
दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के पास स्थित सत्य निकेतन इलाके में रविवार को एक बहुमंजिला इमारत के अचानक ढह जाने से हड़कंप मच गया। यह इलाका दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के रहने के लिए जाना जाता है और यहां बड़ी संख्या में पेइंग गेस्ट यानी PG और किराए के मकान हैं। ऐसे में इमारत गिरने की खबर सामने आते ही इस बात की आशंका बढ़ गई कि मलबे के अंदर कई छात्र और अन्य लोग फंसे हो सकते हैं।
हादसे के बाद राहत और बचाव अभियान तेजी से शुरू किया गया। दमकल, पुलिस, प्रशासन और आपदा राहत से जुड़ी टीमें मौके पर पहुंचीं। इसी बीच दिल्ली विश्वविद्यालय साउथ कैंपस की निदेशक प्रोफेसर राजनी अब्बी ने स्थिति को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी दी। उन्होंने बताया कि उस समय यह स्पष्ट नहीं था कि मलबे के अंदर कुल कितने लोग मौजूद हैं।
इस बीच मलबे के अंदर से फोन कॉल और वीडियो कॉल आने की जानकारी ने रेस्क्यू ऑपरेशन की गंभीरता को और बढ़ा दिया। अगर कोई व्यक्ति मलबे के अंदर से फोन या वीडियो कॉल कर पा रहा है, तो इसका मतलब यह हो सकता है कि कुछ लोग अब भी जीवित हैं और उन्हें जल्द से जल्द बाहर निकालने की जरूरत है। हालांकि उस समय यह निश्चित नहीं था कि अंदर कितने लोग फंसे हैं और उनकी स्थिति कैसी है।
सत्य निकेतन में दोपहर करीब 1:30 बजे हुआ हादसा
जानकारी के मुताबिक, हादसा रविवार दोपहर करीब 1:30 बजे हुआ। अचानक इमारत गिरने के बाद आसपास के इलाके में अफरा-तफरी मच गई। स्थानीय लोगों ने तुरंत पुलिस और दमकल विभाग को सूचना दी।
इमारत के गिरने के बाद बड़ी मात्रा में मलबा जमा हो गया। बचाव दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि मलबे के नीचे मौजूद लोगों तक सुरक्षित तरीके से कैसे पहुंचा जाए।
सत्य निकेतन की गलियां काफी व्यस्त और कई जगह संकरी हैं। ऐसे इलाके में बड़े रेस्क्यू उपकरणों को घटनास्थल तक पहुंचाना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसके बावजूद प्रशासन और बचाव दलों ने मौके पर राहत कार्य शुरू किया।
प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि इमारत बहुत तेजी से गिरी और लोगों को संभलने का ज्यादा मौका नहीं मिला। कुछ लोगों ने दावा किया कि अंदर बड़ी संख्या में छात्र रह रहे थे, हालांकि शुरुआती घंटों में यह संख्या आधिकारिक तौर पर स्पष्ट नहीं थी।
मलबे के अंदर से आई फोन और वीडियो कॉल
इस हादसे की सबसे अहम और भावुक करने वाली जानकारी मलबे के अंदर से आए फोन संपर्क से जुड़ी है।
दिल्ली विश्वविद्यालय साउथ कैंपस की निदेशक प्रोफेसर राजनी अब्बी ने बताया कि बचाव अभियान के दौरान मलबे के अंदर से फोन कॉल प्राप्त हुई। इसके अलावा अंदर से वीडियो कॉल आने की जानकारी भी सामने आई।
यह जानकारी रेस्क्यू टीमों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है। मलबे के अंदर फंसे किसी व्यक्ति का फोन सक्रिय होना और संपर्क स्थापित कर पाना यह संकेत दे सकता है कि कुछ लोग अभी जीवित हैं।
बचाव अभियान में ऐसी जानकारी का इस्तेमाल फंसे लोगों की संभावित लोकेशन का पता लगाने के लिए किया जा सकता है। हालांकि केवल फोन कॉल के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि मलबे के अंदर कुल कितने लोग हैं।
यही वजह है कि प्रोफेसर राजनी अब्बी ने भी स्पष्ट किया कि उस समय अंदर मौजूद लोगों की सटीक संख्या का पता नहीं चल पाया था।
DU साउथ कैंपस निदेशक ने क्या बताया?
