
स्वरा भास्कर के एक पुराने बयान पर फिर से विवाद शुरू होने के बाद करीब 700 साल पुरानी चित्तौड़ की कहानी और जौहर की परंपरा चर्चा में आ गई है। अभिनेत्री ने संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावत’ में दिखाए गए जौहर के दृश्य को लेकर सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि ऐसी प्रस्तुति यौन हिंसा से बची महिलाओं के लिए गलत संदेश दे सकती है। सोशल मीडिया पर उनके बयान का एक हिस्सा वायरल होने के बाद उन्हें आलोचनाओं का सामना करना पड़ा।
बाद में स्वरा भास्कर ने सफाई देते हुए कहा कि उन्होंने रानी पद्मावती या जौहर करने वाली महिलाओं को कायर नहीं कहा था। उनका सवाल फिल्म में जौहर के चित्रण और उससे निकलने वाले संदेश को लेकर था। उन्होंने कहा कि उनके बयान का गलत अनुवाद और गलत अर्थ निकालकर उन्हें निशाना बनाया जा रहा है।
इस विवाद के बीच एक बार फिर सवाल उठ रहा है कि आखिर जौहर क्या था? 1303 ईस्वी में चित्तौड़ में क्या हुआ था? क्या रानी पद्मावती वास्तव में ऐतिहासिक पात्र थीं और क्या उस समय जौहर हुआ था? इन सवालों का जवाब इतिहास और लोककथाओं के बीच मौजूद अंतर को समझे बिना देना मुश्किल है।
जौहर क्या होता था?
जौहर मध्यकालीन युद्धों से जुड़ी एक ऐसी प्रथा थी जिसमें किसी किले के हारने की स्थिति में वहां की महिलाएं सामूहिक रूप से अग्नि में प्रवेश कर अपने प्राण त्याग देती थीं। इसके पीछे मुख्य रूप से यह आशंका बताई जाती है कि युद्ध में हार के बाद महिलाओं को विजेता सेना द्वारा बंदी बनाया जा सकता है और उनके साथ हिंसा या जबरन व्यवहार हो सकता है।
राजपूत इतिहास में जौहर को अक्सर युद्ध के अंतिम चरण से जोड़ा जाता है। जब यह स्पष्ट हो जाता था कि किले की रक्षा अब संभव नहीं है, तब महिलाओं द्वारा जौहर और पुरुष योद्धाओं द्वारा अंतिम युद्ध को अलग-अलग परंपराओं के रूप में बताया गया है।
पुरुषों के अंतिम युद्ध को ‘साका’ कहा जाता था। इस स्थिति में योद्धा किले से बाहर निकलकर आखिरी लड़ाई लड़ते थे, जबकि महिलाएं जौहर करती थीं।
हालांकि आज के नजरिए से जौहर को समझते समय यह याद रखना जरूरी है कि यह मध्यकालीन युद्ध, सामाजिक संरचना और उस दौर की मान्यताओं से जुड़ी प्रथा थी। इसे आधुनिक समय के सामाजिक और कानूनी मूल्यों के आधार पर सीधे उसी अर्थ में देखना ऐतिहासिक संदर्भ को सरल बना सकता है।
1303 में चित्तौड़ पर हुआ हमला
1303 ईस्वी में दिल्ली सल्तनत के शासक अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़गढ़ पर हमला किया। उस समय चित्तौड़ पर गुहिल शासक रत्नसिंह का शासन था।
अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने चित्तौड़ के किले को घेर लिया। यह घेराबंदी कई महीनों तक चली और किले के रक्षकों ने लंबे समय तक प्रतिरोध किया। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, खिलजी की सेना ने किले को चारों तरफ से घेरकर हमला किया और घेराबंदी करीब आठ महीने तक चली।
चित्तौड़ उस समय मेवाड़ की सत्ता का महत्वपूर्ण केंद्र था। किले की भौगोलिक स्थिति और मजबूत सुरक्षा व्यवस्था के कारण उसे जीतना आसान नहीं था। लेकिन लंबे समय तक चलने वाली घेराबंदी से किले के अंदर खाद्यान्न और दूसरी जरूरी चीजों की कमी पैदा होने की स्थिति बनी।
