कैलाश मानसरोवर यात्रा पर निकले 61 श्रद्धालुओं से संपर्क टूटा, मुंबई के डॉक्टर-दंपति भी शामिल; परिजनों ने लगाई मदद की गुहार

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नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में आई भीषण प्राकृतिक आपदा के बाद कैलाश मानसरोवर यात्रा पर निकले 61 भारतीय यात्रियों के एक समूह से संपर्क टूटने की खबर ने उनके परिवारों की चिंता बढ़ा दी है। इस दल का नेतृत्व मुंबई के अनुभवी डॉक्टर और पर्वतारोही डॉ. मिलिंद चितले कर रहे थे। उनके साथ उनकी पत्नी सहित कई अन्य यात्री भी थे। बाढ़ और संचार व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित होने के बाद समूह के सदस्यों से संपर्क नहीं हो पा रहा है।

इन यात्रियों को लेकर महाराष्ट्र और देश के अन्य हिस्सों में रहने वाले परिवार लगातार प्रशासन, विदेश मंत्रालय और नेपाल में मौजूद अधिकारियों से जानकारी जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। फिलहाल अधिकारियों ने इन सभी लोगों के साथ किसी अनहोनी की पुष्टि नहीं की है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उन्हें अभी “लापता” या “संपर्क से बाहर” माना जा रहा है, क्योंकि प्रभावित इलाके में मोबाइल और दूसरी संचार सेवाएं लगभग पूरी तरह बाधित हो चुकी हैं।

नेपाल और तिब्बत सीमा पर 26 अगस्त को आई भीषण फ्लैश फ्लड ने कई इलाकों में सड़क, पुल और संचार नेटवर्क को भारी नुकसान पहुंचाया। इसी रास्ते का इस्तेमाल कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाने वाले कई भारतीय समूह भी कर रहे थे। बाढ़ के बाद कई यात्रियों का संपर्क परिवार से टूट गया और यही स्थिति इस 61 सदस्यीय समूह के साथ भी सामने आई।

समूह में मुंबई, पुणे और देश के कुछ अन्य हिस्सों से आए यात्री शामिल बताए जा रहे हैं। इसलिए इसे केवल मुंबई के 61 यात्रियों का समूह कहना पूरी तरह सटीक नहीं होगा। हालांकि समूह का नेतृत्व मुंबई के डॉ. मिलिंद चितले कर रहे थे और इसमें कई मुंबई निवासी शामिल हैं।

61 यात्रियों के समूह का नेतृत्व कर रहे थे डॉ. मिलिंद चितले

इस समूह का नेतृत्व डॉ. मिलिंद पी. चितले कर रहे थे। वह मुंबई के अंधेरी क्षेत्र से जुड़े डॉक्टर और अनुभवी पर्वतारोही हैं। कई दशकों से हिमालयी अभियानों से जुड़े रहने के कारण उन्हें पर्वतीय यात्राओं का लंबा अनुभव है।

उन्होंने कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए 61 लोगों का यह दल आयोजित किया था। समूह 23 अगस्त के आसपास यात्रा पर निकला था और सितंबर के पहले सप्ताह में वापस लौटने की योजना थी।

लेकिन यात्रा के बीच ही नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में आई भीषण बाढ़ ने स्थिति बदल दी।

बाढ़ के बाद डॉ. चितले और उनके साथ यात्रा कर रहे लोगों से संपर्क नहीं हो सका।

उनके परिवार, मित्र और परिचित लगातार सुरक्षित होने की खबर का इंतजार कर रहे हैं।

डॉक्टर के साथ उनकी पत्नी भी यात्रा में

रिपोर्टों के अनुसार डॉ. मिलिंद चितले के साथ उनकी पत्नी भी इस यात्रा पर थीं।

अलग-अलग शुरुआती मीडिया रिपोर्टों में उनकी पत्नी के नाम को लेकर अलग विवरण सामने आए हैं। कुछ रिपोर्टों में उनका नाम मेघा बताया गया, जबकि अन्य विश्वसनीय रिपोर्टों में जान्हवी चितले का नाम सामने आया है। इस तरह के संकट में शुरुआती सूचनाओं में अंतर हो सकता है, इसलिए अंतिम पहचान प्रशासनिक सूची के आधार पर ही मानी जानी चाहिए।

डॉ. चितले और उनकी पत्नी से संपर्क टूटने की खबर सामने आने के बाद मुंबई में उनके जानने वालों के बीच भी चिंता का माहौल बन गया।

डॉ. चितले का स्थानीय क्षेत्र में लंबे समय से परिचय रहा है और उनके मरीज तथा पड़ोसी भी उनकी सुरक्षित वापसी की प्रार्थना कर रहे हैं।

