कीव में थे जयशंकर, तभी रूस ने किया ड्रोन हमला; जेलेंस्की का दावा- यूक्रेनी लड़ाकू विमानों की सतर्कता से सुरक्षित रहा भारतीय प्रतिनिधिमंडल

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भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर की यूक्रेन यात्रा के दौरान राजधानी कीव में रूस की ओर से ड्रोन हमला किए जाने का दावा सामने आया है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने गुरुवार को जयशंकर से मुलाकात के बाद कहा कि जिस समय भारतीय विदेश मंत्री और उनका प्रतिनिधिमंडल कीव में मौजूद था, उसी दौरान रूस ने एक बार फिर ड्रोन से हमला किया। जेलेंस्की के मुताबिक, यूक्रेनी वायुसेना और लड़ाकू विमानों की सतर्कता की वजह से भारतीय प्रतिनिधिमंडल सुरक्षित रहा।

यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब भारत लगातार रूस-यूक्रेन युद्ध को बातचीत और कूटनीति के जरिए समाप्त करने की बात कर रहा है। जयशंकर ने कीव में राष्ट्रपति जेलेंस्की और यूक्रेन के विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा के साथ बैठक की और संघर्ष समाप्त करने के संभावित रास्तों पर चर्चा की। भारत की ओर से यह भी दोहराया गया कि वह युद्ध खत्म कराने और शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए हर संभव सहायता देने को तैयार है।

जेलेंस्की ने जयशंकर के साथ हुई बातचीत के बाद भारत की भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा कि यूक्रेन इस बात का सम्मान करता है कि भारत युद्ध को समाप्त होते देखना चाहता है और शांति की आवश्यकता पर जोर देता है। इसके साथ ही उन्होंने दावा किया कि जयशंकर की कीव यात्रा के दौरान रूस ने ईरानी मूल के शाहेद ड्रोन का इस्तेमाल करते हुए हमला किया। उनके मुताबिक, यूक्रेन की वायुसेना ने खतरे का मुकाबला किया और भारतीय प्रतिनिधिमंडल सुरक्षित रहा।

जयशंकर की यूक्रेन यात्रा क्यों है महत्वपूर्ण?

एस. जयशंकर की यह यात्रा भारत-यूक्रेन संबंधों के लिहाज से विशेष महत्व रखती है। यूक्रेनी राष्ट्रपति कार्यालय के अनुसार, यह भारत के किसी विदेश मंत्री की यूक्रेन की पहली अलग द्विपक्षीय यात्रा है। इससे पहले जयशंकर 23 अगस्त 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ भारतीय प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा बनकर यूक्रेन गए थे। इस बार वह विदेश मंत्री के रूप में अलग आधिकारिक यात्रा पर कीव पहुंचे।

यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध जारी है और हाल के दिनों में ड्रोन तथा मिसाइल हमलों की तीव्रता फिर बढ़ी है। इसलिए जयशंकर का कीव पहुंचना केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं बल्कि व्यापक कूटनीतिक संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

जेलेंस्की से हुई अहम मुलाकात

जयशंकर ने गुरुवार को यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की से मुलाकात की।

इस दौरान दोनों नेताओं के बीच सबसे महत्वपूर्ण विषय रूस-यूक्रेन युद्ध और शांति की संभावनाएं रहीं।

जयशंकर ने राष्ट्रपति जेलेंस्की को बताया कि उन्होंने यूक्रेनी विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा के साथ द्विपक्षीय सहयोग को लेकर विस्तृत बातचीत की है।

इसके साथ ही दोनों पक्षों ने युद्ध समाप्त करने के संभावित रास्तों पर भी चर्चा की।

जेलेंस्की ने बातचीत के बाद कहा कि यूक्रेन भारत की उस इच्छा के लिए आभारी है जिसमें वह युद्ध को समाप्त करने और शांति स्थापित करने की बात करता है।

‘यह युद्ध का समय नहीं’

भारत पिछले कई वर्षों से रूस-यूक्रेन युद्ध पर एक संतुलित कूटनीतिक रुख बनाए हुए है।

भारत ने लगातार कहा है कि युद्ध किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पहले कहा था कि यह युद्ध का युग नहीं है।

जयशंकर ने कीव में एक बार फिर यही रुख दोहराया।

उन्होंने कहा कि युद्ध को समाप्त करने का रास्ता बातचीत और कूटनीति से ही निकलेगा।

भारत का मानना है कि युद्ध जितना लंबा चलता जाएगा, उसका मानवीय और आर्थिक असर उतना ही गंभीर होता जाएगा।

ड्रोन हमले के बीच मौजूद था भारतीय प्रतिनिधिमंडल

जेलेंस्की के बयान का सबसे अहम हिस्सा भारतीय प्रतिनिधिमंडल की सुरक्षा को लेकर रहा।

उन्होंने कहा कि जिस दिन जयशंकर कीव में मौजूद थे, उसी दिन रूस ने फिर ड्रोन हमला किया।

जेलेंस्की के मुताबिक हमले में जेट-पावर्ड शाहेद ड्रोन इस्तेमाल किए गए।

उन्होंने इसे ईरानी सहायता से विकसित या निर्मित ड्रोन बताया।

यूक्रेनी लड़ाकू विमानों ने इन खतरों को रोकने का प्रयास किया और भारतीय प्रतिनिधिमंडल की सुरक्षा सुनिश्चित की गई।

शाहेद ड्रोन क्या हैं?

