
बिहार में शराब और नशीले पदार्थों की अवैध तस्करी के खिलाफ चल रही कार्रवाई के बीच समस्तीपुर और मुजफ्फरपुर से दो अलग-अलग मामले सामने आए हैं। एक तरफ समस्तीपुर में रेलवे पुलिस ने ट्रेन के वातानुकूलित कोच से कथित तौर पर शराब की खेप बरामद की, तो दूसरी तरफ मुजफ्फरपुर में पुलिस ने हेरोइन की कथित खरीद-बिक्री से जुड़े मामले में कार्रवाई करते हुए करीब दो लाख रुपये मूल्य का नशीला पदार्थ जब्त करने का दावा किया है।
दोनों घटनाएं अलग-अलग हैं, लेकिन इनके सामने आने के बाद एक बार फिर यह सवाल उठ रहा है कि तस्कर नशीले पदार्थों और शराब को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के लिए किस तरह अलग-अलग रास्तों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
समस्तीपुर में ट्रेन के AC कोच से शराब की बरामदगी ने रेलवे नेटवर्क के जरिए होने वाली तस्करी की चुनौती को सामने रखा है। वहीं मुजफ्फरपुर का मामला स्थानीय स्तर पर सक्रिय कथित ड्रग सप्लाई नेटवर्क की ओर इशारा करता है।
पुलिस और संबंधित एजेंसियां अब दोनों मामलों में आगे की कड़ियां तलाश रही हैं। जांच का उद्देश्य केवल बरामद सामग्री तक पहुंचना नहीं, बल्कि यह पता लगाना भी है कि इसे कहां से लाया गया था, किसे पहुंचाया जाना था और क्या इसके पीछे कोई संगठित नेटवर्क काम कर रहा था।
समस्तीपुर में ट्रेन के AC कोच में मिली शराब
समस्तीपुर में रेलवे पुलिस की कार्रवाई के दौरान एक ट्रेन के AC कोच से शराब बरामद होने की जानकारी सामने आई है।
बिहार में शराबबंदी लागू होने के कारण राज्य में शराब का निर्माण, बिक्री और सेवन कानून के तहत प्रतिबंधित है, हालांकि कुछ कानूनी अपवाद और अलग परिस्थितियां हो सकती हैं। इसके बावजूद समय-समय पर दूसरे राज्यों से बिहार में अवैध रूप से शराब पहुंचाने के मामले सामने आते रहते हैं।
तस्कर सड़क मार्ग के अलावा रेल नेटवर्क का भी इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं। लंबी दूरी की ट्रेनों में रोजाना हजारों यात्री सफर करते हैं और बड़ी मात्रा में सामान एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाता है। इसी भीड़ का फायदा उठाकर अवैध सामान पहुंचाने की कोशिश की जा सकती है।
समस्तीपुर में सामने आए मामले में AC कोच से शराब मिलने के बाद रेलवे पुलिस ने जांच शुरू की।
अब यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि शराब किस स्टेशन से ट्रेन में रखी गई थी और इसे कहां उतारा जाना था।
AC कोच का इस्तेमाल क्यों बना जांच का विषय?
आमतौर पर तस्करी की चर्चा होने पर सामान्य या सामान वाले डिब्बों की कल्पना की जाती है, लेकिन AC कोच में अवैध शराब मिलने से जांच एजेंसियों के सामने अलग चुनौती आती है।
आरक्षित कोच में यात्रा करने वाले यात्रियों का रिकॉर्ड उपलब्ध रहता है। इससे पुलिस को यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि संबंधित सीटों या सामान के आसपास कौन-कौन यात्री मौजूद थे।
हालांकि किसी सामान का किसी सीट के पास मिलना अपने आप उस यात्री को उसका मालिक साबित नहीं करता। इसलिए CCTV फुटेज, टिकट रिकॉर्ड, यात्रियों और रेलवे कर्मचारियों के बयान तथा अन्य साक्ष्यों की जरूरत पड़ सकती है।
रेलवे स्टेशन पर लगे कैमरे भी जांच में मददगार हो सकते हैं। उनसे यह पता लगाया जा सकता है कि संदिग्ध बैग या सामान ट्रेन में किस स्टेशन पर चढ़ाया गया।
शराब तस्करी में रेलवे बड़ी चुनौती
बिहार में शराबबंदी लागू होने के बाद से पुलिस, उत्पाद विभाग और रेलवे पुलिस के लिए अवैध शराब की आवाजाही रोकना लगातार चुनौती रही है।