आखिरकार 26 अगस्त 1303 को अलाउद्दीन खिलजी की सेना किले में दाखिल होने में सफल हुई। इसके बाद किले में बड़े पैमाने पर हिंसा और नरसंहार हुआ।
30 हजार लोगों के मारे जाने का दावा
चित्तौड़ विजय के बाद हुई हिंसा का उल्लेख उस दौर के लेखक अमीर खुसरो के लेखन में मिलता है। खुसरो अलाउद्दीन खिलजी के अभियान में उसके साथ थे और उन्होंने चित्तौड़ की विजय का विवरण लिखा था।
उनके विवरण में बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने का उल्लेख मिलता है और यह संख्या लगभग 30 हजार तक बताई गई है। हालांकि बाद के इतिहासकारों ने इस आंकड़े की सटीकता को लेकर सवाल उठाए हैं।
इसलिए इतिहासकारों के बीच यह सावधानी जरूरी मानी जाती है कि मध्यकालीन स्रोतों में दी गई संख्याओं को हमेशा आधुनिक जनगणना की तरह सटीक आंकड़ा न माना जाए।
फिर भी यह स्पष्ट है कि 1303 में चित्तौड़ की घेराबंदी और विजय एक हिंसक सैन्य संघर्ष था और इसके बाद बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ।
क्या 1303 में जौहर हुआ था?
यही वह सवाल है जिस पर इतिहासकारों के बीच मतभेद सबसे अधिक है।
चित्तौड़ के 1303 के जौहर की लोकप्रिय कहानी बाद के साहित्य और ऐतिहासिक परंपराओं में प्रमुखता से दिखाई देती है। लेकिन घटना के तुरंत बाद लिखे गए समकालीन स्रोतों में जौहर का स्पष्ट और विस्तृत विवरण नहीं मिलता।
अमीर खुसरो ने चित्तौड़ की घेराबंदी और विजय का वर्णन किया है, लेकिन उन्होंने 1303 के चित्तौड़ में जौहर का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया। यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि खुसरो ने इससे पहले 1301 में रणथंभौर की विजय के संदर्भ में जौहर का उल्लेख किया था।
इससे इतिहासकारों के बीच दो तरह के विचार सामने आते हैं। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि चित्तौड़ में जौहर हुआ था, भले ही उसका समकालीन विवरण उपलब्ध न हो। वहीं कुछ इतिहासकारों का मानना है कि बाद के लेखकों ने चित्तौड़ की घटना के साथ जौहर और पद्मावती की कथा को जोड़ दिया।
इसलिए 1303 के जौहर को लेकर पूर्ण ऐतिहासिक निश्चितता का दावा करना उचित नहीं होगा।
रानी पद्मावती की कहानी कहां से आई?
चित्तौड़ की कहानी में रानी पद्मावती या पद्मिनी का नाम सबसे अधिक लोकप्रिय है। लेकिन यहां इतिहास और साहित्य के बीच अंतर समझना जरूरी है।
रानी पद्मावती का विस्तृत चरित्र सबसे प्रसिद्ध रूप से मलिक मोहम्मद जायसी की रचना ‘पद्मावत’ में मिलता है। जायसी ने यह काव्य लगभग 1540 में लिखा था, यानी 1303 की चित्तौड़ की घटना के लगभग 237 साल बाद।
जायसी की ‘पद्मावत’ एक अवधी काव्य रचना है। इसमें पद्मावती को सिंहल द्वीप की राजकुमारी बताया गया है। कहानी के अनुसार, चित्तौड़ के राजा रतनसेन ने उनके बारे में एक बोलने वाले तोते के जरिए सुना और बाद में उनसे विवाह किया।
इसके बाद अलाउद्दीन खिलजी को पद्मावती की सुंदरता के बारे में पता चलता है और वह चित्तौड़ पर हमला करता है। यही कथा आगे चलकर पद्मावती, रतनसेन और अलाउद्दीन खिलजी की लोकप्रिय कहानी का आधार बनी।
इतिहास के पुराने स्रोतों में पद्मावती का जिक्र नहीं
1303 की चित्तौड़ विजय के शुरुआती मुस्लिम ऐतिहासिक स्रोतों में पद्मावती का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। अमीर खुसरो, जो अलाउद्दीन खिलजी के अभियान के प्रत्यक्षदर्शी थे, अपने विवरण में पद्मावती की कहानी नहीं बताते।