शाहेद सीरीज के ड्रोन रूस-यूक्रेन युद्ध में लगातार चर्चा में रहे हैं।

रूस ने लंबी दूरी तक हमला करने वाले इन ड्रोन का इस्तेमाल यूक्रेनी शहरों और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने में किया है।

इन ड्रोन का आकार अपेक्षाकृत छोटा होता है और इन्हें बड़ी संख्या में एक साथ भेजा जा सकता है।

इस तरह के हमले का उद्देश्य अक्सर यूक्रेन की वायु रक्षा प्रणाली पर दबाव डालना होता है।

अगर बड़ी संख्या में ड्रोन एक साथ आते हैं तो वायु रक्षा प्रणाली को कई लक्ष्यों पर एक साथ प्रतिक्रिया करनी पड़ती है।

यूक्रेन बढ़ा रहा एंटी-ड्रोन क्षमता

रूस की ओर से ड्रोन हमलों की बढ़ती संख्या को देखते हुए यूक्रेन अपनी एंटी-ड्रोन क्षमता भी बढ़ा रहा है।

जेलेंस्की ने 3 सितंबर को ही अपनी सैन्य कमान के साथ बैठक की जिसमें जेट-पावर्ड शाहेद ड्रोन को रोकने वाले इंटरसेप्टर सिस्टम के उत्पादन को तेज करने पर चर्चा हुई।

यूक्रेन अब घरेलू कंपनियों को भी वायु रक्षा प्रणाली और इंटरसेप्टर बनाने में शामिल करना चाहता है।

भारतीय प्रतिनिधिमंडल कितना करीब था हमले से?

जेलेंस्की ने यह जरूर कहा कि भारतीय प्रतिनिधिमंडल यूक्रेनी लड़ाकू विमानों की सतर्कता के कारण सुरक्षित रहा, लेकिन सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी से यह स्पष्ट नहीं है कि ड्रोन हमला उस स्थान से कितनी दूरी पर हुआ जहां जयशंकर और भारतीय अधिकारी मौजूद थे।

इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि ड्रोन सीधे भारतीय प्रतिनिधिमंडल या बैठक स्थल को निशाना बना रहे थे।

अभी तक किसी आधिकारिक भारतीय बयान में भी यह दावा नहीं किया गया है कि भारत को सीधे निशाना बनाया गया।

जेलेंस्की का बयान मुख्य रूप से यह बताता है कि कीव में भारतीय प्रतिनिधिमंडल की मौजूदगी के दौरान रूस की ओर से ड्रोन हमले की स्थिति पैदा हुई और यूक्रेनी सुरक्षा तंत्र सक्रिय रहा।

भारत ने यूक्रेन को दिया शांति का संदेश

जयशंकर ने यूक्रेनी विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा के साथ बैठक के दौरान कहा कि भारत शांति स्थापित करने की दिशा में हर संभव सहायता देने के लिए तैयार है।

उन्होंने कहा कि भारत यूक्रेनी पक्ष के विचारों और चिंताओं को समझता है।

वह इन विचारों को आगे की बातचीत में ध्यान में रखेगा।

भारत का रुख है कि युद्ध का समाधान सैन्य ताकत से नहीं बल्कि बातचीत, समझौते और कूटनीतिक प्रयासों से निकलना चाहिए।

रूस से तेल खरीद पर भी उठा सवाल

जयशंकर की कीव यात्रा के दौरान एक यूक्रेनी पत्रकार ने उनसे भारत द्वारा रूस से कच्चा तेल खरीदने पर सवाल पूछा।

जयशंकर ने इस सवाल का सीधा जवाब देते हुए कहा कि भारत को 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना होता है।

उन्होंने कहा कि दुनिया इस समय ऊर्जा के लिहाज से कठिन परिस्थितियों से गुजर रही है।

ऐसे में भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेता है।

‘तेल न खरीदने से युद्ध खत्म नहीं होगा’

जयशंकर ने रूस से तेल खरीदने के सवाल पर एक और महत्वपूर्ण बात कही।

उनके अनुसार, रूस-यूक्रेन युद्ध केवल इसलिए समाप्त नहीं होगा कि कोई देश तेल, खनिज, धातु या उर्वरक खरीदना बंद कर दे।