30 साल से पर्वतारोहण से जुड़े रहे हैं डॉ. चितले

डॉ. मिलिंद चितले केवल चिकित्सक ही नहीं बल्कि लंबे समय से पर्वतारोहण और साहसिक अभियानों से जुड़े रहे हैं।

रिपोर्टों के अनुसार उन्हें करीब तीन दशक का पर्वतारोहण अनुभव है। वह हिमालय के अनेक कठिन रास्तों और अभियानों का हिस्सा रह चुके हैं।

उन्होंने ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में कई यात्राएं की हैं और एवरेस्ट अभियान के आयोजन से भी जुड़े रहे हैं।

उनकी इस पृष्ठभूमि के कारण परिवार और परिचितों को उम्मीद है कि कठिन परिस्थितियों में उनका अनुभव समूह के लिए सहायक साबित हुआ होगा।

हालांकि बाढ़ जैसी अचानक आने वाली प्राकृतिक आपदा के सामने अनुभव भी सीमित हो सकता है, खासकर तब जब सड़क, पुल और संचार व्यवस्था पूरी तरह टूट जाए।

आखिरी लोकेशन को लेकर जुटाई जा रही जानकारी

परिवारों और अधिकारियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि बाढ़ आने के समय 61 यात्रियों का समूह वास्तव में कहां मौजूद था।

कुछ रिपोर्टों में समूह की आखिरी ज्ञात लोकेशन नेपाल-तिब्बत सीमा के रसुवागढ़ी कस्टम्स या इमिग्रेशन क्षेत्र के आसपास बताई गई है।

इसी क्षेत्र में फ्लैश फ्लड ने बेहद गंभीर नुकसान पहुंचाया था।

इमिग्रेशन कार्यालय, सड़कें और सीमा से जुड़ा बुनियादी ढांचा बाढ़ की चपेट में आया।

अगर समूह उस समय इसी इलाके में था, तो संभव है कि संचार बंद होने के कारण उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा हो।

लेकिन जब तक किसी सरकारी एजेंसी से उनकी मौजूदा स्थिति की पुष्टि नहीं हो जाती, उनकी वास्तविक लोकेशन को लेकर निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

परिवारों की सबसे बड़ी परेशानी—फोन लगातार बंद

कई यात्रियों के परिजनों ने बताया कि बाढ़ के बाद से उनके फोन नहीं लग रहे।

किसी परिवार के लिए ऐसी स्थिति बेहद डरावनी होती है।

एक तरफ टेलीविजन और सोशल मीडिया पर बाढ़ से हुई तबाही की तस्वीरें दिखाई दे रही हैं, दूसरी तरफ उनके अपने सदस्य का फोन बंद है।

यही वजह है कि हर गुजरता घंटा परिवारों की चिंता बढ़ा रहा है।

हालांकि प्राकृतिक आपदा के बाद मोबाइल फोन बंद होना या नेटवर्क न मिलना अपने आप में किसी अनहोनी का सबूत नहीं है।

यदि मोबाइल टावर, बिजली लाइन या इंटरनेट नेटवर्क क्षतिग्रस्त हो गए हों तो सुरक्षित व्यक्ति भी कई दिनों तक परिवार से संपर्क नहीं कर सकता।

यही उम्मीद परिवारों को इस समय संभाले हुए है।

मुंबई के परिवार पहुंचे अधिकारियों तक

कई परिवारों ने विदेश मंत्रालय, महाराष्ट्र सरकार और नेपाल में भारतीय दूतावास से संपर्क किया है।

परिजन यात्रियों का नाम, पासपोर्ट विवरण, मोबाइल नंबर और यात्रा से जुड़ी दूसरी जानकारी अधिकारियों को उपलब्ध करा रहे हैं।

इस तरह की जानकारी बचाव एजेंसियों को प्रभावित क्षेत्र में भारतीय नागरिकों का पता लगाने में मदद कर सकती है।

कुछ परिवारों ने खुद नेपाल जाने का फैसला भी किया है ताकि वहां से अधिक जानकारी जुटाई जा सके।

परिजनों के लिए घर बैठकर केवल फोन का इंतजार करना बेहद कठिन हो गया है।

एक वरिष्ठ नागरिक के बेटे का बढ़ा इंतजार

इस समूह में कल्याण के रहने वाले एक वरिष्ठ नागरिक सुनील सुदर्शन सुभेदार भी शामिल बताए गए हैं।

उनके बेटे स्वानंद सुभेदार ने मीडिया को बताया कि बुधवार शाम के बाद पिता से संपर्क नहीं हो पाया।