प्रोफेसर राजनी अब्बी हादसे के बाद मौके पर मौजूद थीं। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय प्रशासन की सबसे बड़ी चिंता यह पता लगाना है कि मलबे के अंदर कितने छात्र या अन्य लोग फंसे हो सकते हैं।
उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय ने सभी संबंधित कॉलेजों को छात्रों की जानकारी जुटाने के निर्देश दिए हैं। कॉलेज प्रशासन से यह पता लगाने को कहा गया कि उनके कितने विद्यार्थी सत्य निकेतन स्थित संबंधित परिसर में रह रहे थे।
यह जानकारी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हादसे के बाद लापता छात्रों की संख्या का अनुमान लगाने में कॉलेज रिकॉर्ड मदद कर सकते हैं।
अगर किसी कॉलेज के रिकॉर्ड में कोई छात्र सत्य निकेतन के उस PG या भवन में रह रहा था और हादसे के बाद उससे संपर्क नहीं हो पा रहा है, तो प्रशासन को उसके संभावित रूप से फंसे होने की जानकारी मिल सकती है।
दूसरी ओर जो छात्र सुरक्षित हैं, उनसे अपने कॉलेज या संबंधित प्रशासन को अपनी स्थिति बताने की अपील की जा सकती है। इससे लापता लोगों की वास्तविक संख्या निर्धारित करने में मदद मिल सकती है।
छात्रों की मौजूदगी का पता लगाना क्यों मुश्किल था?
सत्य निकेतन दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के आसपास का एक महत्वपूर्ण छात्र इलाका है। यहां बड़ी संख्या में छात्र PG, हॉस्टल और किराए के कमरों में रहते हैं।
कई छात्र एक ही मकान में अलग-अलग कमरों में रहते हैं और PG में रहने वालों की संख्या भी समय के साथ बदल सकती है। ऐसे में किसी हादसे के तुरंत बाद यह पता लगाना मुश्किल हो सकता है कि घटना के समय इमारत में वास्तव में कितने लोग मौजूद थे।
किसी छात्र का नाम मकान या PG के रिकॉर्ड में दर्ज होना यह जरूरी नहीं कि हादसे के समय वह वहीं मौजूद हो। इसी तरह कोई छात्र बाहर गया हो सकता है या किसी दूसरे स्थान पर रह रहा हो सकता है।
इसी कारण विश्वविद्यालय प्रशासन कॉलेजों से छात्रों की जानकारी जुटाने की कोशिश कर रहा था।
छात्रों को अपने कॉलेज लौटने की अपील
प्रोफेसर राजनी अब्बी के मुताबिक, विश्वविद्यालय प्रशासन ने संबंधित छात्रों को अपने-अपने कॉलेजों में लौटने के लिए कहा।
इसका उद्देश्य केवल सुरक्षा सुनिश्चित करना नहीं था, बल्कि छात्रों की मौजूदगी की जानकारी को व्यवस्थित तरीके से जुटाना भी था।
ऐसी आपदा की स्थिति में “कितने लोग सुरक्षित हैं” और “कितने लोग लापता हैं”—इन दोनों सवालों का जवाब रेस्क्यू ऑपरेशन के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है।
अगर कॉलेजों के पास छात्रों की सूची हो और वे सूची हादसे के बाद छात्रों की वास्तविक मौजूदगी से मिलाई जा सके, तो बचाव एजेंसियों को संभावित पीड़ितों की संख्या और पहचान का अनुमान लगाने में मदद मिल सकती है।
मलबे में फंसे छात्रों के लिए समय बेहद महत्वपूर्ण
बिल्डिंग गिरने के बाद शुरुआती कुछ घंटे बचाव अभियान के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। मलबे के अंदर फंसे व्यक्ति को चोट लगी हो सकती है, लेकिन अगर उसके आसपास सांस लेने की जगह बनी हो तो उसके बचने की संभावना बनी रह सकती है।
इसीलिए फोन या वीडियो कॉल जैसी जानकारी रेस्क्यू टीमों के लिए उम्मीद की किरण बन जाती है।
मलबे के अंदर से संपर्क होने की जानकारी मिलने पर संभावित लोकेशन की पहचान और उस हिस्से तक सावधानी से पहुंचने की कोशिश की जा सकती है।