उन्होंने कहा कि यह संघर्ष बातचीत, कूटनीति और समझौते के जरिए ही समाप्त होगा।

जयशंकर ने यह भी कहा कि भारत यूक्रेन के नजरिए का सम्मान करता है लेकिन दूसरे देशों को भारत के नजरिए और उसकी ऊर्जा जरूरतों का भी सम्मान करना चाहिए।

भारत-रूस संबंध और यूक्रेन की चिंता

रूस लंबे समय से भारत का प्रमुख रणनीतिक साझेदार रहा है।

रक्षा, ऊर्जा और दूसरे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच मजबूत संबंध हैं।

यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल भी खरीदा।

इस पर पश्चिमी देशों और यूक्रेन की ओर से कई बार सवाल उठाए गए।

भारत का जवाब रहा है कि उसकी प्राथमिकता देश की ऊर्जा सुरक्षा और आम लोगों के लिए उचित कीमत पर ऊर्जा उपलब्ध कराना है।

फिर भी यूक्रेन से रिश्ते बनाए रखे भारत ने

रूस के साथ मजबूत संबंध होने के बावजूद भारत ने यूक्रेन के साथ अपने कूटनीतिक संबंध बनाए रखे हैं।

भारत ने यूक्रेन को मानवीय सहायता भी उपलब्ध कराई है।

जयशंकर ने कीव में बताया कि भारत अब तक यूक्रेन को मानवीय सहायता की 19 खेप भेज चुका है।

इनमें दवाइयां और अन्य जरूरी वस्तुएं शामिल रही हैं।

भारत ने युद्ध से प्रभावित नागरिकों की मदद की जरूरत पर भी लगातार जोर दिया है।

भारतीय नागरिक की मौत का भी किया जिक्र

जयशंकर ने कीव में कहा कि उनकी यात्रा ऐसे समय हो रही है जब संघर्ष फिर तेज हुआ है।

उन्होंने बताया कि यात्रा से करीब दो दिन पहले कीव में हुए हमले में एक भारतीय नागरिक की भी मौत हुई थी।

उन्होंने मृतक के परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की और कहा कि युद्ध में किसी भी व्यक्ति की जान जाना बेहद दुखद है।

इस घटना ने भारत के लिए यूक्रेन युद्ध के मानवीय पक्ष को और प्रत्यक्ष बना दिया है।

युद्ध अब पांचवें साल में

रूस ने फरवरी 2022 में यूक्रेन के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू किया था।

सितंबर 2026 तक युद्ध अपने पांचवें वर्ष में पहुंच चुका है।

इस दौरान लाखों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं।

बड़ी संख्या में सैनिक और नागरिक मारे गए हैं।

यूक्रेन के कई शहरों, ऊर्जा सुविधाओं और सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा है।

वहीं रूस पर भी सैन्य और आर्थिक दबाव पड़ा है।

ड्रोन युद्ध बना नई चुनौती

रूस-यूक्रेन संघर्ष आधुनिक ड्रोन युद्ध का एक बड़ा उदाहरण भी बन गया है।

दोनों पक्ष बड़े पैमाने पर ड्रोन का इस्तेमाल कर रहे हैं।

रूस लंबी दूरी के शाहेद जैसे ड्रोन से यूक्रेन के शहरों और ऊर्जा ढांचे को निशाना बनाता रहा है।

वहीं यूक्रेन भी रूस के अंदर सैन्य और औद्योगिक ठिकानों पर लंबी दूरी के ड्रोन हमले करता रहा है।

सस्ते ड्रोन, महंगी एयर डिफेंस

ड्रोन युद्ध की बड़ी समस्या लागत का अंतर है।

हमला करने वाला ड्रोन कई बार अपेक्षाकृत कम लागत में तैयार किया जा सकता है।

लेकिन उसे रोकने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली एयर डिफेंस मिसाइल काफी महंगी हो सकती है।

इसीलिए यूक्रेन ऐसे सस्ते इंटरसेप्टर विकसित करने की कोशिश कर रहा है जो रूसी ड्रोन को कम लागत में रोक सकें।

जेलेंस्की ने भारत की तारीफ क्यों की?

जेलेंस्की का भारत के प्रति सकारात्मक बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में यूक्रेन ने रूस से भारत के संबंधों को लेकर कई बार असंतोष जताया है।

इसके बावजूद जेलेंस्की ने जयशंकर की यात्रा के दौरान कहा कि यूक्रेन भारत की शांति स्थापित करने की इच्छा की सराहना करता है।

यह संकेत देता है कि कीव भारत को संभावित कूटनीतिक साझेदार के रूप में भी देखना चाहता है।

क्या भारत मध्यस्थ बन सकता है?