बाद के इतिहासकारों और साहित्यिक परंपराओं में पद्मावती की कथा प्रमुख होती गई। यही कारण है कि आधुनिक इतिहासकारों का एक बड़ा वर्ग पद्मावती की कथा को ऐतिहासिक तथ्य के बजाय बाद की साहित्यिक परंपरा से जोड़कर देखता है।
इसका मतलब यह नहीं कि चित्तौड़ का 1303 का युद्ध काल्पनिक था। युद्ध और खिलजी की विजय ऐतिहासिक रूप से दर्ज हैं। विवाद मुख्य रूप से इस बात को लेकर है कि पद्मावती और उनसे जुड़ी पूरी कथा उस समय की वास्तविक घटनाओं का हिस्सा थी या बाद में साहित्य में विकसित हुई।
‘पद्मावत’ ने बदल दी कहानी की लोकप्रियता
मलिक मोहम्मद जायसी की ‘पद्मावत’ ने चित्तौड़ की कहानी को एक अलग साहित्यिक रूप दिया। इसमें प्रेम, सत्ता, युद्ध, त्याग और आध्यात्मिक प्रतीकों को एक साथ जोड़ा गया।
जायसी ने पद्मावती की सुंदरता को कथा का केंद्रीय तत्व बनाया। कहानी के अनुसार, अलाउद्दीन खिलजी उसके बारे में सुनकर चित्तौड़ पर हमला करता है। आगे चलकर चित्तौड़ के पतन की स्थिति में पद्मावती और अन्य महिलाओं द्वारा जौहर करने का वर्णन मिलता है।
लेकिन ‘पद्मावत’ को आधुनिक इतिहास की किताब की तरह पढ़ना सही नहीं माना जाता। यह एक काव्यात्मक रचना है, जिसमें प्रतीकात्मक और कल्पनात्मक तत्व भी हैं। इसी कारण इतिहासकार इसकी कहानी और 1303 की वास्तविक घटनाओं के बीच अंतर करते हैं।
अलाउद्दीन खिलजी का असली मकसद क्या था?
पद्मावत की लोकप्रिय कथा में अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ पर हमले का कारण पद्मावती की सुंदरता बताया गया है। लेकिन समकालीन ऐतिहासिक स्रोत इस कहानी की पुष्टि नहीं करते।
इतिहासकारों के अनुसार, अलाउद्दीन की चित्तौड़ विजय को उसके व्यापक राजनीतिक और सैन्य विस्तार के संदर्भ में देखना चाहिए। वह दिल्ली सल्तनत के विस्तार और महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश कर रहा था।
चित्तौड़ मेवाड़ का महत्वपूर्ण राजनीतिक और सामरिक केंद्र था। इसलिए उसके खिलाफ अभियान को केवल किसी रानी की सुंदरता से जोड़ना ऐतिहासिक घटना को अत्यधिक सरल बना देता है।
यही वह अंतर है जो इतिहास और लोककथा के बीच दिखाई देता है। साहित्य में एक कहानी किसी घटना को भावनात्मक और नाटकीय रूप देती है, जबकि इतिहासकार उपलब्ध दस्तावेजों और समकालीन स्रोतों के आधार पर घटनाओं का पुनर्निर्माण करते हैं।
चित्तौड़ में जौहर की परंपरा बाद में भी दिखी
चित्तौड़ का संबंध केवल 1303 की घटना से नहीं है। इतिहास में चित्तौड़ के साथ तीन प्रमुख जौहरों का उल्लेख मिलता है। बाद की घटनाओं में 1535 में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के आक्रमण और 1568 में मुगल सम्राट अकबर की विजय से जुड़े जौहर भी बताए जाते हैं।
इससे यह समझने में मदद मिलती है कि जौहर की परंपरा को केवल पद्मावती की कहानी तक सीमित नहीं किया जा सकता। चित्तौड़ के इतिहास में युद्ध और किले की हार से जुड़ी सामूहिक आत्मदाह की परंपरा बाद के दौर में भी दिखाई देती है।
हालांकि अलग-अलग घटनाओं के स्रोत और विवरण अलग हैं और हर घटना को अलग ऐतिहासिक संदर्भ में देखना आवश्यक है।
स्वरा भास्कर ने वास्तव में क्या कहा था?