उन्होंने लगातार फोन और अधिकारियों के हेल्पलाइन नंबरों पर संपर्क करने की कोशिश की।

परिवार के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि उन्हें पिता की लोकेशन के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिल रही।

ऐसी ही स्थिति इस समूह के कई दूसरे परिवारों की भी है।

अविनाश मर्चेंट के परिजन भी परेशान

समूह में अविनाश मर्चेंट नाम के यात्री के शामिल होने की जानकारी भी सामने आई है।

उनके परिवार के सदस्य भी अलग-अलग स्रोतों से जानकारी जुटाने की कोशिश कर रहे हैं।

परिवार ने नेपाल के अधिकारियों और भारत के विदेश मंत्रालय तक जानकारी पहुंचाई है।

परिजनों का कहना है कि उन्हें अभी भी उम्मीद है कि उनका सदस्य सुरक्षित है और केवल नेटवर्क की समस्या के कारण संपर्क नहीं हो पा रहा।

यही उम्मीद इस पूरे संकट में सबसे बड़ा सहारा बनी हुई है।

हैदराबाद और चेन्नई से जुड़े यात्री भी दल में

यह दल केवल महाराष्ट्र के यात्रियों तक सीमित नहीं था।

रिपोर्टों में 33 वर्षीय आरुषि गुप्ता नाम की एक यात्री का भी जिक्र आया, जिनका संबंध हैदराबाद से बताया गया है।

उनकी आखिरी ज्ञात लोकेशन भी रसुवा कस्टम्स ऑफिस के आसपास बताई गई।

इसी तरह दक्षिण भारत से जुड़े वेंकटरम अन्नमदेवरा और अनघा अन्नमदेवरा के नाम भी सामने आए हैं।

उनके परिजनों ने भी केंद्र सरकार से मदद की अपील की है।

इससे साफ है कि 61 सदस्यीय समूह में देश के कई क्षेत्रों के लोग शामिल थे।

आखिरी कॉल में कहा था—आगे की यात्रा शुरू कर रहे हैं

कुछ परिवारों की अपने सदस्यों से आखिरी बातचीत 26 अगस्त की सुबह हुई थी।

एक परिवार के अनुसार उनके सदस्य ने सुबह करीब 7 बजे अपनी बेटी से बात की थी और कहा था कि वे आगे की यात्रा शुरू कर रहे हैं।

इसके बाद उनसे कोई संपर्क नहीं हुआ।

इसी दिन सीमा क्षेत्र में अचानक फ्लैश फ्लड आई।

इस समय का मेल परिवारों की चिंता और बढ़ा रहा है।

लेकिन यह भी संभव है कि समूह बाढ़ के मुख्य प्रवाह से पहले किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंच गया हो और अब केवल संपर्क के साधनों से कट गया हो।

यही कारण है कि आधिकारिक पुष्टि का इंतजार बेहद महत्वपूर्ण है।

क्या 61 लोग वास्तव में ‘लापता’ हैं?

खबर को समझते समय इस शब्द का सावधानी से इस्तेमाल जरूरी है।

प्रशासनिक और मीडिया रिपोर्टों में इन यात्रियों के लिए “untraceable”, “unreachable” और “missing” जैसे शब्द इस्तेमाल किए गए हैं।

लेकिन इनका अर्थ हमेशा एक जैसा नहीं होता।

“Unreachable” का मतलब है कि उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा।

“Untraceable” का मतलब है कि उनकी मौजूदा लोकेशन स्थापित नहीं हो सकी है।

जबकि “missing” का इस्तेमाल आम भाषा में इन दोनों स्थितियों के लिए भी कर दिया जाता है।

इसलिए अभी सबसे सटीक स्थिति यही है कि समूह से संपर्क टूट गया है और उसकी मौजूदा लोकेशन की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।

बाढ़ ने संचार नेटवर्क को किया तबाह

नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई बाढ़ ने टेलीफोन और इंटरनेट नेटवर्क को व्यापक नुकसान पहुंचाया है।

अधिकारियों के अनुसार प्रभावित क्षेत्रों में स्थलीय संचार लगभग पूरी तरह ठप रहा।

यही वजह है कि सिर्फ इस समूह के नहीं बल्कि सैकड़ों अन्य यात्रियों और स्थानीय लोगों के बारे में भी शुरुआती दिनों में स्पष्ट जानकारी नहीं मिल सकी।

महाराष्ट्र आपदा प्रबंधन विभाग ने भी कहा कि संचार व्यवस्था टूटने के कारण लापता या संपर्क से बाहर लोगों का आंकड़ा बदल सकता है।