भारत ने औपचारिक रूप से खुद को रूस और यूक्रेन के बीच मध्यस्थ घोषित नहीं किया है।

लेकिन भारत के दोनों देशों के साथ संवाद बने रहने के कारण उसकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।

प्रधानमंत्री मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की दोनों से कई बार बातचीत की है।

भारत का प्रयास रहा है कि दोनों पक्ष संवाद के रास्ते पर लौटें।

मोदी की 2024 की कीव यात्रा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगस्त 2024 में यूक्रेन गए थे।

यह यात्रा ऐतिहासिक मानी गई क्योंकि किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यूक्रेन की यह पहली यात्रा थी।

जयशंकर भी उस प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे।

मोदी ने जेलेंस्की के साथ बैठक में शांति और बातचीत पर जोर दिया था।

अब दो साल बाद जयशंकर की अलग द्विपक्षीय यात्रा दोनों देशों के बीच संवाद को और आगे बढ़ाने वाली मानी जा रही है।

व्यापार भी बातचीत का हिस्सा

जयशंकर और यूक्रेनी नेतृत्व ने केवल युद्ध पर ही नहीं बल्कि द्विपक्षीय व्यापार पर भी चर्चा की।

भारत और यूक्रेन के बीच दवाओं, कृषि उत्पादों, खाद्य सामग्री, उर्वरक, मशीनरी, रसायन और उपभोक्ता वस्तुओं का व्यापार होता है।

हालांकि युद्ध के कारण समुद्री मार्ग और लॉजिस्टिक्स व्यवस्था प्रभावित हुई है।

इससे दोनों देशों के व्यापार पर भी असर पड़ा।

चार वर्षों में आई कई बाधाएं

युद्ध के कारण यूक्रेन के बंदरगाहों और परिवहन नेटवर्क पर दबाव पड़ा है।

काला सागर क्षेत्र में हमलों ने समुद्री व्यापार को भी प्रभावित किया।

इसके बावजूद जयशंकर ने कहा कि भारत और यूक्रेन के व्यापार ने मजबूती दिखाई है और कुछ नए अवसर भी सामने आए हैं।

खाद्य सुरक्षा को लेकर जेलेंस्की की चिंता

राष्ट्रपति जेलेंस्की ने जयशंकर से बातचीत में काला सागर में वाणिज्यिक जहाजों और खाद्य आपूर्ति मार्गों पर हमलों का मुद्दा भी उठाया।

यूक्रेन दुनिया के प्रमुख अनाज निर्यातक देशों में से एक है।

अगर काला सागर के रास्ते खाद्य निर्यात बाधित होता है तो इसका असर दुनिया के कई देशों पर पड़ सकता है।

जेलेंस्की ने कहा कि वैश्विक खाद्य सुरक्षा की रक्षा के लिए प्रमुख देशों को मिलकर काम करना होगा।

भारत के लिए खाद्य सुरक्षा क्यों महत्वपूर्ण?

भारत खुद एक बड़ा कृषि उत्पादक देश है, लेकिन वैश्विक खाद्य बाजार की स्थिरता उसके लिए भी महत्वपूर्ण है।

अगर यूक्रेन और रूस जैसे प्रमुख अनाज निर्यातक देशों से आपूर्ति बाधित होती है तो अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर असर पड़ सकता है।

इसके अलावा उर्वरक और ऊर्जा की कीमतें भी कृषि लागत को प्रभावित कर सकती हैं।

इसलिए भारत के लिए युद्ध का आर्थिक असर केवल तेल तक सीमित नहीं है।

यूक्रेन के साथ भारत के पुराने संबंध

भारत और यूक्रेन के बीच राजनयिक संबंध 1990 के दशक की शुरुआत से चले आ रहे हैं।

सोवियत संघ के विघटन के बाद भारत ने स्वतंत्र यूक्रेन के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित किए।

इसके बाद दोनों देशों के बीच शिक्षा, रक्षा, व्यापार और तकनीक समेत कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा।

यूक्रेन भारतीय छात्रों के लिए मेडिकल शिक्षा का भी लोकप्रिय केंद्र रहा है।

युद्ध ने भारतीय छात्रों को भी प्रभावित किया

2022 में युद्ध शुरू होने के बाद हजारों भारतीय छात्र यूक्रेन में फंस गए थे।

भारत सरकार ने ऑपरेशन गंगा के जरिए उन्हें सुरक्षित बाहर निकालने की कोशिश की।

इस घटनाक्रम के बाद भारत-यूक्रेन संबंधों में नागरिक सुरक्षा और मानवीय सहयोग का महत्व और बढ़ गया।

युद्ध खत्म करना क्यों मुश्किल है?

रूस और यूक्रेन के बीच मुख्य विवाद केवल सीमाओं या एक-दो क्षेत्रों तक सीमित नहीं है।

इसमें यूक्रेन के कब्जे वाले इलाके, NATO के साथ उसके संबंध, रूस की सुरक्षा चिंताएं और पश्चिमी देशों की सैन्य सहायता जैसे कई मुद्दे शामिल हैं।

इसलिए किसी समझौते के लिए दोनों पक्षों को कई कठिन मुद्दों पर सहमति बनानी होगी।

भारत बातचीत पर क्यों जोर देता है?

भारत का मानना है कि युद्ध के मैदान पर एक पक्ष की पूर्ण जीत की संभावना बेहद सीमित है।

युद्ध जितना लंबा चलेगा, दोनों पक्षों को उतना ही ज्यादा नुकसान होगा।

इसलिए भारत लगातार बातचीत और कूटनीतिक समाधान की बात करता है।

जयशंकर ने कीव में भी इसी सोच को दोहराया।

रूस के साथ भी जारी रहेगा संवाद

जयशंकर की यूक्रेन यात्रा का मतलब यह नहीं है कि भारत रूस से दूरी बना रहा है।

भारत रूस के साथ भी अपने रणनीतिक और आर्थिक संबंध बनाए हुए है।

भारत की नीति दोनों देशों के साथ बातचीत बनाए रखने और अपनी राष्ट्रीय हितों के आधार पर फैसला लेने की रही है।

संतुलित विदेश नीति की चुनौती

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह रूस के साथ पुराने संबंधों और पश्चिमी तथा यूक्रेनी साझेदारी के बीच संतुलन बनाए।

रूस भारत का प्रमुख रक्षा साझेदार रहा है।

वहीं अमेरिका और यूरोप भारत के बड़े आर्थिक साझेदार हैं।

यूक्रेन के साथ भी भारत के महत्वपूर्ण संबंध हैं।

इसीलिए नई दिल्ली किसी एक पक्ष के पूरी तरह साथ खड़ी होने के बजाय कूटनीतिक संतुलन की नीति अपनाती रही है।

जेलेंस्की का बयान राजनीतिक संदेश भी

भारतीय प्रतिनिधिमंडल की सुरक्षा का उल्लेख केवल सुरक्षा संबंधी जानकारी नहीं बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी माना जा सकता है।

जेलेंस्की यह दिखाना चाहते हैं कि रूस की ओर से हमले ऐसे समय भी जारी हैं जब दूसरे देशों के उच्च स्तरीय प्रतिनिधि कीव में मौजूद हैं।

इसके जरिए वह दुनिया के सामने रूस की सैन्य रणनीति को लेकर चिंता जताना चाहते हैं।

रूस की ओर से प्रतिक्रिया?

जयशंकर की यात्रा के दौरान हुए कथित ड्रोन हमले को लेकर रूस की तरफ से तत्काल कोई ऐसा सार्वजनिक बयान सामने नहीं आया जिसमें भारतीय प्रतिनिधिमंडल को लक्ष्य बनाने की बात कही गई हो।

इसलिए इस हमले को भारत या जयशंकर के खिलाफ सीधी कार्रवाई के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।

जेलेंस्की का दावा केवल इतना है कि भारतीय प्रतिनिधिमंडल की मौजूदगी के समय रूसी ड्रोन हमला हुआ और यूक्रेनी लड़ाकू विमानों ने सुरक्षा सुनिश्चित की।

क्या भारत सुरक्षा को लेकर चिंतित होगा?

विदेश मंत्री की किसी सक्रिय युद्ध क्षेत्र की यात्रा स्वाभाविक रूप से उच्च सुरक्षा जोखिम वाली होती है।

ऐसी यात्राओं के दौरान भारतीय सुरक्षा एजेंसियां स्थानीय प्रशासन और मेजबान देश की सुरक्षा व्यवस्था के साथ समन्वय करती हैं।

कीव में नियमित रूप से एयर रेड अलर्ट बजते हैं।

ऐसे में किसी उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल की यात्रा के लिए सुरक्षित स्थान और आपातकालीन व्यवस्था पहले से तैयार रखी जाती है।

कीव में लगातार खतरा

यूक्रेन की राजधानी कीव रूस के कई बड़े ड्रोन और मिसाइल हमलों का निशाना बन चुकी है।

शहर में आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम तैनात हैं।

इसके बावजूद ड्रोन और मिसाइल हमलों का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

इसलिए कीव में रहने वाले नागरिकों और विदेशी प्रतिनिधिमंडलों को एयर रेड अलर्ट को गंभीरता से लेना पड़ता है।

यूक्रेनी वायुसेना की भूमिका

यूक्रेन की वायुसेना रूसी ड्रोन और मिसाइलों को रोकने के लिए लड़ाकू विमान, जमीन आधारित एयर डिफेंस और मोबाइल इंटरसेप्टर यूनिट का इस्तेमाल करती है।