हालिया विवाद का केंद्र स्वरा भास्कर का ‘पद्मावत’ के जौहर दृश्य पर किया गया बयान है। 31 अगस्त 2026 को एक कार्यक्रम में उन्होंने उस खुले पत्र का संदर्भ दिया जो उन्होंने 2018 में फिल्म देखने के बाद निर्देशक संजय लीला भंसाली को लिखा था।
स्वरा ने कहा कि उन्हें यह चिंता परेशान करती थी कि यदि कोई महिला यौन हिंसा की शिकार होती है तो फिल्म का जौहर दृश्य उसके सामने किस तरह का संदेश रखता है। उन्होंने सवाल किया कि क्या किसी महिला के साथ बलात्कार या यौन हिंसा उसके जीवन का अंत माना जाना चाहिए।
उन्होंने फिल्म के उस दृश्य पर भी आपत्ति जताई जिसमें गर्भवती महिला को जौहर करते हुए दिखाया गया है। स्वरा के मुताबिक, यह दृश्य उन्हें विशेष रूप से परेशान करने वाला लगा क्योंकि इससे उन्हें अजन्मे बच्चे के जीवन को लेकर भी गंभीर सवाल महसूस हुए।
बयान के बाद क्यों हुआ विवाद?
स्वरा के बयान का एक हिस्सा सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। इसके बाद कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि उन्होंने जौहर करने वाली महिलाओं और रानी पद्मावती को कायर कहा है।
स्वरा ने बाद में इस आरोप को स्पष्ट रूप से खारिज किया। उन्होंने कहा कि उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि पद्मावती या जौहर करने वाली महिलाएं कायर थीं। उनके अनुसार, वह फिल्म के दृश्य और उसके संभावित सामाजिक संदेश पर सवाल उठा रही थीं।
इस विवाद के बाद करणी सेना की महिला शाखा सहित कुछ संगठनों ने भी उनकी टिप्पणियों की आलोचना की। दूसरी तरफ स्वरा के समर्थकों ने कहा कि उनका सवाल जौहर की ऐतिहासिक महिलाओं का अपमान करने के बजाय फिल्म में उसके चित्रण और यौन हिंसा से बचे लोगों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर था।
जौहर को आज कैसे समझें?
जौहर को समझने के लिए इतिहास के दो पहलुओं को एक साथ देखना जरूरी है। एक तरफ यह मध्यकालीन युद्धों और उस समय की सामाजिक परिस्थितियों से जुड़ी वास्तविक ऐतिहासिक प्रथा थी। दूसरी तरफ समय के साथ जौहर को लेकर कई लोककथाएं, साहित्यिक कथाएं और वीरता तथा बलिदान की परंपराएं विकसित हुईं।
राजपूत समाज की स्मृति और परंपरा में जौहर को अक्सर सम्मान, त्याग और आत्मबलिदान के प्रतीक के रूप में देखा गया। लेकिन आधुनिक दृष्टिकोण से इसे महिलाओं की परिस्थितियों और उनकी पसंद की स्वतंत्रता के सवाल से भी देखा जाता है।
इसी वजह से जौहर आज भी इतिहास, संस्कृति, स्त्री अधिकार और फिल्मों में ऐतिहासिक घटनाओं के चित्रण को लेकर बहस पैदा करता है।
इतिहास और लोककथा में फर्क जरूरी
चित्तौड़ की 1303 की घटना के बारे में कुछ बातें अपेक्षाकृत स्पष्ट हैं। अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर हमला किया, किले की लंबी घेराबंदी हुई और अंततः दिल्ली सल्तनत ने किले पर कब्जा कर लिया। इसके बाद बड़े पैमाने पर हिंसा हुई।
लेकिन पद्मावती की पूरी कथा और 1303 के जौहर का विस्तृत विवरण बाद के स्रोतों में मिलता है। ‘पद्मावत’ इस कहानी का सबसे प्रसिद्ध साहित्यिक स्रोत है, लेकिन यह घटना के दो सदियों से भी अधिक समय बाद लिखा गया था।
इसलिए चित्तौड़ की कहानी को समझते समय इतिहास, साहित्य और लोकस्मृति को अलग-अलग पहचानना जरूरी है। पद्मावती की लोकप्रिय कहानी भारतीय सांस्कृतिक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकती है, लेकिन उसके हर विवरण को समकालीन ऐतिहासिक तथ्य मान लेना इतिहासकारों के बीच स्वीकार्य नहीं है।
1303 की घटना आज भी क्यों चर्चा में रहती है?