जैसे-जैसे राहत एजेंसियां प्रभावित इलाकों तक पहुंचेंगी, अधिक स्पष्ट जानकारी सामने आने की उम्मीद है।

महाराष्ट्र के 114 यात्रियों की पहचान

महाराष्ट्र सरकार ने नेपाल-तिब्बत क्षेत्र में मौजूद कम से कम 114 यात्रियों की जानकारी जुटाई थी।

इनमें से 61 लोगों से संपर्क नहीं होने की सूचना सामने आई।

वहीं कई दूसरे समूहों से बाद में संपर्क स्थापित हुआ और उनके सुरक्षित होने की पुष्टि मिली।

कुछ यात्रियों से अधिकारियों ने फोन पर बात भी की।

इससे यह उम्मीद बढ़ती है कि संपर्क टूटना केवल संचार समस्या से भी जुड़ा हो सकता है।

199 अन्य लोगों से संपर्क स्थापित

महाराष्ट्र के आपदा प्रबंधन अधिकारियों के अनुसार, अलग-अलग समूहों में यात्रा कर रहे कई लोगों से बाद में संपर्क स्थापित किया गया।

एक समय पर 199 लोगों से संपर्क होने और उनके सुरक्षित होने की जानकारी दी गई।

इनमें तिब्बत में मौजूद करीब 150 लोगों का एक बड़ा समूह भी शामिल था।

इस तरह राहत एजेंसियां कई समूहों की स्थिति का धीरे-धीरे पता लगाने में सफल हो रही हैं।

यही कारण है कि 61 सदस्यीय समूह के परिवार भी सकारात्मक खबर की उम्मीद बनाए हुए हैं।

हैम रेडियो ऑपरेटरों की भी मदद

संचार नेटवर्क टूटने के बाद अधिकारियों ने वैकल्पिक माध्यमों का सहारा लेने की कोशिश की।

रिपोर्टों के अनुसार हैम रेडियो ऑपरेटरों से भी मदद मांगी गई।

आपदा के दौरान जब मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट बंद हो जाए तो हैम रेडियो जैसी तकनीक बेहद उपयोगी हो सकती है।

इसके जरिए सीमित लेकिन महत्वपूर्ण संदेश दूर तक भेजे जा सकते हैं।

सरकार ऐसे सभी माध्यमों का इस्तेमाल कर प्रभावित यात्रियों से संपर्क स्थापित करने की कोशिश कर रही है।

24 घंटे का कंट्रोल रूम

महाराष्ट्र सरकार ने यात्रियों की जानकारी जुटाने के लिए 24 घंटे काम करने वाला आपदा प्रबंधन कंट्रोल रूम सक्रिय किया।

परिवारों से कहा गया कि अगर उनके किसी सदस्य से संपर्क नहीं हो पा रहा है तो उसकी पूरी जानकारी प्रशासन को दें।

इसमें नाम, आयु, पासपोर्ट विवरण, अंतिम संपर्क और यात्रा समूह की जानकारी शामिल हो सकती है।

ऐसा डेटा केंद्र सरकार और नेपाल में मौजूद भारतीय अधिकारियों तक पहुंचाया जा रहा है।

केंद्र सरकार और MEA से समन्वय

नेपाल और तिब्बत में फंसे या संपर्क से बाहर भारतीय यात्रियों को लेकर विदेश मंत्रालय की भूमिका महत्वपूर्ण है।

राज्य सरकारें अपने नागरिकों की जानकारी विदेश मंत्रालय को भेज रही हैं।

इसके बाद भारतीय दूतावास स्थानीय प्रशासन और संबंधित एजेंसियों के साथ मिलकर उनकी स्थिति का पता लगाने की कोशिश करता है।

61 सदस्यों वाले इस समूह के मामले में भी परिवारों ने विदेश मंत्रालय से मदद की मांग की है।

बचाव अभियान में कठिन भूगोल बड़ी समस्या

कैलाश मानसरोवर यात्रा का मार्ग सामान्य पर्यटन मार्ग जैसा आसान नहीं है।

यह क्षेत्र ऊंचे पहाड़ों, संकरी घाटियों और कठिन मौसम के लिए जाना जाता है।

जब ऐसी जगह पर सड़कें और पुल टूट जाएं तो बचाव अभियान बेहद कठिन हो जाता है।

कई प्रभावित इलाकों में केवल हेलिकॉप्टर से पहुंचना संभव हो सकता है।

लेकिन खराब मौसम हेलिकॉप्टर उड़ानों को भी प्रभावित कर सकता है।

इसलिए किसी भी समूह की मौजूदा लोकेशन की पुष्टि और वहां मदद पहुंचाने में समय लग सकता है।