जेलेंस्की ने विशेष रूप से लड़ाकू विमानों की सतर्कता का उल्लेख किया।

यह संकेत देता है कि हमले के समय यूक्रेनी एयर डिफेंस सक्रिय था।

ड्रोन से सुरक्षा की नई रणनीति

रूस द्वारा जेट-पावर्ड शाहेद जैसे आधुनिक ड्रोन के इस्तेमाल से यूक्रेन को अपनी रणनीति बदलनी पड़ रही है।

पुराने धीमे ड्रोन को रोकना अपेक्षाकृत आसान हो सकता था।

लेकिन तेज गति वाले ड्रोन एयर डिफेंस सिस्टम के सामने नई चुनौती पैदा करते हैं।

इसीलिए जेलेंस्की ने इंटरसेप्टर ड्रोन और अन्य तकनीकों के उत्पादन को तेज करने के निर्देश दिए हैं।

भारतीय प्रतिनिधिमंडल की यात्रा जारी रही

ड्रोन हमले के बावजूद जयशंकर का कार्यक्रम जारी रहा।

उन्होंने यूक्रेन के विदेश मंत्री से मुलाकात की और बाद में जेलेंस्की के साथ भी बातचीत की।

इससे यह संकेत मिलता है कि सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने अपनी तय कूटनीतिक गतिविधियां पूरी कीं।

भारत ने युद्ध में किसी पक्ष को सैन्य समर्थन नहीं दिया

भारत ने यूक्रेन को मानवीय सहायता भेजी है लेकिन सीधे सैन्य सहायता नहीं दी।

भारत का रुख रहा है कि संघर्ष का समाधान राजनीतिक और कूटनीतिक होना चाहिए।

इस कारण भारत पश्चिमी देशों की तरह रूस पर व्यापक प्रतिबंधों में भी शामिल नहीं हुआ।

पश्चिमी देशों का अलग रुख

अमेरिका और यूरोपीय देशों ने यूक्रेन को हथियार, वित्तीय सहायता और खुफिया सहयोग दिया है।

उन्होंने रूस पर व्यापक आर्थिक प्रतिबंध लगाए।

भारत ने इस रणनीति से दूरी बनाए रखी और रूस के साथ व्यापार जारी रखा।

इसी वजह से भारत की भूमिका पश्चिमी देशों से अलग दिखाई देती है।

फिर भी भारत की भूमिका उपयोगी क्यों हो सकती है?

चूंकि भारत रूस और यूक्रेन दोनों से बात करता है, इसलिए कुछ कूटनीतिक परिस्थितियों में वह संदेश पहुंचाने या संवाद को बढ़ावा देने की भूमिका निभा सकता है।

भारत की विश्व स्तर पर बढ़ती राजनीतिक और आर्थिक भूमिका भी इसे महत्वपूर्ण बनाती है।

जेलेंस्की द्वारा भारत की शांति संबंधी भूमिका की सराहना इसी संदर्भ में देखी जा सकती है।

जयशंकर क्या संदेश लेकर लौटेंगे?

जयशंकर ने कहा कि वह यूक्रेनी पक्ष की ओर से रखे गए विचारों और चिंताओं को अपने साथ लेकर जाएंगे।

इसका अर्थ है कि भारत आने वाले समय में रूस और दूसरे साझेदार देशों से बातचीत के दौरान यूक्रेन की स्थिति को भी ध्यान में रख सकता है।

हालांकि भारत ने किसी विशिष्ट शांति प्रस्ताव या मध्यस्थता योजना की घोषणा नहीं की है।

युद्ध के बीच कूटनीति का महत्व

युद्ध जितना लंबा चलता है, कूटनीति की जरूरत उतनी ही बढ़ती जाती है।

सैन्य ताकत से किसी पक्ष की स्थिति मजबूत हो सकती है, लेकिन स्थायी शांति के लिए अंततः राजनीतिक समझौता जरूरी होता है।

जयशंकर की यात्रा इसी कूटनीतिक प्रयास का हिस्सा मानी जा सकती है।

दोनों देशों के संबंधों में नई शुरुआत?