लेकिन रेस्क्यू टीमों के सामने दूसरी चुनौती भी होती है। मलबे को तेजी से हटाने की कोशिश में अगर संरचना का कोई हिस्सा अस्थिर हो जाए तो अंदर फंसे लोगों और बचावकर्मियों दोनों के लिए खतरा बढ़ सकता है।
इसलिए ऐसे अभियानों में मलबा हटाने का काम बेहद सावधानी से किया जाता है।
बचाव अभियान में कई एजेंसियां जुटीं
हादसे के बाद दमकल विभाग की कई गाड़ियां मौके पर पहुंचीं। पुलिस और स्थानीय प्रशासन की टीमें भी घटनास्थल पर पहुंचीं।
इसके अलावा आपदा राहत से जुड़ी एजेंसियों की मदद भी ली गई। NDRF की टीमें मलबे में फंसे लोगों को तलाशने और निकालने के काम में शामिल हुईं।
ऐसे अभियानों में प्रशिक्षित बचावकर्मी पहले मलबे की स्थिति का आकलन करते हैं। इसके बाद संभावित जीवित लोगों की लोकेशन का पता लगाने और सुरक्षित रास्ता बनाने की कोशिश की जाती है।
मौके पर खोजी कुत्तों और अन्य उपकरणों का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। भारतीय एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, बचाव अभियान में NDRF और डॉग स्क्वॉड भी शामिल थे।
स्थानीय लोगों ने भी की मदद
बिल्डिंग गिरने के बाद आसपास के स्थानीय लोग भी मदद के लिए आगे आए। हादसे के तुरंत बाद लोगों ने मलबे से लोगों को निकालने की कोशिश की और बचाव दलों को जानकारी दी।
स्थानीय लोगों को यह पता होता है कि भवन में कितने लोग रहते थे, कौन से कमरे किसके इस्तेमाल में थे और हादसे से पहले वहां क्या गतिविधियां चल रही थीं। इसलिए उनकी जानकारी प्रशासन के लिए उपयोगी हो सकती है।
हालांकि भारी मलबे और अस्थिर संरचना के बीच बिना प्रशिक्षण के अंदर जाना खतरनाक हो सकता है। इसलिए ऐसे मामलों में प्रशिक्षित बचावकर्मियों को ही मलबे के अंदर जाने देना अधिक सुरक्षित होता है।
कितने लोग फंसे थे? संख्या को लेकर अलग-अलग दावे
हादसे के तुरंत बाद मलबे में फंसे लोगों की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए।
कुछ स्थानीय लोगों ने 20 से 30 लोगों के फंसे होने की आशंका जताई। दूसरी रिपोर्टों में इससे ज्यादा संख्या का अनुमान लगाया गया। लेकिन DU साउथ कैंपस की निदेशक ने साफ कहा कि उस समय प्रशासन के पास अंदर मौजूद बच्चों की सटीक संख्या नहीं थी।
यही कारण है कि शुरुआती रिपोर्टों में सामने आने वाले आंकड़ों को अंतिम संख्या नहीं माना जाना चाहिए।
बचाव अभियान आगे बढ़ने के साथ ही यह पता चल सकता है कि वास्तव में कितने लोग भवन में मौजूद थे, कितने सुरक्षित बाहर निकल गए और कितने लोग मलबे में फंसे थे।
इमारत में छात्र क्यों रह रहे थे?
सत्य निकेतन दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के पास है। आसपास कई कॉलेज और शैक्षणिक संस्थान होने के कारण यह क्षेत्र छात्रों के रहने के लिए लोकप्रिय है।
इस इलाके में बड़ी संख्या में PG और किराए के मकान हैं। ऐसे में छात्रों के लिए कॉलेज के पास रहना सुविधाजनक होता है।
लेकिन छात्र आवासों की संख्या बढ़ने के साथ भवनों की सुरक्षा और रखरखाव भी महत्वपूर्ण मुद्दा बन जाता है।
हादसे के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या ऐसे PG भवनों की नियमित स्ट्रक्चरल जांच होती है? क्या पुराने भवनों में क्षमता से ज्यादा लोग तो नहीं रह रहे? क्या निर्माण या मरम्मत के दौरान सुरक्षा नियमों का पालन किया जा रहा है?
इन सवालों का जवाब जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।
इमारत की हालत को लेकर पहले से सवाल?