यात्रियों में बुजुर्ग भी शामिल

कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाने वाले समूहों में कई वरिष्ठ नागरिक भी शामिल होते हैं।

ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ऑक्सीजन की कमी और अचानक खराब मौसम पहले से ही स्वास्थ्य के लिए चुनौती होते हैं।

बाढ़ के बाद सड़क संपर्क और चिकित्सा सुविधाओं तक पहुंच टूटने से जोखिम और बढ़ सकता है।

यही वजह है कि परिवारों की चिंता केवल संपर्क टूटने तक सीमित नहीं है।

उन्हें अपने परिजनों के स्वास्थ्य और दवाइयों की भी चिंता है।

दूसरे समूहों ने मांगा हेलिकॉप्टर रेस्क्यू

नेपाल-तिब्बत क्षेत्र में फंसे दूसरे भारतीय यात्रियों ने भी तत्काल निकासी की अपील की।

पुणे के कुछ यात्रियों ने बताया कि उनके समूह के सदस्यों को ऊंचाई पर ऑक्सीजन की गंभीर समस्या हुई थी।

वे जिलोंग में फंसे थे और हेलिकॉप्टर के जरिए वापस आने की मांग कर रहे थे।

इससे यह पता चलता है कि बाढ़ के बाद केवल संपर्क ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य और वापसी के मार्ग भी बड़ी चुनौती बने हुए हैं।

कैलाश मानसरोवर यात्रा का कठिन रास्ता

कैलाश मानसरोवर यात्रा धार्मिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।

लेकिन यह दुनिया की कठिन तीर्थ यात्राओं में भी गिनी जाती है।

यात्रियों को ऊंचाई, कम ऑक्सीजन, अत्यधिक ठंड और कठिन रास्तों का सामना करना पड़ता है।

इसके बावजूद हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग धार्मिक आस्था के कारण इस यात्रा पर निकलते हैं।

नेपाल के रास्ते जाने वाले निजी यात्रा समूह भी इसी क्षेत्र से होकर गुजरते हैं।

इस बार प्राकृतिक आपदा ने बदली पूरी यात्रा

61 सदस्यीय समूह की यात्रा सामान्य कार्यक्रम के अनुसार आगे बढ़ रही थी।

उन्हें शायद इस बात का अंदाजा नहीं रहा होगा कि रास्ते में इतने बड़े स्तर की प्राकृतिक आपदा सामने आ जाएगी।

अचानक आई फ्लैश फ्लड ने सीमा चौकी, सड़कों और पुलों को प्रभावित किया।

इससे आगे और पीछे दोनों ओर का रास्ता बाधित हो सकता है।

ऐसी स्थिति में यात्रियों को जहां भी सुरक्षित स्थान मिले, वहां रुकना पड़ता है।

अनुभवी पर्वतारोही होने से परिवार को उम्मीद

डॉ. मिलिंद चितले के लंबे पर्वतारोहण अनुभव के कारण उनके परिवार और परिचित उम्मीद लगाए हुए हैं।

उन्होंने हिमालय में कई कठिन यात्राएं की हैं और आपात परिस्थितियों का सामना करने का अनुभव रखते हैं।

वह समूह का नेतृत्व कर रहे थे, इसलिए संभव है कि उन्होंने खतरा महसूस होने पर समूह को किसी सुरक्षित स्थान पर ले जाने की कोशिश की हो।

हालांकि यह केवल संभावित स्थिति है और इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

फिर भी परिवारों के लिए यही उम्मीद बेहद महत्वपूर्ण है।

मरीज भी कर रहे सुरक्षित वापसी की प्रार्थना

डॉ. चितले के अंधेरी स्थित क्लिनिक पर यात्रा के कारण बंद रहने की सूचना लगी थी।

इसमें बताया गया था कि डिस्पेंसरी 24 अगस्त से 6 सितंबर तक बंद रहेगी।

जब उनके लापता होने की खबर स्थानीय लोगों तक पहुंची तो कई मरीज और पड़ोसी हैरान रह गए।

जो लोग वर्षों से उन्हें डॉक्टर के रूप में जानते हैं, वे उनकी और उनके पूरे समूह की सुरक्षित वापसी की प्रार्थना कर रहे हैं।