विदेश मंत्री की स्वतंत्र यात्रा से संकेत मिलता है कि भारत और यूक्रेन अपने द्विपक्षीय संबंधों को केवल युद्ध के मुद्दे तक सीमित नहीं रखना चाहते।

व्यापार, निवेश, शिक्षा, फार्मा, कृषि और दूसरे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हो रही है।

अगर युद्ध समाप्त होता है तो यूक्रेन के पुनर्निर्माण में भारतीय कंपनियों के लिए भी नए अवसर पैदा हो सकते हैं।

यूक्रेन के पुनर्निर्माण में भारत की संभावित भूमिका

युद्ध के कारण यूक्रेन के शहरों, बिजली व्यवस्था, सड़क और औद्योगिक संरचना को भारी नुकसान हुआ है।

भविष्य में युद्ध समाप्त होने के बाद बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण की जरूरत होगी।

भारत की निर्माण, दवा, आईटी और इंजीनियरिंग कंपनियां ऐसे अवसरों में भूमिका निभा सकती हैं।

मानवीय सहायता जारी रखने का संकेत

भारत ने अब तक यूक्रेन को 19 खेप मानवीय सहायता भेजी हैं।

इससे संकेत मिलता है कि भारत युद्ध में सैन्य रूप से किसी पक्ष का हिस्सा बने बिना मानवीय सहायता जारी रखना चाहता है।

आगे भी चिकित्सा सामग्री और दूसरी सहायता उपलब्ध कराने की संभावना बनी रह सकती है।

दुनिया की नजर जयशंकर की यात्रा पर

भारत की विदेश नीति को देखते हुए जयशंकर की कीव यात्रा पर रूस, अमेरिका और यूरोप समेत कई देशों की नजर है।

भारत रूस से तेल खरीदता है और रणनीतिक संबंध रखता है।

दूसरी ओर वह यूक्रेन की संप्रभुता, संवाद और शांति का समर्थन भी करता है।

इसी संतुलन की वजह से भारत की प्रत्येक उच्चस्तरीय यात्रा को विशेष महत्व दिया जाता है।

निष्कर्ष

विदेश मंत्री एस. जयशंकर की 3 सितंबर 2026 की कीव यात्रा रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाक्रम बनकर सामने आई है। जयशंकर ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की और विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा से मुलाकात की। बातचीत में युद्ध समाप्त करने, शांति स्थापित करने और भारत-यूक्रेन द्विपक्षीय संबंध मजबूत करने पर चर्चा हुई। यूक्रेनी राष्ट्रपति कार्यालय के अनुसार, यह किसी भारतीय विदेश मंत्री की यूक्रेन की पहली स्वतंत्र द्विपक्षीय यात्रा है।

इस यात्रा के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा जेलेंस्की के उस बयान की हुई जिसमें उन्होंने दावा किया कि जयशंकर के कीव में रहते हुए रूस ने ड्रोन हमला किया। उनके मुताबिक रूस ने जेट-पावर्ड शाहेद ड्रोन का इस्तेमाल किया और यूक्रेनी वायुसेना तथा लड़ाकू विमानों की सतर्कता से भारतीय प्रतिनिधिमंडल सुरक्षित रहा।

हालांकि उपलब्ध जानकारी में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि रूस ने भारतीय प्रतिनिधिमंडल को निशाना बनाया था। इसे कीव पर जारी व्यापक रूसी सैन्य हमलों के संदर्भ में देखना चाहिए। भारतीय प्रतिनिधिमंडल जिस समय वहां मौजूद था, उसी समय ड्रोन खतरे की स्थिति बनी और यूक्रेनी सुरक्षा तंत्र सक्रिय हुआ।

जेलेंस्की ने इस घटना का उल्लेख करते हुए भारत की शांति संबंधी भूमिका की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि यूक्रेन इस बात के लिए भारत का आभारी है कि वह युद्ध समाप्त करने की इच्छा रखता है। उन्होंने भारत के उस रुख का भी उल्लेख किया जिसमें युद्ध के बजाय शांति को प्राथमिकता देने की बात कही जाती है।

जयशंकर ने भी कीव में दोहराया कि भारत रूस-यूक्रेन संघर्ष को समाप्त करने के लिए हर संभव सहायता देने को तैयार है। उनका कहना था कि युद्ध किसी वस्तु की खरीद-बिक्री बंद करने मात्र से समाप्त नहीं होगा। बातचीत, कूटनीति और समझौता ही स्थायी समाधान का रास्ता हो सकता है।

रूस से तेल खरीदने के सवाल पर उन्होंने भारत की ऊर्जा जरूरतों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारत को 1.4 अरब लोगों के लिए ऊर्जा सुनिश्चित करनी होती है और दुनिया की मौजूदा ऊर्जा परिस्थितियों को देखते हुए देश को अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लेने पड़ते हैं।

उन्होंने यूक्रेन की चिंताओं का सम्मान करने की बात कही, लेकिन साथ ही कहा कि दूसरे देशों को भारत की परिस्थितियों और नजरिए को भी समझना चाहिए।

जयशंकर ने युद्ध के मानवीय प्रभाव को भी प्रमुखता से उठाया। उन्होंने बताया कि उनकी यात्रा से दो दिन पहले कीव में हुए हमले में एक भारतीय नागरिक की मौत हुई थी। उन्होंने मृतक के परिवार के प्रति संवेदना जताई और कहा कि संघर्ष में प्रत्येक व्यक्ति की मौत दुखद है।