राज्य की सीमाएं कई दूसरे राज्यों और नेपाल से जुड़ी हैं। इसके अलावा बड़ी संख्या में लंबी दूरी की ट्रेनें बिहार से होकर गुजरती हैं।
तस्करी करने वाले लोग कभी छोटे बैग में बोतलें छिपाकर तो कभी बड़े सामान के बीच शराब रखकर ले जाने की कोशिश कर सकते हैं।
इस तरह के मामलों को पकड़ने के लिए स्टेशनों पर सामान की जांच, संदिग्ध यात्रियों की निगरानी और खुफिया सूचनाओं के आधार पर कार्रवाई महत्वपूर्ण होती है।
समस्तीपुर की कार्रवाई भी इसी व्यापक निगरानी का हिस्सा मानी जा रही है।
मुजफ्फरपुर में हेरोइन बरामद
दूसरा मामला मुजफ्फरपुर से सामने आया है, जहां पुलिस ने हेरोइन की कथित खरीद-बिक्री से जुड़े लोगों के खिलाफ कार्रवाई की।
पुलिस के मुताबिक कार्रवाई के दौरान करीब दो लाख रुपये मूल्य की हेरोइन बरामद की गई है।
हेरोइन एक प्रतिबंधित मादक पदार्थ है और इसकी खरीद, बिक्री, परिवहन तथा अवैध कब्जे से जुड़े मामलों में नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस यानी NDPS कानून के तहत कार्रवाई हो सकती है।
पुलिस ने बरामद पदार्थ को कब्जे में लेकर जांच की प्रक्रिया शुरू की है। ऐसे मामलों में पदार्थ की प्रकृति और मात्रा की अंतिम पुष्टि के लिए फोरेंसिक या निर्धारित परीक्षण महत्वपूर्ण होते हैं।
इसके अलावा पुलिस यह पता लगाने की कोशिश करती है कि नशीला पदार्थ कहां से आया और इसे किन लोगों तक पहुंचाया जाना था।
छोटे सप्लायर से बड़े नेटवर्क तक पहुंचने की कोशिश
ड्रग्स से जुड़े मामलों में किसी व्यक्ति के पास से नशीला पदार्थ मिलना जांच की शुरुआत भर हो सकता है।
जांच एजेंसियों के लिए बड़ा सवाल उस सप्लाई चेन का पता लगाना होता है जिसके जरिए पदार्थ एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचता है।
पुलिस आरोपी या संदिग्धों के मोबाइल फोन, कॉल रिकॉर्ड, वित्तीय लेनदेन और संपर्कों की जांच कर सकती है। इससे संभावित सप्लायर और ग्राहकों के बारे में सुराग मिल सकते हैं।
यदि डिजिटल भुगतान का इस्तेमाल हुआ हो तो बैंक खाते और अन्य वित्तीय रिकॉर्ड भी जांच का हिस्सा बन सकते हैं।
मुजफ्फरपुर मामले में भी पुलिस कथित नेटवर्क के दूसरे सदस्यों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है।
नशे के स्थानीय नेटवर्क पर पुलिस की नजर
बड़े शहरों के साथ छोटे शहरों और कस्बों में भी नशीले पदार्थों की अवैध बिक्री कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय है।
स्थानीय स्तर पर सक्रिय नेटवर्क कई बार छोटे-छोटे सप्लायरों के जरिए पदार्थ ग्राहकों तक पहुंचाते हैं। इस व्यवस्था में मुख्य सप्लायर सीधे अंतिम खरीदार के संपर्क में न होकर कई स्तरों के माध्यम से काम कर सकता है।
यही वजह है कि किसी एक आरोपी की गिरफ्तारी से पूरे नेटवर्क का खुलासा जरूरी नहीं होता।
पुलिस को सप्लाई के स्रोत, वितरण करने वालों और संभावित आर्थिक नेटवर्क की अलग-अलग जांच करनी पड़ती है।
बिहार में शराबबंदी और तस्करी की चुनौती
बिहार में अप्रैल 2016 से पूर्ण शराबबंदी लागू है। इसके तहत शराब की बिक्री और सेवन पर व्यापक कानूनी प्रतिबंध लगाए गए।
सरकार का उद्देश्य शराब से जुड़ी सामाजिक समस्याओं को कम करना था। लेकिन शराबबंदी लागू होने के बाद अवैध शराब की तस्करी और बिक्री प्रशासन के लिए एक अलग चुनौती के रूप में सामने आई।
दूसरे राज्यों से बिहार में शराब लाने की कोशिशों के कारण सीमावर्ती जिलों, हाईवे, रेलवे स्टेशन और ट्रेनों पर निगरानी बढ़ानी पड़ी।
पुलिस और उत्पाद विभाग की ओर से लगातार कार्रवाई की जाती है और बड़ी मात्रा में शराब जब्त होने के मामले सामने आते रहते हैं।
इसके बावजूद तस्कर नए तरीके अपनाने की कोशिश करते हैं।
ट्रेन तस्करों के लिए क्यों आकर्षक हो सकती है?