1997 के एवरेस्ट अभियान से भी रहे जुड़े

डॉ. चितले का पर्वतारोहण सफर बेहद लंबा रहा है।

रिपोर्टों के अनुसार वह 1997 के एक एवरेस्ट अभियान की आयोजन समिति से भी जुड़े थे।

उन्होंने हिमालय में हजारों किलोमीटर की यात्राएं की हैं और कंचनजंगा क्षेत्र में भी ऊंचाई तक पहुंचे हैं।

उनका अनुभव उन्हें सामान्य यात्रा आयोजक से अलग बनाता है।

इसी वजह से पर्वतारोहण समुदाय में भी उनके लापता होने की खबर से चिंता है।

गिरीमित्र पुरस्कार से भी सम्मानित

डॉ. चितले को पर्वतारोहण के क्षेत्र में योगदान के लिए सम्मान भी मिल चुका है।

वह साहसिक खेल और पर्वतीय यात्राओं से जुड़े संगठन का संचालन करते रहे हैं।

लंबे समय से पर्वतारोहियों और यात्रियों के बीच उनकी पहचान अनुभवी व्यक्ति के रूप में रही है।

उनके मित्र और साथी पर्वतारोहियों का कहना है कि वह कठिन परिस्थितियों में सही निर्णय लेने का लंबा अनुभव रखते हैं।

क्या समूह ने सीमा पार कर ली थी?

परिवारों के लिए एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि क्या समूह फ्लैश फ्लड आने से पहले तिब्बत की तरफ पहुंच चुका था या अभी नेपाल की ओर मौजूद था।

इस बारे में अलग-अलग परिवारों की जानकारी में अंतर सामने आया है।

कुछ यात्रियों की आखिरी लोकेशन रसुवा कस्टम्स क्षेत्र बताई गई।

अगर समूह के सदस्य अलग-अलग वाहनों या छोटे समूहों में थे तो यह भी संभव है कि उनकी लोकेशन एक जैसी न रही हो।

इसी वजह से हर यात्री की पहचान और अंतिम ज्ञात स्थान अलग-अलग दर्ज करना जरूरी है।

परिवारों ने बनाया WhatsApp ग्रुप

लापता यात्रियों के परिवार आपस में भी संपर्क में हैं।

कुछ परिजनों ने व्हाट्सऐप ग्रुप बनाकर उपलब्ध जानकारी साझा करना शुरू किया।

इसमें किसी यात्री की आखिरी कॉल, लोकेशन, फोटो या अधिकारियों से मिला अपडेट साझा किया जा रहा है।

आपदा के समय परिवारों के बीच इस तरह का नेटवर्क जानकारी जुटाने में मदद कर सकता है।

हालांकि अपुष्ट सूचना फैलने का जोखिम भी रहता है, इसलिए आधिकारिक पुष्टि का इंतजार करना जरूरी है।

सोशल मीडिया से भी तलाश

कई परिवार सोशल मीडिया का सहारा लेकर अपने परिजनों की जानकारी मांग रहे हैं।

यात्रियों की तस्वीरें और नाम साझा कर लोगों से अपील की जा रही है कि अगर किसी ने उन्हें किसी राहत शिविर या सुरक्षित स्थान पर देखा हो तो सूचना दें।

दुनिया के दूसरे देशों से भी लापता यात्रियों के परिवार इसी तरह सोशल मीडिया पर मदद मांग रहे हैं।

आपदा के बाद कई बार किसी फोटो या वीडियो से किसी व्यक्ति की लोकेशन का सुराग मिल सकता है।

अभी अफवाहों से बचना जरूरी

ऐसी स्थिति में सोशल मीडिया पर कई अपुष्ट दावे भी सामने आ सकते हैं।

किसी लापता व्यक्ति के बारे में बिना पुष्टि के मौत या सुरक्षित होने की सूचना फैलाना परिवार के लिए बेहद तकलीफदेह हो सकता है।

इसलिए यात्रियों की स्थिति को लेकर केवल भारतीय दूतावास, राज्य सरकार, विदेश मंत्रालय या नेपाल की आधिकारिक एजेंसियों से मिली जानकारी पर भरोसा करना बेहतर है।

61 लोगों के परिवारों की एक ही मांग

इन सभी परिवारों की इस समय सबसे बड़ी मांग है कि उनके प्रियजनों का पता लगाया जाए।

उन्हें कोई मुआवजा या दूसरी सहायता अभी प्राथमिकता नहीं लग रही।

वे सिर्फ यह सुनना चाहते हैं कि उनके अपने सुरक्षित हैं।

कई परिवारों ने केंद्र और महाराष्ट्र सरकार से राहत एजेंसियों के जरिए तेजी से तलाश कराने की अपील की है।

उम्मीद क्यों अभी भी मजबूत है?

