाव का प्रत्यक्ष उदाहरण बना। फूलों से सजी पालकी, मंत्रोच्चार और वैदिक अनुष्ठानों के बीच अर्चकों की निर्धारित वेशभूषा ने पूरे आयोजन में धार्मिक अनुशासन की एकरूपता को सामने रखा।

मंदिर प्रशासन की ओर से आने वाले समय में धार्मिक व्यवस्थाओं से जुड़े अन्य नियमों को भी चरणबद्ध तरीके से प्रभावी किए जाने की तैयारी बताई गई है। इसका संकेत यह है कि अर्चकों की वेशभूषा में किया गया बदलाव अकेला प्रशासनिक निर्णय नहीं है, बल्कि मंदिर की धार्मिक व्यवस्था को व्यवस्थित करने की व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा है। पूजा पद्धति, अर्चकों का आचरण, धार्मिक अनुष्ठानों की प्रक्रिया और मंदिर की परंपराओं को निर्धारित स्वरूप में संचालित करने पर लगातार ध्यान दिया जा रहा है।

अयोध्या का राम मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ भारतीय संस्कृति और परंपरा का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां होने वाले प्रत्येक बड़े धार्मिक आयोजन में परंपरा और अनुशासन को विशेष महत्व दिया जाता है। ऐसे में अर्चकों की वेशभूषा में एकरूपता केवल बाहरी परिवर्तन नहीं है, बल्कि मंदिर की पहचान को व्यवस्थित रूप देने का एक माध्यम भी बन सकती है। पीले उत्तरीय वस्त्र में नजर आ रहे अर्चक अब मंदिर की दैनिक धार्मिक गतिविधियों के दौरान एक समान पहचान के साथ दिखाई देंगे।

नए ड्रेस कोड के लागू होने से मंदिर की धार्मिक व्यवस्था में एक नया दृश्य स्वरूप सामने आया है। झूलनोत्सव जैसे विशेष अवसर पर इसकी शुरुआत ने इसे श्रद्धालुओं के लिए भी खास तौर पर ध्यान देने योग्य बना दिया। हालांकि इस बदलाव का वास्तविक महत्व केवल पोशाक तक सीमित नहीं है। इसके पीछे मंदिर की धार्मिक समिति द्वारा परंपरा, आचरण और अनुशासन को निर्धारित स्वरूप में आगे बढ़ाने की कोशिश दिखाई देती है।

कुल मिलाकर, अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में अर्चकों के लिए पीले उत्तरीय वस्त्रों की नई व्यवस्था धार्मिक परंपरा और अनुशासन को अधिक स्पष्ट पहचान देने की दिशा में उठाया गया कदम है। श्रावण शुक्ल तृतीया से लागू हुई यह व्यवस्था अब मंदिर की दैनिक पूजा और विशेष धार्मिक आयोजनों में दिखाई दे रही है। झूलनोत्सव के दौरान नई वेशभूषा में अर्चकों की मौजूदगी ने इस बदलाव को सार्वजनिक रूप से भी सामने ला दिया। मंदिर की धार्मिक समिति द्वारा रामानंदाचार्य परंपरा और वैष्णव मान्यताओं के अनुरूप वेशभूषा निर्धारित किए जाने के साथ यह व्यवस्था आने वाले समय में राम मंदिर की धार्मिक पहचान का नियमित हिस्सा बनती दिखाई दे रही है।

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