रेलवे नेटवर्क में प्रतिदिन बहुत बड़ी संख्या में यात्री सफर करते हैं। कई ट्रेनें एक राज्य से दूसरे राज्य तक लंबी दूरी तय करती हैं।
यही विशाल नेटवर्क तस्करों के लिए अवसर पैदा कर सकता है।
सड़क पर वाहन को चेकपोस्ट पर रोका जा सकता है, जबकि ट्रेन में हजारों यात्रियों और सामान के बीच किसी संदिग्ध पैकेट की पहचान करना मुश्किल हो सकता है।
हालांकि रेलवे स्टेशनों पर CCTV, रेलवे सुरक्षा बल, GRP और अन्य एजेंसियों की मौजूदगी के कारण तस्करों के लिए जोखिम भी रहता है।
आरक्षित डिब्बों में यात्रियों की पहचान का रिकॉर्ड होना जांच एजेंसियों के लिए अतिरिक्त मदद बन सकता है।
पुलिस कैसे तलाश सकती है नेटवर्क की अगली कड़ी?
ऐसे मामलों में जांच कई दिशाओं में आगे बढ़ सकती है।
सबसे पहले बरामद सामग्री की पहचान और मात्रा की पुष्टि की जाती है। इसके बाद यह देखा जाता है कि वह किसके कब्जे से मिली और उस व्यक्ति के पास उसका स्रोत बताने के लिए क्या जानकारी है।
मोबाइल फोन की जांच महत्वपूर्ण हो सकती है। कॉल, मैसेज और उपलब्ध डिजिटल रिकॉर्ड से यह पता चल सकता है कि संबंधित व्यक्ति किन लोगों के संपर्क में था।
आर्थिक लेनदेन भी महत्वपूर्ण सुराग दे सकते हैं। यदि बार-बार किसी खास खाते में पैसे भेजे गए हों तो जांच उस दिशा में आगे बढ़ सकती है।
इसके अलावा गिरफ्तार व्यक्ति के बयान के आधार पर अन्य संभावित ठिकानों पर कार्रवाई की जा सकती है।
NDPS कानून में सख्त प्रावधान
भारत में प्रतिबंधित नशीले पदार्थों से जुड़े अपराधों पर NDPS Act के तहत कार्रवाई की जाती है।
इस कानून में अपराध और संभावित सजा कई कारकों पर निर्भर करती है, जिनमें बरामद पदार्थ का प्रकार, उसकी मात्रा और मामले की परिस्थितियां शामिल हैं।
कानून में अलग-अलग पदार्थों के लिए छोटी और व्यावसायिक मात्रा जैसी श्रेणियां निर्धारित की गई हैं। इसलिए केवल बाजार मूल्य देखकर किसी मामले की कानूनी गंभीरता तय नहीं की जा सकती।
जांच एजेंसी को बरामद पदार्थ का वजन, उसकी प्रकृति और अन्य साक्ष्य अदालत के सामने पेश करने होते हैं।
इसी कारण पुलिस की शुरुआती बरामदगी और अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के बीच अंतर रखना जरूरी है।
नशे के खिलाफ कार्रवाई में खुफिया नेटवर्क की भूमिका
ड्रग तस्करी के मामलों में केवल सड़क या स्टेशन पर जांच पर्याप्त नहीं होती। संगठित नेटवर्क तक पहुंचने के लिए खुफिया सूचनाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
स्थानीय स्तर पर पुलिस मुखबिरों, पुराने मामलों और संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी के आधार पर कार्रवाई कर सकती है।
यदि किसी इलाके में लगातार नशीले पदार्थों की बिक्री की शिकायत आती है तो पुलिस संभावित सप्लाई पॉइंट और संदिग्ध व्यक्तियों की निगरानी कर सकती है।
इसके अलावा अलग-अलग जिलों की पुलिस के बीच जानकारी साझा करना भी जरूरी होता है, क्योंकि सप्लाई नेटवर्क अक्सर एक जिले तक सीमित नहीं रहते।
युवाओं को नशे से बचाना बड़ी चुनौती
नशीले पदार्थों का मामला केवल पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं है। इसका एक महत्वपूर्ण सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी पहलू भी है।
नशे की लत व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक स्थिति, शिक्षा, रोजगार तथा पारिवारिक जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है।
इसलिए केवल ड्रग सप्लायर को पकड़ना पर्याप्त समाधान नहीं है। नशे की मांग कम करने के लिए जागरूकता, उपचार और पुनर्वास की व्यवस्था भी जरूरी होती है।
विशेष रूप से स्कूल और कॉलेज जाने वाले युवाओं को नशीले पदार्थों के जोखिम के बारे में सही जानकारी देना महत्वपूर्ण है।
परिवार और शिक्षण संस्थान भी शुरुआती संकेतों को पहचानने और मदद उपलब्ध कराने में भूमिका निभा सकते हैं।
शराब और ड्रग्स के मामलों में फर्क
समस्तीपुर और मुजफ्फरपुर के मामले एक ही दिन चर्चा में आए हैं, लेकिन कानूनी रूप से दोनों की प्रकृति अलग है।
समस्तीपुर का मामला बिहार की शराबबंदी और शराब की कथित अवैध तस्करी से जुड़ा है, जबकि मुजफ्फरपुर में हेरोइन की बरामदगी NDPS कानून से संबंधित गंभीर मामला हो सकता है।
इसलिए दोनों मामलों में जांच, धाराएं और न्यायिक प्रक्रिया अलग-अलग हो सकती हैं।
फिर भी दोनों मामलों में एक समान पहलू है—अवैध पदार्थों की सप्लाई चेन का पता लगाना।
बरामदगी के बाद क्या होता है?
जब पुलिस या कोई जांच एजेंसी नशीला पदार्थ जब्त करती है तो उसे निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत सुरक्षित रखा जाता है।
बरामद पदार्थ का नमूना जांच के लिए प्रयोगशाला भेजा जा सकता है। वहां यह पुष्टि की जाती है कि वह वास्तव में वही प्रतिबंधित पदार्थ है जिसका पुलिस ने प्रारंभिक तौर पर दावा किया है।
इस रिपोर्ट का अदालत में महत्वपूर्ण स्थान होता है।
इसी तरह शराब की बरामदगी में बोतलों की संख्या, ब्रांड, मात्रा और स्रोत जैसी जानकारी दर्ज की जाती है।
साक्ष्य की पूरी श्रृंखला सुरक्षित रखना जरूरी होता है, ताकि अदालत में यह साबित किया जा सके कि जांच के दौरान बरामद की गई वस्तु वही है जिसे परीक्षण के लिए भेजा गया था।
आरोप साबित होना अभी बाकी
पुलिस कार्रवाई या गिरफ्तारी को किसी व्यक्ति के दोषी होने का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।
समस्तीपुर और मुजफ्फरपुर से जुड़े मामलों में भी जांच एजेंसियों के दावों और उपलब्ध साक्ष्यों को अदालत में परखा जाएगा।
आरोपियों को अपना पक्ष रखने का कानूनी अधिकार है और दोषसिद्धि न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही तय होती है।
इसीलिए शुरुआती पुलिस जानकारी को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष की तरह पेश करने से बचना जरूरी है।
क्या किसी बड़े सिंडिकेट की कड़ी मिलेगी?
मुजफ्फरपुर में कथित हेरोइन बरामदगी के बाद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि इसका स्रोत क्या था।
यदि पुलिस को स्थानीय सप्लायर से किसी बड़े नेटवर्क की जानकारी मिलती है तो जांच दूसरे जिलों या राज्यों तक भी पहुंच सकती है।
इसी तरह समस्तीपुर में ट्रेन से मिली शराब के मामले में यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि खेप कहां से आई और इसे बिहार में किसे सौंपा जाना था।
यदि दोनों मामलों में संगठित नेटवर्क के संकेत मिलते हैं तो जांच का दायरा और बड़ा हो सकता है।
दो मामले, लेकिन संदेश एक
समस्तीपुर और मुजफ्फरपुर की कार्रवाई ने बिहार में अवैध शराब और नशीले पदार्थों की चुनौती को एक बार फिर सामने रखा है।
समस्तीपुर में ट्रेन के AC कोच से शराब की कथित बरामदगी यह दिखाती है कि रेलवे नेटवर्क पर निगरानी कितनी महत्वपूर्ण है। वहीं मुजफ्फरपुर में करीब दो लाख रुपये मूल्य की हेरोइन जब्त होने का मामला स्थानीय ड्रग सप्लाई नेटवर्क को लेकर चिंता बढ़ाता है।
अब पुलिस और संबंधित एजेंसियों के सामने चुनौती केवल बरामदगी तक सीमित नहीं है। असली सफलता तब मानी जाएगी जब जांच सप्लाई के स्रोत, पैसे के नेटवर्क और कथित सिंडिकेट के दूसरे सदस्यों तक पहुंचे।
नशे के खिलाफ लड़ाई केवल गिरफ्तारी और जब्ती से नहीं जीती जा सकती। कानून लागू करने के साथ नशे की मांग कम करना, युवाओं में जागरूकता बढ़ाना, लत से जूझ रहे लोगों को उपचार उपलब्ध कराना और तस्करी के आर्थिक नेटवर्क को तोड़ना भी उतना ही जरूरी है।
फिलहाल दोनों मामलों में जांच जारी है। आगे की कार्रवाई से यह स्पष्ट होगा कि ये अलग-अलग घटनाएं थीं या इनके पीछे किसी बड़े तस्करी नेटवर्क की कड़ियां मौजूद हैं।