इसके पीछे सबसे बड़ा कारण संचार व्यवस्था का टूटना है।

नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में मोबाइल और इंटरनेट नेटवर्क बहुत बुरी तरह प्रभावित हुआ है।

कई दूसरे यात्री भी शुरुआत में संपर्क से बाहर थे, लेकिन बाद में सुरक्षित मिले।

इसी तरह कई समूहों से कुछ दिनों बाद संपर्क स्थापित हुआ।

इसलिए 61 सदस्यीय समूह के परिवारों को भी उम्मीद है कि उनके साथ भी ऐसा ही होगा।

लेकिन चिंता भी लगातार बढ़ रही

दूसरी तरफ आपदा के बड़े पैमाने ने परिवारों को डरा रखा है।

नेपाल और तिब्बत क्षेत्र में सैकड़ों लोगों की मौत और हजारों लोगों के लापता होने की खबरें सामने आई हैं।

सड़कें, पुल और कई इमारतें पूरी तरह बर्बाद हो चुकी हैं।

ऐसे में जितना समय बीत रहा है, चिंता उतनी ही बढ़ती जा रही है।

यही विरोधाभास परिवारों के लिए सबसे कठिन है—एक तरफ उम्मीद और दूसरी तरफ डर।

भारत के कई राज्यों से यात्री प्रभावित

इस प्राकृतिक आपदा में केवल महाराष्ट्र के यात्री प्रभावित नहीं हैं।

आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और अन्य राज्यों से भी कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए यात्रियों के संपर्क से बाहर होने की खबरें आई हैं।

सरकार अलग-अलग राज्यों से विवरण जुटा रही है।

इससे भारत के लिए राहत और निकासी अभियान का दायरा काफी बड़ा हो गया है।

भारतीय दूतावास की भूमिका महत्वपूर्ण

नेपाल में भारतीय दूतावास संकट के समय भारतीय नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण संपर्क केंद्र है।

दूतावास स्थानीय प्रशासन के साथ समन्वय करके यात्रियों की जानकारी जुटाता है।

यदि कोई भारतीय अस्पताल या राहत शिविर में है तो उसकी पहचान भी इस नेटवर्क के जरिए परिवार तक पहुंचाई जा सकती है।

61 सदस्यीय समूह के परिवार भी इसी व्यवस्था से खबर मिलने की उम्मीद कर रहे हैं।

रास्ते खुलने का इंतजार

बाढ़ से क्षतिग्रस्त क्षेत्रों में राहत कार्य का एक बड़ा हिस्सा सड़क संपर्क बहाल होने पर निर्भर करेगा।

जब तक बड़े पुल और सड़कें बंद हैं, लोगों को निकालना मुश्किल हो सकता है।

अस्थायी पुल, हेलिकॉप्टर और वैकल्पिक रास्तों का इस्तेमाल करना पड़ सकता है।

यह पूरी प्रक्रिया समय ले सकती है।

मौसम भी बड़ी चुनौती

हिमालयी क्षेत्र में मौसम तेजी से बदलता है।

बाढ़ के बाद भी बारिश, बादल और भूस्खलन राहत अभियान को प्रभावित कर सकते हैं।

हेलिकॉप्टर उड़ान के लिए साफ दृश्यता जरूरी होती है।

इसलिए खराब मौसम में बचाव दल चाहकर भी कुछ इलाकों तक नहीं पहुंच पाते।

परिजनों का इंतजार सबसे कठिन

सरकारी स्तर पर बचाव अभियान तकनीकी और प्रशासनिक चुनौती है।

लेकिन परिवारों के लिए यह भावनात्मक संकट है।

उनके लिए हर घंटा बेहद लंबा है।

हर बार फोन की घंटी बजती है तो उम्मीद होती है कि शायद कोई अच्छी खबर आए।

हर आधिकारिक अपडेट ध्यान से सुना जा रहा है।

किसी अनहोनी की अभी पुष्टि नहीं

इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात दोहराना जरूरी है कि 61 सदस्यीय समूह के सभी लोगों के साथ किसी अनहोनी की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

वे इस समय संपर्क से बाहर हैं और उनकी लोकेशन स्थापित करने की कोशिश की जा रही है।

इसलिए उन्हें मृत या निश्चित रूप से बाढ़ में बहा हुआ बताना गलत होगा।

सरकारी और बचाव एजेंसियों की खोज जारी है।

निष्कर्ष

कैलाश मानसरोवर यात्रा पर निकले 61 भारतीय यात्रियों के एक समूह से नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में आई भीषण बाढ़ के बाद संपर्क टूट गया है। इस समूह का नेतृत्व मुंबई के अनुभवी डॉक्टर और पर्वतारोही डॉ. मिलिंद चितले कर रहे थे। उनके साथ उनकी पत्नी और देश के अलग-अलग राज्यों से आए कई यात्री भी शामिल हैं।