चित्तौड़ की कहानी में युद्ध, सत्ता, धर्म, सम्मान, स्त्री की स्थिति, बलिदान और लोककथा जैसे कई विषय एक साथ जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि लगभग सात शताब्दियां बीत जाने के बाद भी यह घटना भारतीय समाज में चर्चा का विषय बनी रहती है।
फिल्म ‘पद्मावत’ ने इस कहानी को आधुनिक दर्शकों तक पहुंचाया। फिल्म की रिलीज के समय भी ऐतिहासिक चित्रण को लेकर बड़ा विवाद हुआ था। अब स्वरा भास्कर के हालिया बयान ने एक बार फिर उसी जौहर दृश्य को बहस के केंद्र में ला दिया है।
लेकिन इस बहस को समझते समय यह अंतर बनाए रखना जरूरी है कि 1303 की चित्तौड़ की वास्तविक ऐतिहासिक घटना क्या थी और बाद की साहित्यिक रचनाओं ने उसमें क्या-क्या जोड़ा।
निष्कर्ष
1303 ईस्वी में चित्तौड़ पर अलाउद्दीन खिलजी का हमला और लंबे संघर्ष के बाद किले पर उसका कब्जा ऐतिहासिक रूप से दर्ज घटना है। लेकिन रानी पद्मावती की कहानी और 1303 के जौहर का विस्तृत वर्णन बाद की साहित्यिक और लोक परंपराओं में प्रमुखता से सामने आता है। मलिक मोहम्मद जायसी की ‘पद्मावत’, जो घटना के करीब 237 साल बाद लिखी गई, पद्मावती की लोकप्रिय कथा का सबसे प्रसिद्ध स्रोत है।
जौहर स्वयं मध्यकालीन युद्ध परिस्थितियों से जुड़ी एक गंभीर और भयावह प्रथा थी। इसे उस समय की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों में समझना जरूरी है, लेकिन आधुनिक समाज में इसके अर्थ और चित्रण को लेकर सवाल उठना भी स्वाभाविक है।
स्वरा भास्कर का मौजूदा विवाद भी इसी दोहरी दृष्टि के बीच खड़ा है। उन्होंने जौहर करने वाली महिलाओं को कायर कहने से इनकार किया है और स्पष्ट किया है कि उनकी आपत्ति फिल्म में जौहर के चित्रण तथा उसके संभावित संदेश को लेकर थी।
इसलिए चित्तौड़ और जौहर की कहानी को समझने का सबसे संतुलित तरीका यही है कि ऐतिहासिक प्रमाणों, बाद की साहित्यिक परंपराओं और आधुनिक व्याख्याओं को अलग-अलग देखा जाए। 1303 का चित्तौड़ युद्ध इतिहास का हिस्सा है, जबकि पद्मावती की विस्तृत कथा साहित्य और लोकस्मृति के जरिए सदियों से विकसित होकर आज की लोकप्रिय संस्कृति तक पहुंची है। यही अंतर इस कहानी को आज भी इतिहास और समाज दोनों के लिए बहस का विषय बनाए हुए है।