भारत ने यूक्रेन को अब तक मानवीय सहायता की 19 खेप भेजी हैं। यह भारत की उस नीति का हिस्सा है जिसमें वह सैन्य संघर्ष का हिस्सा बने बिना मानवीय सहयोग जारी रखता है।

भारत और यूक्रेन के बीच व्यापार भी बैठक के एजेंडे में रहा। दवाइयां, खाद्य एवं कृषि उत्पाद, उर्वरक, मशीनरी, रसायन और उपभोक्ता सामान दोनों देशों के व्यापार का हिस्सा हैं। युद्ध के कारण लॉजिस्टिक्स और समुद्री मार्गों पर असर पड़ा है, लेकिन दोनों पक्ष व्यापार और आर्थिक सहयोग बढ़ाने की संभावनाएं तलाशना चाहते हैं।

जेलेंस्की ने काला सागर में वाणिज्यिक जहाजों और खाद्य आपूर्ति मार्गों पर रूसी हमलों को लेकर भी चिंता जताई। यूक्रेन दुनिया के बड़े अनाज निर्यातक देशों में शामिल है और उसकी खाद्य आपूर्ति में बाधा वैश्विक खाद्य कीमतों तथा विकासशील देशों को प्रभावित कर सकती है।

इस यात्रा ने भारत की विदेश नीति के कठिन संतुलन को भी एक बार फिर सामने रखा। भारत रूस का पुराना रणनीतिक साझेदार है और उससे बड़े स्तर पर ऊर्जा तथा रक्षा सहयोग रखता है। इसके बावजूद भारत यूक्रेन के साथ भी उच्चस्तरीय संवाद बनाए हुए है और उसकी मानवीय जरूरतों में सहयोग देता रहा है।

नई दिल्ली का मानना है कि दोनों पक्षों से संवाद बनाए रखना शांति प्रयासों के लिए अधिक उपयोगी है।

जयशंकर की यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत के पास रूस और यूक्रेन दोनों के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और राष्ट्रपति जेलेंस्की दोनों से नियमित बातचीत करते रहे हैं।

भारत ने औपचारिक रूप से मध्यस्थ की भूमिका स्वीकार नहीं की है, लेकिन वह संवाद को प्रोत्साहित करने और किसी संभावित शांति पहल में सहयोग देने के लिए तैयार है।

कीव में रूसी ड्रोन हमले के बीच जयशंकर और भारतीय प्रतिनिधिमंडल की मौजूदगी ने युद्ध की वास्तविकता को भी करीब से दिखाया। राजधानी में सक्रिय एयर डिफेंस के बावजूद नागरिकों और विदेशी प्रतिनिधियों को लगातार हमले के जोखिम के बीच रहना पड़ता है।

जेलेंस्की द्वारा भारतीय प्रतिनिधिमंडल की सुरक्षा का विशेष उल्लेख यूक्रेन की ओर से भारत को दिया गया राजनीतिक संदेश भी माना जा सकता है। कीव चाहता है कि भारत रूस पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल युद्ध रोकने और शांति वार्ता को आगे बढ़ाने के लिए करे।

फिलहाल भारत ने अपने पुराने रुख में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया है। वह रूस से व्यापार और ऊर्जा संबंध जारी रखेगा, वहीं यूक्रेन के साथ संवाद और मानवीय सहयोग भी बनाए रखेगा।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि युद्ध के पांचवें वर्ष में भी कूटनीतिक रास्ता बंद नहीं हुआ है। एस. जयशंकर की कीव यात्रा, जेलेंस्की के साथ बातचीत और रूस के ड्रोन हमलों के बीच जारी राजनीतिक संवाद इस बात का उदाहरण है कि सक्रिय युद्ध के बीच भी कूटनीति चलती रह सकती है।

आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत की यह कूटनीतिक सक्रियता रूस और यूक्रेन के बीच किसी वास्तविक शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में कितनी भूमिका निभाती है।

फिलहाल 3 सितंबर की घटना ने एक साथ दो तस्वीरें दुनिया के सामने रखी हैं—एक तरफ कीव के आसमान में रूसी ड्रोन और उन्हें रोकने के लिए सक्रिय यूक्रेनी लड़ाकू विमान, और दूसरी तरफ उसी शहर में बैठकर भारत तथा यूक्रेन के शीर्ष प्रतिनिधियों के बीच युद्ध समाप्त करने और शांति स्थापित करने पर बातचीत।

यही विरोधाभास इस युद्ध की मौजूदा स्थिति को सबसे स्पष्ट रूप से दिखाता है: सैन्य संघर्ष अभी जारी है, लेकिन बातचीत का रास्ता भी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है।

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