रिपोर्टों के अनुसार, समूह 23 अगस्त के आसपास कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए निकला था। बाढ़ आने के समय कई यात्रियों की आखिरी ज्ञात लोकेशन रसुवा या रसुवागढ़ी कस्टम्स-इमिग्रेशन क्षेत्र के आसपास बताई गई है। यही वह क्षेत्र है जहां फ्लैश फ्लड ने सड़क, सीमा चौकी और संचार सुविधाओं को भारी नुकसान पहुंचाया।

महाराष्ट्र आपदा प्रबंधन विभाग के अनुसार नेपाल-तिब्बत क्षेत्र में राज्य के कम से कम 114 यात्रियों की जानकारी जुटाई गई थी, जिनमें से 61 लोगों से संपर्क नहीं हो पा रहा था। अधिकारियों का कहना है कि क्षेत्र में संचार व्यवस्था लगभग पूरी तरह ठप है, इसलिए संपर्क नहीं होना अपने आप किसी अनहोनी की पुष्टि नहीं करता।

सरकार ने विदेश मंत्रालय के साथ जानकारी साझा की है और वैकल्पिक संचार माध्यमों, यहां तक कि हैम रेडियो ऑपरेटरों की मदद लेने की कोशिश की जा रही है। महाराष्ट्र सरकार ने 24 घंटे का कंट्रोल रूम भी सक्रिय किया है, ताकि परिवार अपने लापता या संपर्क से बाहर परिजनों की जानकारी उपलब्ध करा सकें।

डॉ. मिलिंद चितले का नाम इस समूह के कारण विशेष रूप से चर्चा में है। वह कई दशकों से पर्वतारोहण से जुड़े रहे हैं और हिमालय के कठिन अभियानों का लंबा अनुभव रखते हैं। रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने 1997 के एवरेस्ट अभियान के आयोजन में भूमिका निभाई थी और कंचनजंगा क्षेत्र में भी ऊंचाई तक पर्वतारोहण किया है।

उनका यह अनुभव परिवारों के लिए उम्मीद की वजह बना हुआ है। परिजनों को भरोसा है कि संभव है समूह ने किसी सुरक्षित स्थान पर शरण ली हो और केवल संचार व्यवस्था टूटने के कारण उनका संपर्क नहीं हो पा रहा हो।

दूसरी तरफ, बाढ़ के बड़े पैमाने ने चिंताएं भी बढ़ा दी हैं। नेपाल-तिब्बत क्षेत्र में सड़कें, पुल और बुनियादी ढांचा नष्ट होने से राहत कार्य बेहद कठिन हो गया है। कई अन्य भारतीय समूह भी इस आपदा के बाद फंसे या संपर्क से बाहर रहे हैं। कुछ समूहों से बाद में संपर्क स्थापित हुआ और उनके सुरक्षित होने की पुष्टि भी हुई। यही बात परिवारों की उम्मीद बनाए हुए है।

इस समय सबसे जरूरी है कि 61 यात्रियों को लेकर बिना पुष्टि के कोई अफवाह न फैलाई जाए। “संपर्क से बाहर” और “किसी अनहोनी का शिकार” होना दो अलग बातें हैं। जब तक भारतीय दूतावास, विदेश मंत्रालय, महाराष्ट्र सरकार या नेपाल की एजेंसियां आधिकारिक जानकारी नहीं देतीं, किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना सही नहीं होगा।

मुंबई, पुणे, हैदराबाद, चेन्नई और अन्य जगहों पर इन यात्रियों के परिवार इसी उम्मीद में हैं कि जल्दी ही उनके फोन पर वह खबर आए जिसका वे कई दिनों से इंतजार कर रहे हैं—उनके अपने सुरक्षित हैं।

फिलहाल तलाश जारी है, परिवारों की प्रार्थनाएं जारी हैं और प्रशासन नेपाल तथा स्थानीय राहत एजेंसियों के जरिए संपर्क स्थापित करने में जुटा हुआ है।

कैलाश मानसरोवर की कठिन धार्मिक यात्रा पर निकले इन यात्रियों के लिए यह सफर अचानक एक बड़े प्राकृतिक संकट में बदल गया है। अब पूरे देश की नजर राहत अभियान पर है और परिजनों की एक ही गुहार है—61 लोगों का जल्द से जल्द पता लगाया जाए और उन्हें सुरक्षित घर वापस लाया जाए।

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