हादसे के बाद कुछ स्थानीय छात्रों और निवासियों ने दावा किया कि इमारत की हालत पहले से कमजोर थी और वहां निर्माण या मरम्मत का काम चल रहा था।
ThePrint की रिपोर्ट में एक DU छात्र के हवाले से कहा गया कि इमारत पहले छात्रों को किराए पर दी जाती थी और बाद में इसे निजी PG के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा। एक अन्य छात्र ने इमारत के झुकने और ग्राउंड फ्लोर पर काम चलने का दावा किया।
हालांकि इन दावों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि भवन गिरने का कारण यही था।
इमारत गिरने के वास्तविक कारण का पता तकनीकी जांच के बाद ही चल सकेगा।
बेसमेंट में निर्माण कार्य की बात भी सामने आई
हादसे के बाद बेसमेंट या ग्राउंड फ्लोर में चल रहे काम को लेकर भी सवाल उठे हैं।
कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया कि हादसे से पहले भवन में मरम्मत या निर्माण का काम चल रहा था। कुछ स्थानीय लोगों ने आशंका जताई कि इससे भवन की संरचनात्मक मजबूती प्रभावित हुई हो सकती है।
लेकिन यह अभी जांच का विषय है।
किसी पुराने भवन में निर्माण या खुदाई का काम होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वही हादसे का कारण था। इसके लिए स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग जांच, भवन के डिजाइन, नींव, कॉलम, बीम, भार और किए गए निर्माण कार्य की तकनीकी समीक्षा आवश्यक होगी।
हादसे ने PG सुरक्षा पर उठाए सवाल
सत्य निकेतन की घटना ने दिल्ली के छात्र इलाकों में PG और किराए के मकानों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
देश के कई बड़े शहरों में कॉलेज और विश्वविद्यालयों के आसपास बड़ी संख्या में छात्र निजी PG में रहते हैं। इन इमारतों का इस्तेमाल मूल रूप से जिस उद्देश्य के लिए किया गया था, कई बार बाद में उसका स्वरूप बदल जाता है।
किसी सामान्य आवासीय मकान को PG या हॉस्टल में बदलने से वहां रहने वालों की संख्या काफी बढ़ सकती है। इससे भवन पर भार, बिजली व्यवस्था, पानी, अग्नि सुरक्षा और निकासी व्यवस्था जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
अगर किसी भवन की नियमित संरचनात्मक जांच नहीं होती तो उसकी कमजोरी समय रहते सामने नहीं आ सकती।
दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने बड़ी जिम्मेदारी
हादसे के बाद DU प्रशासन के सामने सबसे तत्काल चुनौती छात्रों की पहचान और सुरक्षा से जुड़ी है।
कॉलेजों से जानकारी जुटाने की प्रक्रिया इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
इसके अलावा विश्वविद्यालय प्रशासन को छात्रों और उनके परिवारों के साथ संपर्क बनाए रखना होगा। किसी छात्र के बारे में जानकारी नहीं मिलने की स्थिति में परिवार के लिए चिंता और बढ़ सकती है।
विश्वविद्यालयों के लिए यह घटना एक बड़े सुरक्षा सबक के रूप में भी सामने आ सकती है। छात्रों को केवल अकादमिक सुविधाएं देना पर्याप्त नहीं है; उनके रहने के स्थानों की सुरक्षा को लेकर भी संस्थागत स्तर पर जागरूकता जरूरी है।
परिवारों में बढ़ी चिंता
हादसे की खबर फैलते ही उन छात्रों के परिवारों में चिंता बढ़ गई जिनके बच्चे सत्य निकेतन में रहते थे।
किसी परिवार के लिए यह जानना कि उसके बच्चे के रहने वाले इलाके में कोई इमारत गिर गई है और मलबे के अंदर लोगों के फंसे होने की आशंका है, बेहद तनावपूर्ण स्थिति होती है।
ऐसे समय में सबसे जरूरी होता है कि प्रशासन पुष्टि की गई जानकारी ही साझा करे और अफवाहों से बचा जाए।
मलबे के अंदर से वीडियो कॉल आने की जानकारी ने जहां उम्मीद जगाई, वहीं इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि रेस्क्यू टीम के सामने समय की चुनौती कितनी गंभीर थी।
हादसे में मौतों और घायलों की संख्या लगातार बदलती रही
घटना के शुरुआती घंटों में मृतकों, घायलों और फंसे लोगों की संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आए। बाद की रिपोर्टों में मृतकों की संख्या बढ़कर तीन तक बताई गई, जबकि कई लोग घायल या मलबे में फंसे होने की आशंका में थे।
ऐसे हादसों में शुरुआती आंकड़े अक्सर बदलते रहते हैं क्योंकि बचाव अभियान जारी रहता है और प्रशासन को धीरे-धीरे सही जानकारी मिलती है।
इसलिए अंतिम आंकड़ा प्रशासन और अस्पतालों की पुष्टि के बाद ही माना जाना चाहिए।
अमित शाह ने भी जताया दुख
हादसे की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी घटना पर दुख जताया और दिल्ली के अधिकारियों से स्थिति की जानकारी ली।
उन्होंने दिल्ली की मुख्यमंत्री, दिल्ली पुलिस आयुक्त और NDRF के महानिदेशक से बात कर राहत एवं बचाव अभियान की स्थिति की जानकारी लेने की बात कही। स्थानीय प्रशासन और NDRF द्वारा बचाव अभियान चलाए जाने की जानकारी भी सामने आई।
इससे पता चलता है कि हादसे की गंभीरता को देखते हुए बचाव अभियान पर उच्च स्तर से भी नजर रखी जा रही थी।
अब जांच का सवाल
रेस्क्यू ऑपरेशन पूरा होने के बाद सबसे बड़ा सवाल होगा कि आखिर इमारत क्यों गिरी।
क्या भवन पुराना और कमजोर था? क्या उसकी नींव में समस्या थी? क्या किसी तरह का अवैध निर्माण हुआ था? क्या मरम्मत या बेसमेंट में चल रहे काम से संरचना प्रभावित हुई? क्या भवन में उसकी क्षमता से अधिक लोग रह रहे थे?
इन सभी सवालों की जांच जरूरी होगी।
घटना का कारण केवल अनुमान के आधार पर तय करना सही नहीं होगा। तकनीकी विशेषज्ञों की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि इमारत की संरचनात्मक विफलता किस वजह से हुई।
छात्र सुरक्षा को लेकर क्या सबक?
सत्य निकेतन की घटना केवल एक भवन हादसा नहीं है। यह उन हजारों छात्रों की सुरक्षा से जुड़ा सवाल भी है जो देश के बड़े शहरों में PG और किराए के मकानों में रहते हैं।
छात्रों को किसी भी मकान में रहने से पहले उसकी बुनियादी सुरक्षा की जानकारी लेने की कोशिश करनी चाहिए। वहीं प्रशासन और स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है कि छात्र आवासों की संरचनात्मक और अग्नि सुरक्षा से जुड़े नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाए।
पुराने भवनों की नियमित जांच, अवैध निर्माण पर निगरानी और निर्माण या मरम्मत के दौरान सुरक्षा मानकों का पालन ऐसे हादसों को रोकने में महत्वपूर्ण हो सकता है।
निष्कर्ष
दिल्ली के सत्य निकेतन में बहुमंजिला इमारत गिरने के बाद राहत और बचाव अभियान के बीच मलबे से फोन और वीडियो कॉल आने की जानकारी ने लोगों की चिंता के साथ-साथ उम्मीद भी बढ़ाई। दिल्ली विश्वविद्यालय साउथ कैंपस की निदेशक प्रोफेसर राजनी अब्बी ने बताया कि विश्वविद्यालय को उस समय यह स्पष्ट नहीं था कि मलबे के अंदर कुल कितने छात्र या अन्य लोग मौजूद हैं।
DU प्रशासन ने संबंधित कॉलेजों को अपने छात्रों की जानकारी जुटाने के निर्देश दिए, ताकि यह पता लगाया जा सके कि सत्य निकेतन में कितने विद्यार्थी रह रहे थे और हादसे के बाद उनमें से कितने सुरक्षित हैं। यह जानकारी बचाव अभियान के लिए भी महत्वपूर्ण थी।
मलबे से आई वीडियो कॉल और फोन संपर्क ने संकेत दिया कि अंदर कुछ लोग संपर्क करने की स्थिति में हो सकते हैं। ऐसे में बचाव दलों के लिए हर मिनट महत्वपूर्ण हो गया। NDRF, दमकल, पुलिस और प्रशासन की टीमें लगातार मलबे में फंसे लोगों को तलाशने और सुरक्षित बाहर निकालने में जुटी रहीं।
इस हादसे ने दिल्ली के छात्र इलाकों में मौजूद PG और पुराने भवनों की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कुछ स्थानीय लोगों और छात्रों ने इमारत की स्थिति तथा वहां चल रहे निर्माण या मरम्मत कार्य को लेकर दावे किए हैं, लेकिन हादसे का वास्तविक कारण अभी जांच का विषय है।
फिलहाल सबसे बड़ी प्राथमिकता मलबे में फंसे लोगों को सुरक्षित निकालना है। इसके बाद भवन की संरचनात्मक जांच और हादसे के कारणों की पड़ताल से यह पता लगाना जरूरी होगा कि इतनी बड़ी दुर्घटना किन परिस्थितियों में हुई और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए।